मणिपुर बचाओ, NRC नहीं तो जनगणना नहीं

मणिपुर में जनगणना से पहले NRC लागू करने की मांग के पीछे क्या हैं स्वदेशी समुदायों की प्रमुख चिंताएँ और तर्क?

The Narrative World    17-Jul-2026   
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मणिपुर भारत के पूर्वोत्तर का वह राज्य है, जो पिछले कई वर्षों से जातीय संघर्ष, विस्थापन और राजनीतिक अनिश्चितता से जूझ रहा है। वर्तमान समय में यह राज्य एक नई दिशा और निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। यह संघर्ष अपनी सांस्कृतिक पहचान, भूमि और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का है। जनगणना 2026 के आरम्भ के साथ ही राज्य में एक शक्तिशाली जन-आंदोलन शुरू हुआ है, जिसकी मुख्य सामाजिक मांग एक ही बिंदु पर केंद्रित है, "NRC नहीं तो जनगणना नहीं।" अर्थात राज्य में पहले NRC की सूची को पूर्ण किया जाए, ताकि अवैध प्रवासियों की पहचान और जाँच हो सके तथा उन्हें बाहर किया जाए। इसके बाद ही जनगणना की प्रक्रिया शुरू की जाए।
 
आंदोलन: स्थानीय समाज की पहल
 
8 जून 2026 को इम्फाल की सड़कों पर हजारों लोग उमड़ पड़े। "Civil Society Organizations (CSOs) Kangleipak" के बैनर तले विभिन्न नागरिक समाज संगठनों ने एक विशाल रैली आयोजित की। तिद्दीम ग्राउंड से शुरू होकर THAU ग्राउंड तक पहुँची इस रैली में छात्र, युवा, विस्थापित परिवार, कलाकार और स्वदेशी समुदायों के लोग शामिल हुए।
 
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बैनरों पर लिखे नारे इस आंदोलन की जीवंत भावना को स्पष्ट कर रहे थे, जैसे "केवल NRC अपडेट से ही मणिपुर बच सकता है", "NRC नहीं तो जनगणना नहीं", "मणिपुर राज्य की उपेक्षा मत करो" और "1951 NRC अपडेट होने तक जनगणना मत करो।" इन नारों में केवल एक मांग ही नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष के समाधान की उम्मीद भी दिखाई देती है।
 
इससे पहले भी उठती रही है यह मांग
 
15 और 21 दिसंबर 2025: JFD (Just and Fair Delimitation) ने मंत्रिमंडल से NRC अपडेट करने तथा जनगणना स्थगित करने की मांग की।
 
29 दिसंबर 2025: बिष्णुपुर जिले के Wangoo Sabal में सिट-इन प्रोटेस्ट आयोजित किया गया। इस दौरान "No NRC, No Census", "NRC First, Census Next" और "Peace and NRC First, Then Census" जैसे नारे लगाए गए।
 
19 मई 2026: JFD ने पुनः ज्ञापन सौंपकर NRC को तत्काल अपडेट करने और जनगणना स्थगित करने की मांग दोहराई।
 
मार्च 2026: इम्फाल के ऐतिहासिक इमा मार्केट में अधिकांश महिलाओं सहित सैकड़ों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे। जनगणना से पहले NRC लागू करने की मांग को लेकर मणिपुर की 'इमा' अर्थात माताएँ, जो ऐतिहासिक रूप से सामाजिक न्याय के संघर्ष में हमेशा अग्रणी रही हैं, एक बार फिर इस आंदोलन की धुरी बन गईं। यह उसी राज्य की परंपरा है, जहाँ 'मेइरा पैबी' (मशाल वाहक माताएँ) ने दशकों पहले भी जनसंघर्ष का नेतृत्व किया था। आज फिर वही जुनून, वही दृढ़ता और वही साहस सड़कों पर दिखाई दिया।
 
भौगोलिक संरचना के संदर्भ में
 
म्यांमार और बांग्लादेश की सीमाओं से लगा यह राज्य दशकों से अवैध प्रवासन की समस्या का सामना कर रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता शंजोय अहांतेम का दावा है कि राज्य में 1,800 से अधिक अवैध गाँव हैं और इंडो-म्यांमार सीमा पर बड़ी संख्या में अवैध अप्रवासी रह रहे हैं। उनका कहना है कि बांग्लादेश से आए प्रवासी भी जनगणना में शामिल हो सकते हैं।
 
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यही वह विषय है, जो लाखों स्थानीय लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित कर रहा है। यदि जनगणना अभी हुई और अवैध निवासी उसमें शामिल हो गए, तो उनकी नागरिकता को कानूनी वैधता मिल सकती है। यह स्थानीय स्वदेशी समुदायों के लिए सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक अस्तित्व का संकट बन सकता है। एक बार नागरिकता मिल जाने के बाद उन्हें वापस भेजना लगभग असंभव हो जाएगा, जैसा कि अन्य राज्यों की परिस्थितियों में भी देखने को मिलता रहा है।
 
भविष्य में उत्पन्न होने वाला प्रश्न
 
यह विषय केवल जनगणना तक सीमित नहीं है। इसके प्रशासनिक और राजनीतिक परिणाम भी गहरे हो सकते हैं। सामाजिक संगठनों और नेताओं का मानना है कि भविष्य में होने वाले किसी भी परिसीमन अभ्यास के लिए NRC का अपडेट होना अत्यंत आवश्यक है। उनका तर्क है कि यदि विवादित या गलत जनसंख्या आँकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन किया गया, तो स्वदेशी समुदायों के प्रतिनिधित्व पर स्थायी और प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
 
इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि यदि अवैध प्रवासी जनगणना में शामिल हो गए, तो उनकी संख्या के आधार पर विधानसभा सीटों का परिसीमन होगा। इससे मणिपुर के मूल निवासियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व घट सकता है और उनकी आवाज़ विधानसभा में कमज़ोर पड़ सकती है। यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध माना जाएगा।
 
दूसरे पक्ष का क्या कहना है
 
यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि मणिपुर एक बहु-जातीय और जटिल सामाजिक संरचना वाला राज्य है। जहाँ कई संगठन अवैध प्रवासन को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए NRC की मांग कर रहे हैं, वहीं कई अन्य समूह इस मांग का विरोध करते हैं और इसे भेदभावपूर्ण तथा विभाजनकारी बताते हैं।
 
 
उनका कहना है कि NRC की आड़ में उन्हें और उनके समुदायों को निशाना बनाया जा सकता है। उनका यह भी मानना है कि स्थायी शांति तभी संभव है, जब सभी समुदायों की आशंकाओं को सुना जाए और एक न्यायसंगत तथा पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाए। NRC का क्रियान्वयन निष्पक्ष तरीके से हो, यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है।
 
स्वदेशी अस्मिता की रक्षा का संघर्ष
 
यह स्थानीय समाज की एकजुट आवाज़ है, जो अपनी भूमि, संस्कृति और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है। जनगणना एक संवैधानिक प्रक्रिया है और इसकी आवश्यकता को लेकर समाज में कोई संदेह नहीं है। लेकिन जब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं होता, तब तक की गई जनगणना न केवल अधूरी मानी जाएगी, बल्कि स्थानीय समाज की अस्मिता पर भी प्रश्नचिह्न बना रहेगा।
 
 
मणिपुर के समाज की इस चिंता को समझने की आवश्यकता है। सभी पक्षों के साथ संवाद स्थापित हो तथा NRC के क्रियान्वयन के लिए एक स्पष्ट, न्यायसंगत और समयबद्ध रोडमैप तैयार किया जाए। पूर्वोत्तर की माटी की इस पुकार को समाधान तक पहुँचाना आवश्यक है, क्योंकि यह प्रश्न केवल एक राज्य का नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक नैतिकता से भी जुड़ा हुआ है।
 
लेख
हेमेन्द्र शर्मा
शोध कार्य व सामाजिक समसामयिक विश्लेषक, उत्तर-पूर्व अध्ययन केंद्र, नई दिल्ली