17 जुलाई को अमेरिकी दूतावास की सुरक्षा सलाहकार ने 20-21 जुलाई को जंतर मंतर, संसद भवन और किसान घाट पर बड़े प्रदर्शनों की चेतावनी दी थी। ठीक उसी दिन संसद का मानसून सत्र शुरू हो रहा था और विदेशी अंशदान विनियमन (FCRA) संशोधन नियमों पर चर्चा/प्रस्तुति होनी थी। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के 'NEET पेपर लीक' के नाम पर शुरू हुए प्रदर्शन की आड़ में जो हिंसा भड़की, जिसमें RAF अधिकारियों पर जानलेवा हमले, "भगा दिया" के नारे, मंदिरों तथा सरकारी और निजी संपत्तियों पर पथराव, पुलिस से झड़प जैसी घटनाएं सामने आईं, उनका असली लक्ष्य FCRA नियमों में लाई गई पारदर्शिता का विरोध करना था।
क्या हैं FCRA के नए नियम?
22 जून 2026 को गृह मंत्रालय द्वारा अधिसूचित FCRA नियमों में संशोधन ने धार्मिक संगठनों और NGOs पर सख्त डिस्क्लोजर की अनिवार्यता लागू की है। अब FCRA पंजीकृत संस्थाओं को अपनी गतिविधियों, भौगोलिक कार्यक्षेत्र, सोशल मीडिया अकाउंट्स, आधिकारिक वेबसाइट और वर्ष भर में जारी प्रकाशनों जैसे किताबें, पत्रिकाएं, अखबारों में प्रकाशित लेख आदि की विस्तृत जानकारी देनी होगी।
अगर कोई धार्मिक NGO अपना पंजीकृत कार्यक्षेत्र या उद्देश्य बदलना चाहता है, तो उसे केंद्र सरकार से पूर्व अनुमति लेनी होगी। सरकार जांच के बाद मंजूरी दे सकती है या उसे अस्वीकार भी कर सकती है।
सरकार ने धार्मिक संगठनों के लिए 16 अनुमत गतिविधियां स्पष्ट की हैं, जिनमें पूजा स्थलों का निर्माण और रखरखाव, पवित्र ग्रंथों का संरक्षण, धार्मिक दर्शन का अध्ययन, तीर्थ सुविधाएं, धर्मशालाएं और लंगर, धार्मिक शिक्षा एवं ध्यान शिविर, भक्ति संगीत और नाट्य, स्वदेशी आस्था परंपराओं का दस्तावेजीकरण, पवित्र अवशेषों तथा धरोहर स्थलों की सुरक्षा, धार्मिक अनुष्ठानों का अभिलेखन, अंतरधार्मिक संवाद, धार्मिक प्रकाशन एवं शोध, धार्मिक पुस्तकालय और म्यूजियम, आस्था आधारित परामर्श एवं नशामुक्ति केंद्र, पारंपरिक पवित्र शिल्पों का प्रशिक्षण तथा श्मशान और दाह संस्कार स्थलों का रखरखाव शामिल हैं।
लेकिन इनमें से किसी भी गतिविधि का उपयोग धर्मांतरण के लिए करने पर स्पष्ट प्रतिबंध लगाया गया है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि मूल FCRA अधिनियम 2010 में कोई बदलाव नहीं किया गया है। केवल अधीनस्थ नियमों को और सख्त किया गया है, जो कार्यकारी शक्ति के दायरे में पूरी तरह वैध है। इसके बावजूद कांग्रेस, CPI(M), DMK, TMC, SDPI और कुछ चर्च संगठन इसे 'दमनकारी' और 'अलोकतांत्रिक' बता रहे हैं। असली वजह यह बताई जा रही है कि ये नियम विदेशी फंड के दुरुपयोग पर लगाम कसते हैं, खासकर राजनीतिक उकसावे, अशांति और धर्मांतरण के लिए इस्तेमाल होने वाले पैसों पर।
CJP प्रोटेस्ट और FCRA का क्या संबंध है?
CJP प्रदर्शन में शामिल सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल को इसी FCRA मुद्दे से जोड़ा जा रहा है। 2025 में गृह मंत्रालय ने CBI जांच के बाद उनके NGO SECMOL का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया था। 2007 में UPA सरकार के दौरान लेह के तत्कालीन उपायुक्त ने उनके खिलाफ विदेशी फंड के गबन, सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा, पाकिस्तान और चीन कनेक्शन तथा लद्दाख की सद्भावना बिगाड़ने जैसे आरोप लगाए थे।
2025 में लेह हिंसा, जिसमें 4 लोगों की मौत हुई और 80 से अधिक लोग घायल हुए, के बाद लद्दाख DGP ने वांगचुक पर पाकिस्तान के एक इंटेलिजेंस ऑपरेटिव से सीधे संबंध होने और NSA के तहत गिरफ्तारी का खुलासा किया। लेख के अनुसार, वांगचुक ने नेपाल जैसी हिंसा का उल्लेख कर लोगों को भड़काया। FCRA रद्द होने के बाद वे 'छात्र आंदोलन' से जुड़ गए। लेख के अनुसार, यह कोई संयोग नहीं बल्कि FCRA के कड़े होने से प्रभावित तत्वों द्वारा सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास है।
शबाना आजमी और विदेशी फंड
शबाना आजमी 19 और 20 जुलाई को जंतर मंतर पहुंचीं और CJP तथा वांगचुक का समर्थन किया। उनकी संस्था एक्शनएड एसोसिएशन (इंडिया) को 2006-07 में 108.02 करोड़ रुपये का विदेशी फंड मिला था, जिसे धार्मिक/ईसाई श्रेणी में दर्ज किया गया। 2014-15 में संस्था को 87.13 करोड़ रुपये प्राप्त हुए, जिनमें से बड़ा हिस्सा ग्रासरूट NGOs को ट्रांसफर किया गया। फंडर्स में UK Foreign Office, European Commission, संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां, डेनमार्क, नॉर्वे आदि शामिल थे।
2002 से शबाना आजमी का राजनीतिक रुख मोदी विरोधी रहा है। FCRA नियमों का विरोध उनके और उनके जैसे अन्य लोगों के लिए स्वाभाविक है, क्योंकि ये नियम विदेशी फंड के 'धर्म-राजनीतिक' इस्तेमाल को उजागर करते हैं।
चर्च-मिशनरी नेटवर्क और विपक्ष का एकजुट मोर्चा
केरल के कई ईसाई चर्च और मिशनरी संगठनों ने FCRA नियमों का विरोध किया। KCBC के Jagratha Commission के सचिव फादर माइकल पुलिक्कल ने कहा कि इससे अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतंत्रता प्रभावित होगी। कुछ संगठनों ने मुंबई और दिल्ली से ईसाई कॉलेज छात्रों को विरोध प्रदर्शन में शामिल करने की योजना भी बनाई।
कांग्रेस, वामपंथी दल और कुछ अल्पसंख्यक संगठनों ने भी इन नियमों को वापस लेने की मांग की। 2 अप्रैल 2026 को संसद में भी इसी मुद्दे पर हंगामा हुआ था। ये दल जानते हैं कि नए नियम विदेशी फंडेड Proselytization नेटवर्क्स पर सीधा असर डालेंगे। इसलिए वे 'धर्म की आजादी' के नाम पर विदेशी हस्तक्षेप की रक्षा कर रहे हैं।
अमेरिकी 'डीप स्टेट' और CJP का कनेक्शन
US Senate Foreign Relations Committee के चेयरमैन जेम्स रिश ने FCRA संशोधन को "गहरी चिंता" का विषय बताया और अमेरिका से जुड़े ईसाई संगठनों पर "परेशानी" न डालने की सलाह दी। अमेरिका भारत में सबसे बड़ा विदेशी फंड दाता रहा है।
CJP के अभिजीत दिपके अमेरिका से लौटकर आंदोलन चला रहे हैं। सोशल मीडिया पर CJP के समर्थन में हजारों पोस्ट, कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार 10,000 से अधिक, चलाए गए, जिनमें प्रति पोस्ट 50 से 65 हजार रुपये तक दिए जाने के आरोप लगे। कुल डिजिटल खर्च करोड़ों रुपये तक पहुंच सकता है।
2025 में नेपाल में Gen-Z प्रोटेस्ट के जरिए KP ओली सरकार को गिराने में अमेरिकी डीप स्टेट की भूमिका के आरोप लगे थे। इसी आधार पर भारत में भी युवाओं के गुस्से को भड़काने, सोशल मीडिया नैरेटिव को नियंत्रित करने और FCRA जैसे संप्रभु निर्णय को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।
FCRA का मूल उद्देश्य विदेशी योगदान को पारदर्शी और राष्ट्रीय हित के अनुरूप रखना है। सच्चे सामाजिक, शैक्षिक और धार्मिक कार्य करने वाले संगठनों को इससे कोई भय नहीं होना चाहिए। लेकिन जब विदेशी धन का उपयोग धर्मांतरण, राजनीतिक अस्थिरता या अशांति फैलाने के लिए किया जाए, तो भारत को अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए कदम उठाने का पूरा अधिकार है।
इस पूरे विवाद में विदेशी शक्तियों का हस्तक्षेप स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। US Senate Foreign Relations Committee के चेयरमैन जेम्स रिश द्वारा FCRA संशोधनों को "गहरी चिंता" का विषय बताना और CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके का अमेरिका से लौटकर आंदोलन का नेतृत्व करना, एक व्यापक विदेशी जुड़ाव की ओर संकेत करता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, सोशल मीडिया पर CJP के समर्थन में चलाए गए लगभग 10,000 पोस्ट के लिए भारी धनराशि, प्रति पोस्ट 50 से 65 हजार रुपये तक, खर्च की गई, जिसका कुल डिजिटल बजट करोड़ों रुपये में होने का अनुमान है। लेख के अनुसार, यह भारत के आंतरिक नीतिगत निर्णयों, विशेषकर FCRA, को प्रभावित करने के लिए एक समन्वित और भारी वित्तपोषित विदेशी तंत्र की सक्रियता को दर्शाता है।
जंतर मंतर की हिंसा, वांगचुक का FCRA उल्लंघन रिकॉर्ड, चर्चों और विपक्ष का विरोध, अमेरिकी सलाह तथा CJP का आंदोलन, ये सभी एक ही धागे में जुड़े हुए हैं। FCRA नियमों में पारदर्शिता लाना राष्ट्रहित में बताया गया है। विदेशी ताकतों और उनके भारतीय एजेंटों को यह स्वीकार नहीं है। परिणामस्वरूप, विदेशी ताकतें अब भारत के बच्चों को बरगलाने का प्रयास कर रही हैं।
लेख
केवली कबीर जैन
पत्रकारिता छात्र, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय