25 जून 1975 से मार्च 1977 तक भारत आपातकाल के दौर से गुजरा। इस अवधि में विपक्ष के अधिकांश प्रमुख नेता जेलों में थे, प्रेस पर सेंसरशिप लागू थी, राजनीतिक गतिविधियां सीमित थीं और नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए थे। आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का सबसे दमनकारी कालखंड था।
इसी बीच पूरे देश में भय का वातावरण था, लेकिन भूमिगत नेटवर्क के माध्यम से लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं का प्रतिरोध लगातार सक्रिय रहा। गुप्त पत्रक, साइक्लोस्टाइल साहित्य और वैकल्पिक संचार के जरिए आपातकाल के विरोध का संदेश समाज तक पहुंचाया जाता रहा। लोकतंत्र की लौ बुझी नहीं, बल्कि भूमिगत होकर और अधिक दृढ़ होती गई।
जनवरी 1977 में अचानक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा कर दी। इसके साथ ही अनेक राजनीतिक बंदियों को रिहा किया गया और चुनावी प्रक्रिया शुरू हुई। माना जाता है कि सरकार को विश्वास था कि प्रशासनिक नियंत्रण, विपक्ष की कमजोरी और विकास संबंधी अपने दावों के आधार पर वह पुनः जनादेश प्राप्त कर लेगी।
लोकतंत्र की रक्षा का भूमिगत संघर्ष
आपातकाल का विरोध केवल संसद और राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रहा। देशभर में हजारों कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के अभियान जारी रखे। इस संघर्ष में लोक संघर्ष समिति ने समन्वयकारी भूमिका निभाई। विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ बड़ी संख्या में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भी इसमें सक्रिय रहे।
14 नवंबर 1975 से 26 जनवरी 1976 तक देशव्यापी सत्याग्रह अभियान चलाया गया। छोटे-छोटे समूह सार्वजनिक स्थानों पर पहुंचकर तानाशाही के विरोध में नारे लगाते, नागरिक स्वतंत्रताओं पर हो रहे आघात की जानकारी देते और फिर स्वेच्छा से गिरफ्तारी देते थे। विभिन्न स्रोतों के अनुसार लगभग 1.30 लाख सत्याग्रहियों ने इस अभियान में भाग लिया, जिनमें बड़ी संख्या संघ के स्वयंसेवकों की थी। पंजाब में अकाली दल ने आपातकाल हटने तक लगातार सत्याग्रह जारी रखा।
जेलें राजनीतिक बंदियों से भरने लगीं। अनेक बंदियों ने हिरासत के दौरान अमानवीय व्यवहार और यातनाओं का सामना किया। समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस के भाई लॉरेंस फर्नांडिस के साथ कथित पुलिस अत्याचार तथा कर्नाटक की रंगकर्मी स्नेहलता रेड्डी की हिरासत के दौरान बिगड़ी स्वास्थ्य स्थिति उस दौर की चर्चित घटनाओं में शामिल हैं। अनेक कार्यकर्ताओं की जेलों में ही मृत्यु हुई। इन घटनाओं ने लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा के प्रश्न को और अधिक व्यापक बना दिया।
विपक्ष पहली बार एक मंच पर
इमरजेंसी का सबसे बड़ा राजनीतिक परिणाम यह हुआ कि वर्षों से अलग-अलग विचारधाराओं में बंटे विपक्षी दल एक साझा उद्देश्य के लिए एकजुट हो गए। भारतीय लोकदल, भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), समाजवादी धारा के दलों तथा अन्य समूहों ने मिलकर जनता पार्टी का गठन किया। इस गठबंधन का उद्देश्य सत्ता परिवर्तन, लोकतांत्रिक संस्थाओं की पुनर्स्थापना और नागरिक स्वतंत्रताओं की बहाली था।
इसी दौरान वरिष्ठ कांग्रेस नेता जगजीवन राम ने कांग्रेस छोड़कर 'कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी' की स्थापना की। हेमवती नंदन बहुगुणा, नंदिनी सतपथी सहित अनेक वरिष्ठ नेताओं के कांग्रेस छोड़ने से राजनीतिक वातावरण तेजी से बदलने लगा।
42वां संविधान संशोधन: सत्ता के केंद्रीकरण का प्रतीक
आपातकाल के दौरान 42वां संविधान संशोधन पारित किया गया, जिसे भारतीय संवैधानिक इतिहास के सबसे व्यापक संशोधनों में गिना जाता है। इसके माध्यम से संविधान के अनेक प्रावधानों में व्यापक परिवर्तन किए गए तथा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल पांच वर्ष से बढ़ाकर छह वर्ष कर दिया गया।
यह कार्यपालिका की शक्तियों के असाधारण विस्तार और संवैधानिक संतुलन को प्रभावित करने वाला कदम था, जो भारत में इंदिरा गांधी के बढ़ते तानाशाही शासन को और मजबूती दे रहा था। इसी अवधि में तमिलनाडु और गुजरात की निर्वाचित राज्य सरकारों को भी बर्खास्त किया गया, जिससे संघीय व्यवस्था और लोकतांत्रिक परंपराओं को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हुए।
चुनाव जिसने इतिहास बदल दिया
18 जनवरी 1977 को चुनाव की घोषणा के बाद देश का राजनीतिक वातावरण तेजी से बदलने लगा। जनता पार्टी की सभाओं में अभूतपूर्व भीड़ उमड़ने लगी। दिल्ली के रामलीला मैदान की विशाल सभा ने स्पष्ट संकेत दे दिया कि जनता का मन बदल चुका है। चुनाव का केंद्रीय प्रश्न बन गया, "तानाशाही या लोकतंत्र?"
मार्च 1977 में हुए आम चुनाव भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिने जाते हैं। उत्तर भारत में कांग्रेस को अभूतपूर्व पराजय का सामना करना पड़ा। स्वयं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गईं और संजय गांधी अमेठी से पराजित हुए।
जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। यह परिणाम केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि उस जनभावना की अभिव्यक्ति था, जिसमें मतदाताओं ने नागरिक स्वतंत्रताओं, लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों के पक्ष में अपना निर्णय सुनाया।
लोकतंत्र की संस्थाओं का पुनर्निर्माण
नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल शासन संभालना नहीं थी, बल्कि आपातकाल के दौरान हुए संस्थागत परिवर्तनों की समीक्षा करना भी था। इसी उद्देश्य से शाह आयोग का गठन किया गया, जिसने सत्ता के दुरुपयोग, प्रशासनिक कार्रवाइयों और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन से जुड़े मामलों की जांच की।
संसद ने ऐसे संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया भी प्रारंभ की, जिनसे भविष्य में किसी भी सरकार के लिए आपातकालीन शक्तियों का मनमाना उपयोग कठिन बनाया जा सके।
44वां संविधान संशोधन: इमरजेंसी से मिला सबसे बड़ा सबक
1978 में जनता सरकार ने 44वां संविधान संशोधन पारित किया, जिसे आपातकाल के अनुभवों के बाद भारतीय संविधान में किए गए सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में माना जाता है।
इस संशोधन के माध्यम से "आंतरिक अशांति" के स्थान पर "सशस्त्र विद्रोह" को राष्ट्रीय आपातकाल का आधार बनाया गया। राष्ट्रपति केवल मंत्रिमंडल की लिखित सलाह पर ही आपातकाल घोषित कर सकेंगे, यह भी सुनिश्चित किया गया। साथ ही जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक संरक्षण को अधिक मजबूत बनाया गया, ताकि भविष्य में मूल अधिकारों का मनमाना निलंबन कठिन हो।
1977 का चुनाव इमरजेंसी की समाप्ति का प्रतीक बना। इन चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र की एक मूलभूत विशेषता को पुनः स्थापित किया कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है। प्रशासनिक शक्ति, राजनीतिक बहुमत और संस्थागत नियंत्रण महत्वपूर्ण हो सकते हैं, किंतु वे मतदाता की सामूहिक इच्छा का स्थायी विकल्प नहीं बन सकते।
इस कालखंड ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है। स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष प्रेस, सक्रिय विपक्ष, नागरिक स्वतंत्रताएं और जागरूक समाज उसके समान रूप से आवश्यक स्तंभ हैं। जब इनमें से किसी एक पर भी अत्यधिक दबाव पड़ता है, तो लोकतांत्रिक संतुलन प्रभावित होता है।
लगभग पांच दशक बाद भी आपातकाल भारतीय राजनीति में इसलिए स्मरण किया जाता है क्योंकि उसने यह सिखाया कि संविधान की रक्षा केवल उसकी धाराएं नहीं करतीं, बल्कि उसकी रक्षा वे नागरिक करते हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सजग रहते हैं।
लेख
केवली कबीर जैन
पत्रकारिता छात्र, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय