संजय गांधी मॉडल: गरीबी हटाओ से गरीब मिटाओ

कैसे इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी के मॉडल ने परिवार नियोजन और शहरी पुनर्विकास के नाम पर नागरिक अधिकारों तथा मानव गरिमा को गहरे संकट में डाल दिया था?

The Narrative World    02-Jul-2026
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इमरजेंसी के दौरान सत्ता का केंद्रीकरण केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहा। परिवार नियोजन अभियान, शहरी पुनर्विकास और प्रशासनिक कार्रवाइयों ने नागरिक अधिकारों, मानव गरिमा और शासन की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।
 
भारत में 25 जून 1975 को लागू आपातकाल को प्रायः राजनीतिक दमन, प्रेस सेंसरशिप और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियों के संदर्भ में याद किया जाता है। किंतु इमरजेंसी का एक दूसरा पक्ष भी था, जिसने सीधे आम नागरिकों के जीवन को अपने कब्जे में लेने का प्रयास किया। इस दौर में परिवार नियोजन अभियान, शहरी पुनर्विकास और प्रशासनिक अभियानों के नाम पर ऐसे कदम उठाए गए, जिन्होंने सीधे भारतीयों के मानवाधिकारों पर प्रहार किया। एक तरफ इंदिरा गांधी लोकतंत्र की संस्थाओं को कुचल रही थीं, तो दूसरी तरफ उनके पुत्र संजय गांधी लोकतंत्र को चुनने वाले नागरिकों की जिंदगियों के साथ खेल रहे थे।
 
इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी ने तथाकथित "पांच सूत्रीय कार्यक्रम" को आगे बढ़ाया। इस पांच सूत्रीय कार्यक्रम में जबरन नसबंदी और गरीबों को बेघर कर देना भी शामिल था, जिसे कांग्रेस ने 'परिवार नियोजन' और 'झुग्गी पुनर्वास अभियान' के नाम से प्रचारित किया।
 
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परिवार नियोजन कार्यक्रम भारत में आपातकाल से पहले भी अस्तित्व में था, किंतु वर्ष 1976 के दौरान इसे अभूतपूर्व गति से लागू किया गया। राज्य सरकारों और जिला प्रशासन को नसबंदी के लक्ष्य दिए गए। सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों और स्थानीय प्रशासन पर निर्धारित संख्या पूरी करने का दबाव बनाया गया। विभिन्न समकालीन रिपोर्टों, आयोगों और बाद के अध्ययनों में ऐसे अनेक मामलों का उल्लेख मिलता है, जिनमें लोगों ने आरोप लगाया कि उन्हें दबाव, प्रलोभन या प्रशासनिक कार्रवाई की आशंका के बीच नसबंदी करवानी पड़ी। विशेष रूप से गरीब, ग्रामीण और वंचित समुदाय इस अभियान से अधिक प्रभावित हुए।
 
इसी प्रकार दिल्ली के तुर्कमान गेट की घटना इमरजेंसी के सबसे चर्चित प्रसंगों में गिनी जाती है। अप्रैल 1976 में राजधानी में शहरी सौंदर्यीकरण और अतिक्रमण हटाने के अभियान के दौरान तुर्कमान गेट क्षेत्र में बड़े पैमाने पर झुग्गियों और मकानों को हटाया गया। इस कार्रवाई का स्थानीय निवासियों ने विरोध किया, जिसके बाद पुलिस कार्रवाई हुई। आधिकारिक और स्वतंत्र स्रोतों में मृतकों और प्रभावित लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। बड़ी संख्या में परिवार विस्थापित हुए और इन कार्रवाइयों में मारे गए अनेक लोगों तथा उनके परिवारों के बारे में लंबे समय तक स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आ सकी।
 
 
इमरजेंसी के दौरान प्रशासनिक तंत्र पर राजनीतिक नेतृत्व का प्रभाव पहले की तुलना में अधिक दिखाई दिया। अनेक राज्यों में अधिकारियों का मूल्यांकन इस आधार पर होने लगा कि वे सरकारी अभियानों के लक्ष्यों को कितनी तेजी से पूरा कर रहे हैं। परिवार नियोजन, झुग्गी हटाने और अन्य कार्यक्रमों में लक्ष्य आधारित प्रशासनिक संस्कृति विकसित हुई।
 
 
इमरजेंसी का यह चरण राजनीतिक असहमति के दमन से कई गुना आगे बढ़कर सीधे भारतीय नागरिकों की देहरी तक आ पहुंचा था। यही कारण रहा कि वर्ष 1977 के आम चुनाव में उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में नसबंदी अभियान और तुर्कमान गेट जैसी घटनाएं प्रमुख चुनावी मुद्दे बनकर उभरीं।
 
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केवली कबीर जैन
पत्रकारिता छात्र, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय