क्या छात्रों के आक्रोश को सरकार विरोधी अभियान में बदल दिया गया?

क्या पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुआ छात्र आंदोलन सुनियोजित तरीके से सरकार विरोधी अभियान में बदल दिया गया, जबकि कई राज्यों में ऐसे मामलों पर चुप्पी रही?

The Narrative World    23-Jul-2026   
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लोकतांत्रिक देशों में आंदोलन होना कोई नई बात नहीं है। वर्ग-विभाजन के सिद्धांतकारों ने हमेशा छात्र, किसान, श्रमिक और स्त्री को 'शोषित समाज' के मुख्य चेहरों के रूप में रेखांकित किया है। उनकी दृष्टि में ये वर्ग इतिहास के हर दौर में व्यवस्थागत शोषण और वंचना की मार झेलते आए हैं। इनके साथ अन्याय होता आया है। यही कारण है कि एक जीवंत लोकतंत्र में इन चेहरों को केंद्र में रखकर अन्याय के विरुद्ध कहीं भी और कभी भी बड़े आंदोलन खड़े किए जा सकते हैं। लेकिन असली चिंता आंदोलन खड़े होने की नहीं, बल्कि उनके सेलेक्टिव होने और उनके पीछे छिपे गुप्त उद्देश्य की है।
 
वर्ष 2014: सेना भर्ती परीक्षा का पेपर लीक हुआ। कहाँ? राजस्थान में। तब वहाँ भाजपा की सरकार थी। चयन आधारित आंदोलन वहाँ तो होना ही चाहिए था, लेकिन नहीं हुआ। जानते हैं क्यों? क्योंकि लीक का नेटवर्क पुराना था।
 
वर्ष 2021: REET लेवल-2 परीक्षा का पेपर लीक हुआ। कहाँ? राजस्थान में। कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ। परीक्षा रद्द कर दी गई।
 
वर्ष 2022: वरिष्ठ शिक्षक भर्ती परीक्षा। कहाँ? राजस्थान में। उदयपुर की एक चलती बस में अभ्यर्थी परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र हल करते पकड़े गए। कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ। परीक्षा रद्द कर दी गई।
 
वर्ष 2023: TSPSC ग्रुप-1 प्रिलिम्स का पेपर लीक हुआ। कहाँ? तेलंगाना में। कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ। परीक्षा रद्द कर दी गई।
 
वर्ष 2022: स्कूल सेवा आयोग की प्राथमिक शिक्षक भर्ती में ओएमआर शीट से छेड़छाड़ और ओएमआर डेटा लीक हुआ। कहाँ? पश्चिम बंगाल में। कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ। परीक्षा रद्द कर दी गई।
 
वर्ष 2024: कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल परीक्षा का सामान्य ज्ञान का पेपर परीक्षा के दिन ही लीक हो गया। कहाँ? झारखंड में। कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ। परीक्षा रद्द कर दी गई।
 
वर्ष 2022: जूनियर ऑफिस असिस्टेंट भर्ती परीक्षा का पेपर लीक हुआ। कहाँ? हिमाचल प्रदेश में। कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ। परीक्षा रद्द कर दी गई।
 
वर्ष 2022: नायब तहसीलदार भर्ती परीक्षा का पेपर लीक हुआ। कहाँ? पंजाब में। पूरा गिरोह पकड़ा गया, लेकिन कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ। परीक्षा रद्द कर दी गई।
 
यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्य में भी पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर पेपर लीक हुए हैं। योगी सरकार के कार्यकाल में पुलिस कांस्टेबल भर्ती और शिक्षक पात्रता परीक्षा जैसी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक हुए। इसके बावजूद वहाँ कोई बड़ा या अनियंत्रित आंदोलन खड़ा नहीं हुआ। लेकिन इसके पीछे का मुख्य कारण सेलेक्टिव होना नहीं था। आंदोलनकारी भी भली-भाँति जानते थे कि उत्तर प्रदेश प्रशासन के सख्त रवैये और दिल्ली पुलिस की कार्यशैली में जमीन-आसमान का अंतर है।
 
ऐसे में मूल प्रश्न अब भी जस का तस बना हुआ है कि आखिर यह आंदोलन सेलेक्टिव क्यों है?
 
इसका सीधा सा उत्तर है, इन आंदोलनों के पीछे छिपे गुप्त एजेंडे को साधना। देश में अराजकता पैदा करके लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को उखाड़ फेंकना। ठीक वैसी ही खतरनाक मंशा, जैसी हाल के वर्षों में हमारे कुछ पड़ोसी देशों में देखने को मिली है। व्यवस्था के विरुद्ध लोगों को उकसाना और ऐसा संवेदनशील मुद्दा तलाश करना, जिससे सरकार का एक कट्टर समर्थक भी उसका धुर विरोधी बन जाए। यही ब्रेकिंग इंडिया फोर्सेज का सबसे सुनियोजित मॉड्यूल है।
 
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इस बार उन्हें वह मनचाहा संवेदनशील मुद्दा मिल गया। बच्चों के भविष्य से जुड़े मुद्दे पर भला कौन एकजुट नहीं होगा? वह भी ऐसे समय में, जब यूजीसी के नियमों और राममंदिर के चढ़ावे में कथित हेराफेरी जैसे मुद्दों को लेकर लोगों में पहले से असंतोष उबल रहा है। भीड़ जुटी, लोगों का मानस बदला और इस कदर बदला कि उन्हें खुद पता ही नहीं चला कि 'शिक्षा मंत्री इस्तीफा दो' का नारा कब 'बस नाम रहेगा अल्लाह का' और 'स्मैश ब्राह्मिनिकल हिंदुत्व' में तब्दील हो गया। फिर एक दिन वह भी आया, जब इस भीड़ में वास्तविक विद्यार्थी कम और राजनीतिक स्वार्थ साधने वाले तत्व अधिक नजर आने लगे। अंततः बेलगाम भीड़ सरकार उखाड़ने के उद्देश्य से संसद की ओर बढ़ चली।
 
चार स्तर के बैरिकेड्स टूटे। उन्हें तोड़ा किसने? क्या उन लोगों ने, जिन्होंने आंदोलन का आह्वान किया था? नहीं। जब बैरिकेड्स टूट रहे थे, तब आंदोलन के मुख्य सूत्रधारों में से कोई कहीं बैठकर बर्गर का आनंद ले रहा था, तो कोई जेपी नड्डा के घर चाय की चुस्कियाँ ले रहा था। अंततः सड़कों पर लाठीचार्ज हुआ। इस लाठीचार्ज की मार उन मासूम छात्रों और युवाओं ने झेली, जो केवल अपने उज्ज्वल भविष्य की आस में इस भीड़ का हिस्सा बने थे। नेतृत्व करने वाले सुरक्षित कमरों में बैठकर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहे थे, जबकि सड़कों पर दौड़ता हुआ आम छात्र व्यवस्था की लाठियों और अपने टूटे सपनों के बीच लहूलुहान खड़ा था। यही इस सुनियोजित मॉड्यूल की अंतिम कड़वी सच्चाई है।
 
  
लोगों में पीड़ा है। हर तरफ दुहाई दी जा रही है कि छात्रों पर लाठीचार्ज हुआ। कहा जा रहा है कि लाठीचार्ज अमानवीय है, असंवैधानिक है। तो साहब, संवैधानिक क्या है? क्या सुरक्षा के बैरिकेड्स तोड़ देना संवैधानिक है? क्या संसद की ओर धावा बोल देना संवैधानिक है? या फिर जनता की चुनी हुई सरकार के प्रधानमंत्री को हटाकर उस कुर्सी पर सोनम वांगचुक या अभिजीत दीपके को बिठाने की मंशा रखना संवैधानिक है?
 
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अब रही बात सरकार की जवाबदेही की। तो बताइए, जवाबदेही और क्या होती है? पेपर लीक की खबर मिलते ही तत्काल दोषियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है। देश के शिक्षा मंत्री ने स्वयं प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सार्वजनिक रूप से माफी मांगी और मात्र एक महीने के भीतर वही परीक्षा दोबारा आयोजित कराकर आंदोलन के दौरान ही नतीजों की घोषणा भी कर दी। आखिर इसके अलावा और कैसी जवाबदेही चाहिए? लेकिन नहीं। जवाबदेही के नाम पर उन्हें तो इस्तीफा ही चाहिए। और जानते हैं क्यों? क्योंकि खेल बहुत बड़ा है। आज शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ले लिया, तो कल इसी के दम पर इससे भी बड़ा बवंडर खड़ा करेंगे और सीधे प्रधानमंत्री के इस्तीफे पर अड़ जाएंगे।
 
अच्छा, एक बात बताइए। अगर ऑनलाइन शॉपिंग में कोई डिलीवरी बॉय आपका महँगा फोन चुराकर डिब्बे में पत्थर रख दे, तो क्या आप कंपनी के मालिक का इस्तीफा मांगेंगे? या अगर आपके साथ ऑनलाइन धोखाधड़ी हो जाए, तो क्या आप नैतिकता का ढोंग रचकर सीधे बैंक मैनेजर की कुर्सी मांगने पहुँच जाएंगे? नहीं न? तो फिर परीक्षा के नाम पर देश में यह राजनीतिक तमाशा क्यों खड़ा किया जा रहा है? जो केजरीवाल आज शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांग रहे हैं, उन्होंने जेल जाने के बाद भी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया था। क्या आप यह बात भूल गए हैं?
 
 
सच्चे नागरिक बनिए। व्यवस्था की कमियों और त्रुटियों को सुधारने की मांग जरूर कीजिए, मगर सावधान रहिए कि कहीं आप अनजाने में किसी राष्ट्रविरोधी षड्यंत्र का मोहरा न बन जाएँ। अन्यथा, जिस दिन आपका स्वबोध जागेगा, उस दिन एक गहरे पश्चाताप और आत्मग्लानि के सिवा आपको कुछ हासिल नहीं होगा।
 
लेख
 
Karuna Sagar Panda
 
करुणा सागर पण्डा
सामाजिक चिंतक
रायपुर, छत्तीसगढ़