दिल्ली में सत्ता बदल का आंदोलन चल पड़ा है, ठीक वैसे ही जैसा बांग्लादेश और नेपाल में देखने को मिला था। यह आंदोलन सिर्फ नीट का पर्चा लीक होने का नहीं है, बल्कि यहां नीट का पर्चा लीक होने से छात्रों को हुए नुकसान पर कोई बात ही नहीं कर रहा। हालांकि यहां तिलचट्टे इसे छात्रों के हित का आवरण पहनाते दिख रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि यहां हर तिलचट्टा 370, राम मंदिर, टुकड़े-टुकड़े, उमर खालिद, शरजील इमाम, वामपंथ और एफसीआरए का एजेंडा लेकर बैठा हुआ है। हर कोई राष्ट्र की एकता और अखंडता को खंडित करने पर आमादा है। क्या आंदोलन का स्वरूप ऐसा होता है?
एक समय था, जब जेपी आंदोलन के प्रणेता रहे जयप्रकाश नारायण ने शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन किया। सम्पूर्ण क्रांति के दौरान जेपी ने छात्रों और आम लोगों को अहिंसक तरीके से व्यवस्था परिवर्तन और भ्रष्ट सरकारों के खिलाफ सत्याग्रह के लिए प्रेरित किया था। यदि यहां भी छात्रहित, नीट का पर्चा लीक होने से हुए छात्रों के नुकसान और आत्महत्या का मामला होता, तो शायद इसे लोगों का समर्थन मिल पाता। लेकिन यहां तो आंदोलन के शुरू होने के साथ ही अनशन स्थल पर समोसे-पकौड़ों की दुकानें सज गईं, वह भी एक विशेष कौम के लोगों की, जो शाहीन बाग में भी लोगों को मुफ्त की बिरयानी बांटते रहे।
अब जहां तक बात है कथित वैज्ञानिक सोनम वांगचुक की, तो एक बात तय है कि उसने लद्दाख में भी लोगों को उकसाया। इसी उकसाई गई भीड़ ने पूरे लद्दाख को जला डाला। इसी अराजकता के चलते सोनम वांगचुक पर एनएसए की धाराएं भी लगाई गईं और उसे जेल में भी डाला गया। मामला केवल इतना था कि वर्ष 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद फॉरेन फंडिंग के मामलों पर सरकार लगातार सख्त होती चली गई। इसी बीच वांगचुक के एनजीओ सेकमॉल पर भी विदेशों से फंडिंग आने पर रोक लग गई। लगती भी क्यों न? आखिर विदेशों से फंडिंग लेकर वांगचुक पर देश में अराजकता फैलाने सहित कई आरोप लगे और उसे जेल जाना पड़ा।
अब दोबारा वांगचुक ने एफसीआरए के विरोध में अपना अनशन शुरू किया, लेकिन छद्मावरण ऐसा कि उसने नीट के छात्रों के पर्चे लीक होने के विरोध को अपना हथियार बना लिया। दरअसल, वांगचुक को केवल अपने एनजीओ सेकमॉल के लिए विदेशी फंडिंग चाहिए और सरकार ने इस पर रोक लगा दी है। ऐसे में उसने छात्रों की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने की साजिश रची। इसी बीच कॉकरोच आंदोलन के सरगना अभिजीत दीपके भी विशेष कौम के विशेष महीने की तर्ज पर अपना अनशन जारी रखे हुए हैं। सूरज उगने से पहले और सूरज ढलने के बाद मुर्ग-मुसल्लम की दावत उड़ाकर अनशनकारी बने हुए हैं।

एक बात और, जब वांगचुक के पक्ष में माहौल नहीं बन पा रहा है, तो अब वामपंथी उसे आदिवासी बताकर आदिवासियों का समर्थन जुटाने का प्रयास कर रहे हैं। इधर अभिजीत दीपके को भी दलित बताकर दलित कार्ड खेला जा रहा है। यहां मेरा सवाल यही है कि छात्रों के आंदोलन में यह आदिवासी और दलित कार्ड खेलने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसका जवाब यही है कि पूरे देश में अब यह कॉकरोच आंदोलन एक्सपोज हो चुका है। प्रकाश राज, कुणाल कामरा, अरविंद केजरीवाल, संजय सिंह, आतिशी और मनीष सिसोदिया सरीखे वामपंथी अब एक मंच पर आ चुके हैं। मंच से ही छात्रों को पूरा राष्ट्र जलाने के लिए उकसाया जा रहा है। ऐसे में आप बेहतर समझ सकते हैं कि आंदोलन किस दिशा में जा रहा है।
सोनम वांगचुक और अभिजीत दीपके जैसे कॉकरोचों के खिलाफ माहौल बनने लगा, तो उनका पूरा इकोसिस्टम अब सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को 50-50 हजार रुपये का लालच देकर अपने पक्ष में वीडियो और पोस्ट सोशल मीडिया पर डालने का झांसा दे रहा है। इस ई-मेल के वायरल होने के साथ ही सोशल मीडिया पर I SUPPORT SONAM WANGCHUK वाले पोस्टर भी लगातार स्टोरीज में लगाए जा रहे हैं और वायरल किए जा रहे हैं, ताकि बची-कुची इज्जत बनी रह सके। यहां सवाल यह भी उठ रहा है कि जब सारे आंदोलनकारी छात्र हैं, तो इतनी बड़ी रकम उन्हें मिल कहां से रही है? उन्हें फंडिंग कहां से हो रही है? मामला साफ है। यह सारी फंडिंग डीप स्टेट और राष्ट्र विरोधी वामपंथी ताकतों से मुहैया हो रही है, ताकि देश में अस्थिरता लाने के साथ सत्ता बदल किया जा सके।
कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यही है कि देश के युवाओं की ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग किया जाए, न कि उन्हें नकारात्मकता के दलदल में धकेला जाए। युवाओं की ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण में लगाने के बजाय ये वामपंथी आंदोलन के सरगना उन्हें राष्ट्र के विनाश में शामिल कर रहे हैं। अब जबकि उनके आंदोलन की वास्तविकता काफी हद तक सामने आ चुकी है, तो किसी न किसी तरह इस कथित आंदोलन को बनाए रखने की कोशिश के साथ ही सत्ता बदल की नाकाम कोशिश को अंजाम देने का प्रयास ये कॉकरोच कर रहे हैं।
लेख
ऋषि भटनागर
बस्तर की माटी में ही जन्म हुआ। मूल रूप से पत्रकार। कई प्रमुख समाचार पत्रों और संस्थानों से जुड़े रहे। वर्तमान में कॉन्टिनेंटल छत्तीसगढ़ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में जनसंपर्क अधिकारी (PRO) के रूप में कार्यरत हैं तथा स्वतंत्र पत्रकार के रूप में भी सक्रिय हैं। विश्व संवाद केंद्र से स्तंभकार के रूप में भी जुड़े रहे हैं। सक्रिय पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों तक कार्य किया। हरिभूमि से पत्रकारिता की शुरुआत की, फिर नवभारत और दैनिक भास्कर जैसे प्रमुख संस्थानों में कार्य किया। इसके अलावा कुछ समाचार चैनलों में भी अपनी सेवाएँ दीं।