मध्य प्रदेश विधानसभा ने मंगलवार को विपक्ष के विरोध के बीच समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पारित कर दिया। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह कानून विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव इन संबंधों के लिए सभी धार्मिक समुदायों पर समान नियम लागू करेगा।
मध्य प्रदेश अब उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद समान नागरिक संहिता कानून पारित करने वाला देश का चौथा राज्य बन गया है। सरकार ने इसे अपने प्रमुख वैचारिक एजेंडे की दिशा में बड़ा कदम बताया, जबकि कांग्रेस ने विधेयक का विरोध करते हुए इसे प्रवर समिति के पास भेजने की मांग उठाई। विधानसभा में करीब दो घंटे तक चली चर्चा के दौरान हंगामा इतना बढ़ा कि अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को दो बार सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। आखिरकार विधानसभा ने ध्वनिमत से विधेयक पारित कर दिया।
विधानसभा में चर्चा के दौरान कांग्रेस विधायक लगातार सदन के वेल में नारेबाजी करते रहे। भाजपा ने विपक्ष पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का आरोप लगाया। दूसरी ओर, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि सरकार को पहले अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27% आरक्षण का लंबित मुद्दा सुलझाना चाहिए था। उन्होंने UCC विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजकर विस्तृत जांच कराने की मांग भी की।
कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने भी विधेयक का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 25 में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और अनुच्छेद 29 में अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकारों की भावना के विपरीत है। उन्होंने संशोधन प्रस्ताव रखते हुए अल्पसंख्यकों को कानून के दायरे से बाहर रखने और विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजने की मांग की। हालांकि सदन ने इन मांगों को स्वीकार नहीं किया।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने विधेयक पर चर्चा शुरू करते हुए "जय श्रीराम", "जो हिंदू हित की बात करेगा वही देश पर राज करेगा" और "मुस्लिम तुष्टिकरण बंद करो" जैसे नारे लगाए। उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता का पारित होना मध्य प्रदेश के साढ़े आठ करोड़ लोगों के लिए स्वर्णिम दिन है। उन्होंने दावा किया कि यह कानून "एक राष्ट्र, एक संविधान, एक ध्वज, एक नेतृत्व" की उस सोच को मजबूत करेगा, जिसका समर्थन डॉ. भीमराव आंबेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने किया था।
मुख्यमंत्री ने कहा कि नया कानून बहुविवाह जैसी प्रथाओं से महिलाओं को राहत देगा और उनके अधिकारों को मजबूत करेगा। उन्होंने कांग्रेस पर हिंदू और मुस्लिम समाज के बीच विभाजन पैदा करने की राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि इसी सोच ने देश के विभाजन जैसी ऐतिहासिक परिस्थितियों को जन्म दिया था।
UCC कानून राज्य के अनुसूचित जनजाति समुदाय पर लागू नहीं होगा। मध्य प्रदेश की लगभग 21% आबादी जनजातीय समुदाय से जुड़ी है, इसलिए सरकार ने उन्हें इस कानून के दायरे से बाहर रखा है। बाकी सभी धार्मिक समुदायों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव इन संबंधों से जुड़े समान नियम लागू होंगे।
नए कानून के तहत सभी विवाह, तलाक और लिव इन संबंधों का पंजीकरण अनिवार्य रहेगा। इसके साथ ही सभी धार्मिक समुदायों में एक पत्नी या एक पति की व्यवस्था अनिवार्य होगी। बहुविवाह पर पूरी तरह रोक लगेगी।
कानून निकाह हलाला जैसी शोषणकारी प्रथाओं पर भी रोक लगाता है। यदि कोई व्यक्ति तलाक के बाद दोबारा उसी जीवनसाथी से विवाह करने के लिए ऐसी अपमानजनक या जबरन कराई जाने वाली प्रक्रिया अपनाता है या उसे बढ़ावा देता है, तो कानून उसे दंडनीय अपराध मानेगा।
लिव इन संबंधों के लिए भी कानून ने स्पष्ट नियम तय किए हैं। किसी भी जोड़े को साथ रहने की शुरुआत के एक महीने के भीतर रजिस्ट्रार के समक्ष "लिव इन रिलेशनशिप का विवरण" जमा करना होगा। यदि कोई जोड़ा तय समय में पंजीकरण नहीं कराता, तो उसे तीन महीने तक की जेल या 10 हजार रुपये तक का जुर्माना भुगतना पड़ सकता है।
यदि कोई व्यक्ति पंजीकरण के दौरान गलत जानकारी देता है, तो उसे तीन महीने तक की कैद या 25 हजार रुपये तक के जुर्माने का सामना करना पड़ेगा। रजिस्ट्रार की ओर से नोटिस मिलने के बाद भी यदि कोई व्यक्ति लिव इन संबंध की जानकारी नहीं देता, तो उसे छह महीने तक की जेल या 25 हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
कानून यह भी तय करता है कि यदि कोई व्यक्ति धोखे, दबाव, बल प्रयोग या छल के जरिए किसी का लिव इन संबंध के लिए सहमति हासिल करता है, तो उसे पांच वर्ष तक की कैद और जुर्माने की सजा मिल सकती है। यदि कोई पहले से विवाहित होने के बावजूद लिव इन संबंध में रहता है, तब भी उसके खिलाफ पांच वर्ष तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान रहेगा। यदि लिव इन संबंध में शामिल किसी भी पक्ष की उम्र 18 वर्ष से कम होती है, तो उसके खिलाफ POCSO कानून के तहत कार्रवाई होगी।
राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद मध्य प्रदेश में यह कानून लागू हो जाएगा। इसके साथ ही राज्य समान नागरिक संहिता लागू करने वाले राज्यों की सूची में औपचारिक रूप से शामिल हो जाएगा। सरकार इसे सामाजिक समानता और महिला अधिकारों को मजबूत करने वाला कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे संवैधानिक और सामाजिक दृष्टि से विवादित बताते हुए लगातार सवाल उठा रहा है।