तिलचट्टों के संसद मार्च की कुछ तस्वीरें सार्वजनिक हैं। वे आसमान में सूराख करना चाहते होंगे, पत्थर उछले और डेढ़ सौ से अधिक पुलिसकर्मी तथा पाँच आईपीएस अधिकारी घायल हुए। एक दृश्य और भी है, जहाँ एक अकेला सिपाही तिलचट्टों के हत्थे चढ़ गया और फिर सैकड़ों उस पर टूट पड़े। नहीं... नहीं, इसे क्रांति करना कहते हैं। मॉब लिंचिंग केवल विशेष प्रायोजन में उपयोग में लाया जाने वाला शब्द है। एक महिला पत्रकार पर झूमते-छिटपिटाते-घिनघिनाते तिलचट्टे भी देखे गए। एक पुलिस अधिकारी किसी तरह उसे सुरक्षित निकाल सका। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं है। वह लल्लनटॉप की पत्रकार थोड़े ही थी कि डफली पर धुन बजती, "आओ हुजूर तुमको..."। एक परमवीर तिलचट्टा तो हाथ में बड़ा-सा पत्थर लिए खुलेआम उसे दिखाता-धमकाता भी देखा गया। इस सबके बाद भी सुरक्षाबलों को हाथ में गुलाब का फूल लेकर खड़ा रहना चाहिए था, लाठी क्यों भाँजी; है न?
अब थोड़ी-सी बात शहरी नक्सलियों के काम करने की शैली पर भी करते हैं। अपनी पुस्तक "तेरा राज नहीं आएगा रे" के लिए काम करते हुए एक पूर्व माओवादी ने बताया कि उन्हें ओडिशा में किसी प्रदर्शन को आक्रामक बनाना था। अबूझमाड़ से चुनकर पचास लड़के इसके लिए भेजे गए। प्रत्येक को पाँच हजार रुपये भी दिए गए थे। किसी कारण से यह योजना पूरी नहीं हो सकी, तो संगठन ने सभी से पैसे वापस ले लिए थे (विस्तार से यह प्रकरण पुस्तक "तेरा राज नहीं आएगा रे" में पढ़ सकते हैं; पोस्ट के साथ
अमेजॉन लिंक उपलब्ध है)। आज स्थिति यह है कि बंदूकधारी माओवादियों ने अपने हथियार धर दिए हैं, लेकिन किसी-न-किसी रूप में उनका शहरी कैडर सक्रिय है। इसे और बारीकी से जानना है, तो माओवादियों के "अर्बन पर्सपेक्टिव" के उन बिंदुओं को देखिए, जहाँ छात्रों, मध्यवर्गीय कर्मचारियों, बुद्धिजीवियों, महिलाओं, दलितों और धार्मिक अल्पसंख्यकों सहित विभिन्न सामाजिक समूहों को संगठित करने तथा उसके तौर-तरीकों को समझाया गया है।
अब इन्हीं तत्वों के आधार पर तिलचट्टों के कथित आंदोलन के घटकों का मूल्यांकन करें। आप समझ जाएंगे कि फ़ैज़ की नज़्म की धुन-ताल पर डफलियाँ क्यों बज रही हैं, पत्थर क्यों उछाले गए और इसके बाद विक्टिम कार्ड क्यों खेला गया...।
लेख
राजीव रंजन प्रसाद
लेखक, साहित्यकार