छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा की ओर से भारतीय सेना में बस्तर रेजिमेंट बनाने की मांग और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के इस जवाब कि प्रस्ताव प्राप्त हो गया है तथा वर्तमान में इसकी जांच जारी है, ने बस्तर की मिट्टी की वीरता को एक बार फिर राष्ट्रीय पटल पर ला दिया है। यह मांग नई नहीं है, क्योंकि यह उस लंबी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें सेना ने समय-समय पर क्षेत्रीय और जनजातीय क्षमताओं को संगठित स्वरूप दिया है।
भारतीय सेना की रेजिमेंट व्यवस्था ब्रिटिश काल से चली आ रही है। 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने 'मार्शल रेस' सिद्धांत अपनाया। उन्होंने गोरखा, सिख, राजपूत, जाट और डोगरा जैसे कुछ समुदायों को युद्ध के लिए विशेष रूप से उपयुक्त माना। गोरखा रेजिमेंट की शुरुआत 1815 में एंग्लो-नेपाली युद्ध के बाद हुई। सिख रेजिमेंट 1846 में अंग्रेज-सिख युद्धों के बाद बनी। राजपूत, जाट और अन्य रेजिमेंट भी इसी सोच के आधार पर विकसित हुईं। ये रेजिमेंट क्षेत्रीय पहचान, स्थानीय भूगोल की समझ और सामुदायिक एकजुटता को सेना की ताकत में बदलने का माध्यम बनीं।
आजादी के बाद सरकार की औपचारिक नीति रही कि किसी खास जाति, समुदाय या क्षेत्र के लिए नई रेजिमेंट नहीं बनाई जाएगी। फिर भी व्यवहार में सेना ने क्षेत्रीय विशेषज्ञता को महत्व दिया। 1941 में जापानी खतरे के मद्देनजर शिलांग में असम रेजिमेंट का गठन किया गया। इसमें पूर्वोत्तर के आदिवासी समुदायों, जिनमें नागा, कुकी, गारो, खासी और मिजो शामिल थे, को स्थान दिया गया। इन समुदायों की पहाड़ी और जंगली इलाकों की गहरी समझ को युद्ध की आवश्यकता के अनुरूप महत्वपूर्ण माना गया।
इसका एक और स्पष्ट उदाहरण नागा रेजिमेंट है। 1960 के दशक में नागा पीपुल्स कन्वेंशन ने अलग रेजिमेंट की मांग की थी, ताकि नागा युवा राष्ट्रीय रक्षा में बड़ा योगदान दे सकें। 1 नवंबर 1970 को रानीखेत में इसकी पहली बटालियन का गठन किया गया। इसमें नागा युवाओं के साथ कुमाऊंनी, गढ़वाली और गोरखा सैनिकों को भी शामिल किया गया। कुछ पूर्व भूमिगत नागाओं को पुनर्वास शिविरों से भर्ती किया गया। रेजिमेंट का प्रतीक दाओ, भाला और मिथुन बनाया गया। यह कदम केवल सैन्य आवश्यकता तक सीमित नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय एकीकरण और स्थानीय वीरता को सम्मान देने का भी प्रतीक बना।
इसी श्रृंखला में 1963 में लद्दाख स्काउट्स का गठन हुआ। स्थानीय लद्दाखी योद्धाओं से बनी नुब्रा गार्ड्स को बाद में पूर्ण रेजिमेंट का दर्जा मिला। उच्च हिमालयी क्षेत्रों की विशेष समझ के कारण ये 'स्नो वॉरियर्स' कहलाए। अरुणाचल स्काउट्स (2010) और सिक्किम स्काउट्स (2013) भी इसी सोच की निरंतरता हैं। ये इकाइयां साबित करती हैं कि जब किसी क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियां और स्थानीय युवाओं का अनुभव एक-दूसरे के अनुकूल होते हैं, तब सेना ने नई संरचनाओं का गठन किया है।
बस्तर की मांग भी इसी परंपरा को और मजबूत करने वाली है। यहां के आदिवासी युवा दशकों से नक्सल विरोधी अभियानों में सुरक्षा बलों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे हैं। घने जंगल, कठिन पहाड़ियां और जटिल भूभाग में उनकी शारीरिक क्षमता, ट्रैकिंग कौशल और ऑपरेशनल अनुभव किसी किताब से नहीं आया है। बस्तर फाइटर्स और डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड जैसी इकाइयों में उन्होंने इसे प्रतिदिन साबित किया है। असम और नागा रेजिमेंट की तरह बस्तर रेजिमेंट भी क्षेत्र की विशिष्ट क्षमताओं को राष्ट्रीय सुरक्षा की ताकत में बदलने का अवसर दे सकती है।
भारतीय सेना की ताकत उसकी विविधता में निहित है। गोरखा की पहाड़ी वीरता, सिखों का अदम्य साहस, राजपूतों की परंपरा, असम की पूर्वोत्तर समझ, नागाओं की जनजातीय शक्ति और लद्दाख स्काउट्स की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में विशेषज्ञता, ये सभी भारतीय सेना की विशिष्ट पहचान हैं।
लेख
केवली कबीर जैन
पत्रकारिता छात्र, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय