क्या है CJP प्रोटेस्ट का असली मकसद?

क्या संसद मार्च, इस्तीफे की मांग और FCRA संशोधन की टाइमिंग यह संकेत देती है कि आंदोलन का उद्देश्य छात्रों से कहीं आगे है?

The Narrative World    24-Jul-2026   
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अभी सोशल मीडिया में सब तरफ हमें एक ही मुद्दा दिख रहा है: कॉकरोच जनता पार्टी का विरोध प्रदर्शन। लेकिन हमारे देश के सीधे-सादे युवाओं को गुमराह करके, देश की राजधानी में जो यह अराजकता फैलाई जा रही है, उससे जुड़े कुछ ऐसे सत्य हैं जो अधिकांश लोगों के ध्यान में नहीं आए हैं।
 
इसलिए नीट (NEET) परीक्षा में गड़बड़ी के बहाने देश को सुलगाने की जो साजिश रची जा रही है, उस एंटी-भारत एजेंडे को समझना और समझाना, दोनों आवश्यक है।
 
आंदोलन की पूर्व-योजना और क्रोनोलॉजी
 
सबसे पहला सच यह है कि यह आंदोलन पहले से ही प्लान हो चुका था, विषय बाद में ढूंढा गया! इसका मतलब यह है कि यदि NEET पेपर लीक का विषय नहीं भी होता, तो भी ये राष्ट्र-विरोधी ताकतें कोई न कोई दूसरा मुद्दा ढूंढकर इस देश में आग लगाने की कोशिश जरूर करतीं।
 
इसकी क्रोनोलॉजी को समझिए। 15 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने अदालतों में फर्जी डिग्री लेकर घूमने वाले वकीलों और अराजक तत्वों पर टिप्पणी करते हुए उन्हें "कॉकरोच" और "पैरासाइट" (परजीवी) कहा था। इसके अगले ही दिन यानी 16 मई 2026 को, आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया का काम देखने वाले अभिजीत दीपके ने ट्विटर (X) पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) नाम से एक हैंडल बना लिया।
 
पहले दो-तीन दिन इस हैंडल का एकमात्र उद्देश्य केवल मीम्स बनाना और खुद को "बेरोजगारों की आवाज" बताना था। लेकिन अचानक 19 मई को इस आंदोलन का पूरा नैरेटिव बदल दिया गया और इसे नीट पेपर लीक से जोड़ दिया गया। यानी सीजेपी (CJP) का जन्म NEET पेपर लीक जैसे विषय को लेकर हुआ ही नहीं था और न ही यह सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के कारण हुआ था। ये दोनों विषय तो केवल एक टूल बन गए।
 
आंदोलन का असली उद्देश्य और विदेशी फंडिंग
 
अब प्रश्न उठता है कि फिर यह आन्दोलन हुआ ही क्यों? इसका कारण तो वही है जो किसान आंदोलन, शाहीन बाग आदि सभी के पीछे था: भारत को अस्थिर करना। जो राष्ट्र-विरोधी तत्व चुनाव के माध्यम से सत्ता तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, वे इस अराजकता को हथियार बनाकर सत्ता प्राप्ति का अपना उद्देश्य पूरा करना चाहते हैं, ठीक वैसा ही जैसा नेपाल और बांग्लादेश में हुआ।
 
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उदाहरण के लिए, इस बार इस भारत-विरोधी एजेंडे को हवा देने की पूरी जिम्मेदारी 'Internet Freedom Foundation' नाम की अमेरिकी संस्था को सौंपी गई थी। सोशल मीडिया पर, विशेष रूप से इंस्टाग्राम पर जो एल्गोरिदम का खेल खेला गया और रातों-रात सीजेपी के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स को 5.2 मिलियन (52 लाख) तक पहुँचा दिया गया, यह सब इसी का परिणाम है।
 
जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, इसके पीछे शामिल भारत-विरोधी ताकतें एक-एक कर सामने आ रही हैं। अभी 21 जुलाई 2026 को ढाका से 'बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी' ने भारत में चल रहे इस सीजेपी आंदोलन के समर्थन में एक आधिकारिक पत्र जारी किया है। जो जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश में तख्तापलट और हिंदुओं के नरसंहार के पीछे थी, वह आज सीजेपी के इस तथाकथित छात्र आंदोलन को क्रांतिकारी बताकर उसका खुलेआम समर्थन कर रही है।
 
इसी तरह, खालिस्तानी आतंकी संगठन 'सिख फॉर जस्टिस' के अमेरिका में बैठे आतंकी गुरुवंत सिंह पन्नू ने ज़ूम (Zoom) के माध्यम से CJP के एक्टिविस्ट्स से बात कर उन्हें 10 करोड़ रुपये की फंडिंग देने की बात कही है। इसके अलावा, इस आन्दोलन में दिख रहे वामपंथी (लेफ्ट) नेताओं, कम्युनिस्ट छात्र संगठनों के कार्यकर्ताओं और सीजेपी के कर्ताधर्ताओं की सोशल मीडिया पर चल रही तस्वीरों के कारण, इन सबके चीन के साथ सीधे और गुप्त संबंध तो हम जानते ही हैं।
 
भारत में अरविन्द केजरीवाल इस आंदोलन के मुख्य सूत्रधार रहे हैं। केजरीवाल और उनके लोग इस अराजकता के पीछे खड़े हैं। खुद CJP का संस्थापक अभिजीत दीपके पूर्व में आम आदमी पार्टी (AAP) का सोशल मीडिया वर्कर रह चुका है।
 
इस्तीफे की मांग और नई शिक्षा नीति का विरोध
 
अब प्रश्न आता है कि इनकी केवल एक मांग है कि शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान इस्तीफा दें। लेकिन ये लोग धर्मेन्द्र प्रधान के पीछे क्यों पड़े हैं? जबकि देश में पहली बार धर्मेन्द्र प्रधान के नेतृत्व में ही पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकने के लिए 2024 में एक कड़ा पब्लिक एग्जामिनेशन कानून बनाया गया, जिसमें पेपर लीक करने वालों के लिए 10 साल की कैद और 1 करोड़ रुपये के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। फिर इस्तीफे की मांग क्यों?
 
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इसका एक सरल-सा उत्तर यह है कि धर्मेन्द्र प्रधान के नेतृत्व में शिक्षा मंत्रालय ने नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन पर तेज और ठोस काम किया है। इसके चलते वामपंथियों द्वारा लिखे गए इतिहास को सुधारने के साथ-साथ, पाठ्यक्रमों में भारतीय ज्ञान परम्परा को भी मुख्यधारा का स्थान मिल रहा है। तो दिन भर भारत की संस्कृति और परम्परा को गालियाँ देने वाले लोग इसे कैसे सहन कर पाते?
 
इससे पहले भी, जब नई शिक्षा नीति बनाने पर तेजी से काम चल रहा था, तब रोहित वेमुला का झूठा मामला उठाकर इसी तरह तत्कालीन शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी के इस्तीफे की मांग पर ये लोग अड़े थे।
 
FCRA कानून और आंदोलन की टाइमिंग
 
खैर, मुख्य प्रश्न यह है कि आंदोलन की टाइमिंग अभी ही क्यों चुनी गई? क्योंकि NEET का तो कोई मुद्दा ही नहीं बनता है। सरकार को जिस जिम्मेदारी को लेने के लिए ये कह रहे हैं, वह तो CJP बनने से पहले ही सरकार ने ले ली थी।
 
वास्तव में इसका एक बड़ा कारण है: FCRA कानून। यह आंदोलन नीट (NEET) के छात्रों की भलाई के लिए नहीं, बल्कि FCRA नियमों को सख्त बनाने वाले संशोधन बिल को संसद में पेश होने से रोकने की एक बड़ी साजिश है।
 
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इस विरोध प्रदर्शन का समय देखिए। पूरे आन्दोलन का अब तक का सबसे बड़ा आयोजन यानी संसद मार्च उसी दिन किया गया (20 जुलाई 2026), जिस दिन संसद का मानसून सत्र शुरू हो रहा था। यह कोई संयोग नहीं है कि जब भी देशहित में कोई मजबूत कानून आता है, ये कथित जन-आंदोलन अचानक सक्रिय हो जाते हैं। इस बार इस सख्त कानून के विरोध में एनजीओ (NGOs) और उनके समर्थकों ने देश में अराजकता का माहौल खड़ा कर दिया है, ताकि सरकार पर दबाव बनाया जा सके।
 
भूख हड़ताल पर बैठे लद्दाखी कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का भी असली मकसद नीट के छात्रों का समर्थन करना नहीं है, बल्कि उनके एनजीओ का FCRA लाइसेंस रद्द होने और उन पर चल रही जांच को किसी तरह बंद कराना है। सीजेपी के मंच पर समर्थन देने पहुँचीं अभिनेत्री शबाना आज़मी के इस आंदोलन में कूदने का असली कारण भी उनके एनजीओ पर कसता हुआ शिकंजा ही है।
 
शबाना आज़मी के एनजीओ को अतीत में भारी मात्रा में विदेशी फंड मिला है। वर्ष 2007 की एफसीआरए फाइलिंग के अनुसार, उसे 108.02 करोड़ रुपये का विदेशी फंड मिला था, जिसे "धार्मिक (Christian)" श्रेणी के अंतर्गत दर्ज किया गया था। वर्ष 2015 की ऑडिट फाइलिंग में भी इन्हें 87.13 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान मिला था।
 
अराजकता का स्थापित पैटर्न
 
कुल मिलाकर, जब भी देश में कोई सुधार का विषय आता है, ये राष्ट्र-विरोधी ताकतें अपनी पूरी ताकत लगाकर अराजकता खड़ी करने में लग जाती हैं:
 
  • जब देश में ऐतिहासिक कृषि कानून लाए गए, तो इन्होंने किसानों को गुमराह करके लाल किले पर तिरंगे का अपमान करवा दिया।
 
  • जब देश में नई शिक्षा नीति (NEP) लाई गई, तो इन्होंने जेएनयू से लेकर दिल्ली की सड़कों तक बवाल खड़ा कर दिया।
 
  • रोहित वेमुला का झूठा मामला खड़ा कर स्मृति ईरानी का इस्तीफा मांगना हो, किसान आंदोलन में नरेंद्र सिंह तोमर का इस्तीफा मांगना हो, या अब NEET का मुद्दा खड़ा कर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगना हो; इनका पैटर्न हमेशा एक जैसा रहता है ताकि देश में कोई भी बड़ा और लोकहित का सुधार लागू न हो सके।
 
क्या यह सचमुच एक छात्र आंदोलन है?
 
तो क्या अब भी हम यह मानकर चलें कि यह सचमुच एक छात्र आंदोलन है? जरा सोचिए, क्या असली छात्र हाथों में पत्थर लेकर दिल्ली पुलिस और सुरक्षा बलों पर हमला करते हैं? जंतर-मंतर पर भारी मात्रा में पत्थर और ईंटें बरामद की गई हैं। अर्धसैनिक बलों के जवानों को घेरकर मॉब लिंचिंग (जान से मारने) की कोशिश की गई। एक महिला पुलिस अधिकारी को सरेआम धक्का देकर गिरा दिया गया।
 
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टाइम्स नाउ (Times Now) के रिपोर्टर देव कोटक पर इस हिंसक भीड़ ने जानलेवा हमला किया, उन्हें 100 से अधिक घूंसे मारे गए, और उनका चश्मा, घड़ी तथा मोबाइल फोन तक छीन लिया गया। एक अन्य महिला पत्रकार के साथ सरेआम छेड़छाड़ और अभद्रता की गई। क्या देश के भावी डॉक्टर और पढ़े-लिखे छात्र ऐसी हरकतें कर सकते हैं?
 
इन प्रदर्शनकारियों के हाथों में जो पोस्टर थे और जो नारे ये लगा रहे थे, वे दिल दहला देने वाले थे। ये सरेआम "Fck Indian Army" जैसे अत्यंत अपमानजनक नारे लगाते दिखे। हमारे आराध्य देवी-देवताओं को इस गंदे आंदोलन में घसीटा गया। राम मंदिर के बारे में कहा गया कि "Ram Mandir and the fk, we don't care"। वहीं दूसरी ओर, इसी मंच से "बस नाम रहेगा अल्लाह का" और "मुसलमान हिंदुओं से लाख गुना बेहतर हैं, मंदिर बनाने से कोई मदद नहीं मिलती" जैसे मजहबी उन्माद से भरे नारे लगाए गए।
 
मजेदार बात तो यह है कि ये सब बातें जमकर हुईं, लेकिन जैसे ही ऑन-कैमरा इन आंदोलनजीवियों से पूछा गया कि "NEET और CBSE का फुल फॉर्म क्या है?", तो ये तथाकथित 'छात्र' और 'नीट एस्पिरेंट्स' हकलाते नजर आए।
 
हमें यह समझना होगा कि लेफ्ट और केजरीवाल समेत भारत-विरोधी ताकतों की मंशा यही है कि समस्या का समाधान कभी हो ही न, ताकि लोग हमेशा संघर्ष करते रहें। यह पूरी तरह से एक प्रायोजित राजनीतिक तमाशा है, जिसमें 'जिंदा लाश' का झूठा नाटक करके केवल सहानुभूति बटोरने का प्रयास किया गया है।
 
सरकार के त्वरित और कड़े कदम
 
वे चिल्ला रहे हैं कि सरकार जिम्मेदारी नहीं ले रही है, लेकिन वास्तव में जैसे ही गड़बड़ी की बात सामने आई, सरकार ने बिना समय गंवाए पूरे सरकारी तंत्र (Cabinet Secretariat, MHA, MoE) को सक्रिय कर दिया। 21 जून 2026 को देश के 5,440 केंद्रों पर 20 लाख से अधिक छात्रों के लिए रिकॉर्ड समय में पुनः परीक्षा का सफल आयोजन किया गया। 16 जुलाई 2026 को परीक्षा परिणाम भी घोषित कर दिए गए, ताकि ईमानदार छात्रों का पूरा साल बर्बाद न हो।
 
इस मामले को तुरंत सीबीआई (CBI) को सौंपा गया। राजस्थान की एसओजी और सीबीआई ने मिलकर त्वरित छापेमारी की और पेपर लीक नेटवर्क के मुख्य सरगनाओं समेत 13 से अधिक आरोपियों को सलाखों के पीछे भेज दिया है।
 
इसके अलावा, वर्तमान सरकार ही देश का पहला ऐसा कानून लेकर आई है, जिसके तहत पेपर लीक और परीक्षा में धोखाधड़ी करने वाले माफियाओं को 10 साल तक की कठोर कैद और 1 करोड़ रुपये तक के भारी जुर्माने का प्रावधान है। परीक्षाओं को पारदर्शी बनाने के लिए एआई (AI) आधारित सीसीटीवी कैमरे, बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन और परीक्षा केंद्रों पर 5G सिग्नल जैमर्स लगाए गए हैं, जो पहले कभी नहीं हुआ था।
 
छात्रों के लिए निष्कर्ष और चेतावनी
 
इन सब बातों का सार यही है कि ये जो आन्दोलनजीवी गैंग और विदेशी ताकतों के एजेंट एसी कमरों में बैठकर ट्वीट करते हैं, इन्हें आपके करियर से कोई लेना-देना नहीं है। ये चाहते हैं कि विद्यार्थी सड़कों पर उतरकर पत्थर फेंकें, पुलिस से लाठियां खाएं और अपने ऊपर आपराधिक मुकदमे दर्ज करवाएं।
 
याद रखिए, एक बार जब आपके ऊपर पुलिस केस दर्ज हो गया, तो आपका भविष्य हमेशा के लिए अंधकारमय हो जाएगा। आप न तो डॉक्टर बन पाएंगे और न ही कोई सरकारी या अच्छी निजी नौकरी पा सकेंगे। ये आन्दोलनजीवी तो अपना राजनीतिक हित साधकर निकल जाएंगे, लेकिन लाठियां और मुकदमों का दर्द केवल आपको और आपके माता-पिता को सहना पड़ेगा।
 
इसलिए, इस एंटी-भारत टूलकिट का हिस्सा बनने से इनकार करें। सरकार छात्रों के साथ खड़ी है और परीक्षा प्रणालियों को पूरी तरह सुरक्षित एवं पारदर्शी बनाने के लिए दिन-रात काम कर रही है। देश को अस्थिर करने की इस वैश्विक साजिश को पहचानें और अपने विवेक से काम लें।