उमर खालिद के समर्थन में कौन चला रहा है संगठित अभियान?

क्या उमर खालिद के समर्थन में चल रहे अभियानों का उद्देश्य केवल रिहाई की मांग है या इसके पीछे कोई व्यापक वैचारिक रणनीति भी दिखाई देती है?

The Narrative World    02-Jul-2026   
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30 जून को ब्रिटिश अखबार द गार्जियन ने दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद पर सहानुभूतिपूर्ण रिपोर्ट प्रकाशित की। इसी दौरान CJP नेताओं और समर्थकों ने उनकी रिहाई की मांग तेज की। इससे सवाल उठा कि क्या NEET आंदोलन किसी बड़े राजनीतिक एजेंडे का माध्यम बन गया है।
 
द गार्जियन ने अपनी रिपोर्ट में उमर खालिद को सरकार की कथित असहमति विरोधी कार्रवाई का शिकार और भारत के प्रमुख "राजनीतिक कैदियों" में से एक बताया। रिपोर्ट में जेल जीवन, मानसिक पीड़ा, उम्मीद, रूसी लेखक फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की और भगत सिंह का उल्लेख प्रमुखता से किया गया। हालांकि, रिपोर्ट ने अभियोजन पक्ष के आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों पर गंभीर चर्चा नहीं की।
 
रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अखबार ने स्वयं स्वीकार किया कि उसने खालिद के कानूनी मामले पर चर्चा नहीं करने का फैसला किया। पत्रकार ने खालिद से सीधे बातचीत भी नहीं की। उनके परिजनों और मित्रों के माध्यम से सवाल-जवाब तैयार किए गए। इस तरीके ने भावनात्मक कहानी तो प्रस्तुत कर दी, लेकिन अभियोजन के आरोपों का सामना कराने से बचा लिया।
 
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रिपोर्ट में यह भी प्रमुखता से बताया गया कि उमर खालिद फरवरी 2020 के दंगों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में मौजूद नहीं थे। जबकि अभियोजन का मामला किसी सड़क पर पत्थर फेंकने वाले आरोपी का नहीं, बल्कि कथित बड़ी साजिश के योजनाकार और समन्वयक का है। ऐसे मामलों में अदालत केवल घटनास्थल पर मौजूदगी नहीं, बल्कि कथित साजिश में भूमिका की जांच करती है।
 
 
द गार्जियन की रिपोर्ट सामने आते ही कांग्रेस नेता शशि थरूर ने इसे भावुक करने वाला लेख बताया। वामपंथी विचारधारा से जुड़े कई लोगों ने भी इसे साझा करते हुए उमर खालिद के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की। आलोचकों का कहना है कि रिपोर्ट ने मुकदमे के तथ्यात्मक पक्ष की जगह भावनात्मक विमर्श को आगे बढ़ाया।
 
 
इसी बीच CJP के संस्थापक अभिजीत डिपके और संगठन के अन्य प्रवक्ताओं ने भी लगातार उमर खालिद का समर्थन किया। एक साक्षात्कार में डिपके ने कहा कि यदि उनका उपनाम खालिद, सैफी या वे मुस्लिम होते तो शायद जेल में होते। इस बयान के जरिए उन्होंने यह संकेत देने की कोशिश की कि खालिद के खिलाफ कार्रवाई धार्मिक पहचान के कारण हुई। हालांकि उन्होंने उनके खिलाफ दर्ज गंभीर आपराधिक और साजिश संबंधी आरोपों पर कोई ठोस जवाब नहीं दिया।
 
 
CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने खालिद के खिलाफ दर्ज मामलों को झूठा और निरर्थक बताया। वहीं दूसरी प्रवक्ता विजेता दहिया ने पूरे मामले को एक भाषण और एक व्हाट्सऐप समूह तक सीमित बताने की कोशिश की। जब उनसे दिल्ली दंगों में 50 से अधिक लोगों की मौत और बड़ी साजिश के आरोपों पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने जांच और मीडिया पर ही सवाल उठाए।
 
CJP और उसके समर्थकों का एक प्रमुख तर्क यह रहा कि छह वर्षों तक मुकदमा पूरा नहीं हुआ, इसलिए आरोप संदेहास्पद हैं। लेकिन अदालत के रिकॉर्ड अलग तस्वीर दिखाते हैं। उमर खालिद की पहली और दूसरी जमानत याचिका खारिज हुई। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी राहत नहीं दी। जनवरी 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी और अप्रैल में पुनर्विचार याचिका भी स्वीकार नहीं की।
 
हालिया जमानत आवेदन में स्वयं सर्वोच्च न्यायालय की उस टिप्पणी का उल्लेख किया गया, जिसमें अदालत ने कहा कि मामले में कई आरोपी हैं, भारी मात्रा में दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मौजूद हैं तथा रिकॉर्ड यह नहीं दिखाता कि मुकदमे में देरी केवल अभियोजन की वजह से हुई। अदालत ने यह भी माना कि आरोपियों की ओर से भी कई कानूनी प्रक्रियाओं ने सुनवाई को प्रभावित किया।
 
यही कारण है कि केवल "छह साल बिना ट्रायल" का नारा पूरे मामले की तस्वीर पेश नहीं करता। मुकदमे में देरी पर व्यापक बहस हो सकती है, लेकिन इस विशेष मामले में अदालतों के समक्ष दायर अनेक याचिकाओं और कानूनी प्रक्रियाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
 
 
6 जून को जंतर-मंतर में CJP के पहले बड़े प्रदर्शन के दौरान भी उमर खालिद के समर्थन की खुली आवाजें सुनाई दीं। कुछ प्रदर्शनकारियों ने उन्हें अपना नेता बताया। कई लोगों ने उनकी रिहाई की मांग की। एक समर्थक ने तो उमर खालिद और शरजील इमाम को भविष्य के शीर्ष राजनीतिक पदों के योग्य तक बता दिया। वहीं कुछ प्रतिभागियों ने इस समर्थन का विरोध भी किया, जिससे आंदोलन के भीतर मतभेद भी सामने आए।
 
संगठन के डिस्कॉर्ड समुदाय में भी इसी तरह के संदेश सामने आए। कई सदस्यों ने "फ्री उमर खालिद" अभियान चलाया। कुछ ने उन्हें क्रांतिकारी बताया तो कुछ ने भविष्य का राष्ट्रीय नेता कहा। चर्चाओं में पुलिस, मीडिया और न्यायपालिका पर लगातार अविश्वास जताया गया, जबकि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों पर गंभीर चर्चा बहुत कम दिखाई दी।
 
 
दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश से जुड़े मामले में अभियोजन ने उमर खालिद का नाम कई प्राथमिकी और आरोपपत्रों में शामिल किया है। अभियोजन के अनुसार 20 फरवरी 2020 को अमरावती में दिया गया उनका भाषण, 8 जनवरी की कथित बैठक, विभिन्न व्हाट्सऐप समूह, वित्तीय और लॉजिस्टिक सहायता, डिजिटल रिकॉर्ड, गवाहों के बयान तथा अन्य सामग्री जांच का हिस्सा हैं। अभियोजन का दावा है कि यह मामला किसी एक भाषण या एक संदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि कथित संगठित साजिश से जुड़ा है।
 
आलोचकों का कहना है कि द गार्जियन की रिपोर्ट और CJP के अभियान में एक समान पैटर्न दिखाई देता है। पहले आरोपों की पूरी पृष्ठभूमि को कमजोर किया जाता है। फिर आरोपी की व्यक्तिगत पीड़ा और पहचान को केंद्र में रखा जाता है। इसके बाद पुलिस, न्यायपालिका और आलोचनात्मक मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जाते हैं। अंत में आरोपी को केवल जमानत मांगने वाले व्यक्ति के बजाय लोकतांत्रिक संघर्ष के प्रतीक के रूप में पेश किया जाता है।
 
 
CJP स्वयं को NEET, बेरोजगारी और युवाओं की समस्याओं से जुड़ा मंच बताता है। लेकिन उसके नेताओं के बयान, प्रदर्शन स्थलों की आवाजें और ऑनलाइन समुदाय की चर्चाएं बार-बार उमर खालिद के समर्थन पर केंद्रित दिखाई देती हैं। यही कारण है कि आलोचक पूछ रहे हैं कि क्या NEET आंदोलन वास्तव में मुख्य उद्देश्य है या फिर वह किसी व्यापक वैचारिक अभियान का माध्यम बन गया है।
 
भारतीय कानून हर आरोपी को जमानत मांगने, शीघ्र सुनवाई की मांग करने और अदालत में अपना बचाव रखने का अधिकार देता है। अंतिम निर्णय अदालत ही सुनाती है। लेकिन कानूनी अधिकार और सार्वजनिक विमर्श में आरोपों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देना दो अलग बातें हैं। द गार्जियन की रिपोर्ट, CJP नेताओं के बयान और समर्थकों के अभियान ने उमर खालिद को पीड़ित और नायक के रूप में स्थापित करने की कोशिश की, जबकि दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश से जुड़े आरोपों पर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई। इसी वजह से इस पूरे घटनाक्रम ने यह बहस तेज कर दी है कि कहीं NEET जैसे संवेदनशील मुद्दे का इस्तेमाल किसी बड़े वैचारिक अभियान को आगे बढ़ाने के लिए तो नहीं किया जा रहा।