देश के प्रधानमंत्री ने देश की अंदरूनी शांति बनाए रखने के लिए अथवा आगे किसी बड़े लक्ष्य को साधने के उद्देश्य से ऐसी फॉरेन फंडेड, फॉरेन लेंग्वेज्ड, फॉरेन फीडेड, फॉरेन माइंडेड और निर्लज्ज शक्तियों के आगे समर्पण कर दिया है। स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं का निर्वहन करते हुए और समय की संवेदनशीलता को दृष्टिगत रखते हुए उनका यह कदम बड़प्पन से परिपूर्ण अवश्य है, किंतु दीर्घकालिक दृष्टि से यह गलत ही प्रतीत होता है। इसके संभावित परिणामों के प्रति देश को अभी से सचेत होना होगा।
जहाँ तक छात्रशक्ति की बात है, सरसंघचालक आदरणीय मोहन भागवत जी ने स्पष्ट परामर्श (स्वयंसेवकों के लिए निर्देश) दिया है कि हमें बच्चों से संवाद बढ़ाना ही होगा। देश के किशोरों, युवाओं और विद्यार्थियों से संवाद की यह प्रक्रिया अब बढ़ेगी भी और निश्चित रूप से इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आएँगे।
नरेंद्र मोदी जी द्वारा कृषि कानून वापस लेते समय मैंने एक आलेख में लिखा था कि जनमत के दबाव में देश के शासक द्वारा अपने निर्णय बदलना उसके जीवंत विवेक, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्वबोध का प्रमाण होता है। यदि प्रधानमंत्री जी लोकभीरु (जनता से डरने वाले) हैं, तो यह शुभ लक्षण है।
यह भी सही है कि यदि धर्मेंद्र प्रधान जी का त्यागपत्र कराना ही था, तो वह UGC के समय ही करा लेना चाहिए था। वही उचित समय था। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का वर्तमान समय उचित नहीं है।
आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने यदि धर्मेंद्र प्रधान जी से त्यागपत्र लेकर किसी शेर की भाँति एक कदम पीछे लिया है, तो निश्चित ही किसी दीर्घकालिक एजेंडे की रक्षा और उसकी पूर्ति के लिए ही ऐसा किया होगा। मेरा विश्वास है कि उन्होंने संघशक्ति की प्रेरणा से यह कदम राष्ट्रहित में ही उठाया होगा।
इंटरनेट पर यहाँ-वहाँ बिखरे पड़े इस आंदोलन के सैकड़ों वीडियो देखिए, फिर सोचिए। उसके बाद अपने आसपास के छात्रों को भी ध्यान से देखिए। अपने नगर के छोटे-बड़े सभी कॉलेजों के विद्यार्थियों का शांतिपूर्वक अध्ययन कीजिए। फिर स्वयं से पूछिए कि इन वीडियो में दिखाई देने वाले लोग वास्तव में विद्यार्थी हैं? और यदि हैं भी, तो क्या ऐसे विद्यार्थियों के दबाव में देश की सत्ता को आ जाना चाहिए? मोदी जी हों या किसी अन्य दल के प्रधानमंत्री, उनके विषय में इस प्रकार की भाषा बोलकर जनता को भड़काना क्या उचित है? विशेषकर इन कथित छात्राओं को देखकर आप स्वयं विचार कीजिए।
मैं यह भी कहता हूँ कि ये हमारी ही देशज संतान हैं, किंतु हमारे बच्चों को किसने इतना भड़काया और बहकाया है? कौन है जिसने हमारी इस मासूम छात्रशक्ति की लज्जा और संस्कारों पर डाका डाला? इनके संस्कार अपहृत हो गए और हमें इसका आभास तक नहीं हुआ। क्या यह आंदोलन जॉर्ज सोरोस की सोच से प्रेरित है या फिर अश्लीलता और देश विभाजन के दुष्कृत्य का खुला प्रदर्शन है?
नरेंद्र मोदी जी का यह सरेंडर RSS और उसके प्रचारक मोदी के लिए चिंताजनक नहीं है। ये महाशय मोदी और यह संघ अपना झोला उठाकर कहीं भी, कभी भी चल पड़ेंगे। सोचने की आवश्यकता हमें है कि हम ऐसा प्रधानमंत्री और ऐसी संघशक्ति फिर कहाँ से लाएँगे, जो बारह वर्षों तक अद्वितीय आर्थिक विकास, गगन-पाताल को भेदने वाला इन्फ्रास्ट्रक्चर, मंगल मिशन, चंद्र मिशन, राममंदिर, अनुच्छेद 370 का हटना, कश्मीर में शांति, असम और बंगाल के रास्ते होने वाली बांग्लादेशी घुसपैठ पर रोक, विदेशों में भारत की बढ़ी हुई बार्गेनिंग पावर, पाकिस्तान में भीतर तक जाकर एयर स्ट्राइक, ऑपरेशन सिंदूर जैसे कार्य कर सके और फिर भी देश को दंगामुक्त शासन दे सके?
संघ परिवार के अतिरिक्त यदि कोई अन्य राजनीतिक दल इनमें से एक भी कार्य करता, तो पूरे देश में दंगे होते। खून की नदियाँ बहतीं। ऐतिहासिक स्तर पर मारकाट होती। कदाचित् (शायद) गृहयुद्ध जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो जाती। शाहीन बाग से लेकर जंतर-मंतर तक की घटनाएँ क्या भारत में गृहयुद्ध भड़काने की तैयारी का संकेत नहीं देतीं?
याद है न? इन्हीं लोगों के शब्द थे, "धारा 370 को छूकर देख लो, खून की नदियाँ बह जाएँगी।" और यह भी याद होगा, "पंद्रह मिनट के लिए देश की फौज और पुलिस को रोक लेना, हम इस देश में तख्तापलट कर देंगे।" तथा, "मंदिर... तारीख नहीं बताएँगे।" संघशक्ति ने ये सभी कार्य करके भी दिखा दिए और खून की नदियाँ तो दूर, देश में परिंदे को भी पर नहीं मारने दिया।
संघशक्ति के माध्यम से मोदी ने स्वयं को देश की जनता के समक्ष परिश्रमपूर्वक सिद्ध किया है। 75 वर्ष की आयु में अट्ठारह घंटे कार्य करने वाला यह बिना भगवे का संन्यासी हमारी अंतरराष्ट्रीय पूँजी है। इन्होंने इस देश से बाबर और औरंगजेब के प्रतीकों को हटाया है तथा अरब देशों में जाकर मंदिरों के शिलान्यास से लेकर प्राणप्रतिष्ठा तक के अनेक आयोजन करवाए हैं। आज यदि अरब के मुस्लिम समाज में योग और ध्यान के प्रति रुचि बढ़ी है, तो उसके पीछे भारत सरकार की भूमिका भी रही है।
यह आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के विरोध में अथवा फूलप्रूफ NEET परीक्षा प्रणाली की माँग के लिए नहीं था। यदि ऐसा होता, तो परीक्षाओं पर विश्व के सबसे प्रभावी और सख्त कानून के आने के बाद आंदोलनकारी शांतिपूर्वक हट जाते। यह आंदोलन उस संघशक्ति के विरोध में है, जो देश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने की तैयारी कर रही है, जो नागरिकता रजिस्टर जैसा बड़ा सुरक्षा कवच देने की दिशा में काम कर रही है और जो भविष्य में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को भी भारत में वापस लाने का संकल्प रखती है।
हमें यह भी सोचना चाहिए कि आखिर इन फॉरेन पावर सेंटर्स को नरेंद्र मोदी से क्या कष्ट है और क्यों है?
ये सब एक "शक्तिशाली भारत" के विरोध में खड़े हैं, जबकि हमें लगता है कि इनका विरोध केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से है।
मैं फिर कहता हूँ, ये सभी वीडियो देखिए। ऐसे ही सैकड़ों वीडियो इंटरनेट पर उपलब्ध हैं, उन्हें भी देखिए। दिल्ली छात्र आंदोलन से जुड़े AI जनरेटेड फोटो और वीडियो भी देखिए। जनता को भड़काने और भावनाएँ भड़काने वाले ऐसे फेक या नकली वीडियो और फोटो किस उद्देश्य से बनाए जा रहे हैं? कौन है जो ऐसी पिशाच बुद्धि से यह सब करा रहा है?
सनद रहे, मोदी तो केवल बहाना हैं। इनका वास्तविक लक्ष्य समूचे देश को पटिए पर लाना और देश में गृहयुद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न करना है।
धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र अपने आप में कोई बड़ी कीमत नहीं है, किंतु इसकी एक बड़ी कीमत हम पहले ही चुका चुके हैं और संभव है कि भविष्य में इससे भी बड़ी कीमतें चुकानी पड़ें। समूचे देश के लिए अब सावधान हो जाने का समय आ गया है।
मैं धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के सही या गलत होने का प्रश्न नहीं उठा रहा हूँ। मेरा प्रश्न केवल इस त्यागपत्र के समय, परिस्थिति, पृष्ठभूमि और जिस प्रकार की हठधर्मिता के बीच यह निर्णय लिया गया, उस पर है।
देश के माननीय प्रधानमंत्री ने यदि देश की अंदरूनी शांति बनाए रखने या किसी बड़े राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ऐसी फॉरेन फंडेड, फॉरेन लेंग्वेज्ड, फॉरेन फीडेड, फॉरेन माइंडेड और निर्लज्ज शक्तियों के आगे हथियार डाल दिए हैं, तो इसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। जहाँ तक छात्रशक्ति का प्रश्न है, संघ प्रमुख ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि हमें बच्चों से संवाद बढ़ाना ही होगा।
जैसा कि मैंने कृषि कानूनों की वापसी के समय भी लिखा था, जनमत के दबाव में निर्णय बदलना किसी शासक के जीवंत विवेक, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व का प्रमाण होता है। यदि प्रधानमंत्री जी लोकभीरु हैं, तो यह शुभ लक्षण है।
फिर भी मेरा मानना है कि यदि धर्मेंद्र प्रधान जी का त्यागपत्र कराना ही था, तो UGC के समय कराया जाना चाहिए था। वही उपयुक्त समय था। वर्तमान समय उचित नहीं कहा जा सकता।
आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने यदि धर्मेंद्र प्रधान जी का त्यागपत्र लेकर किसी शेर की भाँति एक कदम पीछे लिया है, तो यह निश्चित रूप से किसी बड़े और दीर्घकालिक राष्ट्रीय एजेंडे की रक्षा के उद्देश्य से ही किया गया होगा। मेरा विश्वास है कि उन्होंने संघशक्ति की प्रेरणा से यह निर्णय राष्ट्रहित में ही लिया है।
लेख
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
विदेश मंत्रालय, भारत सरकार में सलाहकार, राजभाषा