इस देश के कुछ तथाकथित राजनीतिक विचारक अपने वक्तव्यों में कहते हैं कि गणराज्य संसद में नहीं, सड़कों पर बनते हैं। अगर वास्तव में गणराज्य सड़कों पर बनते, तो फिर संविधान सभा का गठन क्यों किया गया था? संविधान सभा ने 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिनों तक किस बात पर विमर्श किया? क्या वास्तव में गणराज्य सड़क से बना था?
हमारे संविधान की प्रस्तावना "हम, भारत के लोग" से शुरू होती है या "हम, सड़क पर एकत्रित लोग" से? अगर सड़क ही गणराज्य बनाती, तो देश में संसद, न्यायपालिका और संविधान की आवश्यकता क्यों है?
डॉ. अंबेडकर ने कहा था, "यदि हम अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों को छोड़ देंगे, तो इससे अराजकता फैलेगी। हमें अराजकता बढ़ाने वाले आंदोलनों का त्याग करना होगा।"
क्या डॉ. अंबेडकर के इस कथन का कोई महत्व नहीं रह गया है?
CJP और NEET प्रोटेस्ट आज सभी ओर चर्चा का विषय हैं। NEET पेपर लीक के विरोध में, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर CJP पिछले एक महीने से अधिक समय तक धरने पर बैठी थी। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने जिम्मेदारी लेते हुए अपना त्यागपत्र भी दे दिया।
15 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक अनावश्यक याचिका को खारिज करते समय मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने न्यायपालिका का समय नष्ट करने वाले और व्यवस्था के विरुद्ध बार-बार निरर्थक याचिकाएँ दायर करने वाले वकीलों पर टिप्पणी करते हुए ऐसे गैर-जिम्मेदार तत्वों को "कॉकरोच" और "पैरासाइट (परजीवी)" कहा।
इस टिप्पणी के तुरंत बाद, अमेरिका के बोस्टन में रहने वाले अभिजीत दीपक नामक एक व्यक्ति ने 16 मई 2026 को वहीं से ट्विटर पर "कॉकरोच जनता पार्टी" नाम से एक व्यंग्यात्मक अकाउंट बनाया और इसे "आलसियों और बेरोजगारों की आवाज़" घोषित कर दिया। अर्थात, गैर-जिम्मेदार तत्वों के विरुद्ध की गई टिप्पणी के आधे हिस्से को प्रसारित कर इसे बेरोजगारों का अपमान बताया गया और इस आधार पर एक विशेष वातावरण निर्मित करने का प्रयास आरंभ किया गया।
महज पाँच दिनों के भीतर इंस्टाग्राम पर संदेहास्पद रूप से इसके 5 मिलियन फॉलोअर्स हो गए। इसके बाद, 20 जुलाई 2026 को संसद के मानसून सत्र से पहले आयोजित CJP के "चलो संसद" मार्च ने दिल्ली को एक हिंसक युद्ध-क्षेत्र में तब्दील कर दिया।
क्या यह विरोध प्रदर्शन वास्तव में NEET पेपर लीक के विरोध में किया गया था? वास्तव में इसका मुख्य एजेंडा सिस्टम के विरुद्ध लोगों में रोष उत्पन्न करना था।
अगर वास्तव में यह विरोध प्रदर्शन पेपर लीक के लिए किया गया होता, तो केवल धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ही नहीं, बल्कि पंजाब के शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैस और कर्नाटक के शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा का इस्तीफा भी माँगा जाता, क्योंकि उनके नाम भी कथित रूप से पेपर लीक से जुड़े हुए हैं।
शायद जंतर-मंतर पर एकत्रित युवाओं को उनके बारे में जानकारी नहीं होगी, क्योंकि यह मुद्दा केवल पेपर लीक का था ही नहीं। यह मुद्दा युवाओं की आड़ में राजनीतिक रोटियाँ सेंकने का था, जिसे देश-विरोधी ताकतों ने भी हवा दी।
अगर वास्तव में इन युवाओं को युवाओं के भविष्य की चिंता होती, तो छत्तीसगढ़ PSC घोटाले का ज़िक्र क्यों नहीं किया गया, जिसमें युवाओं के साथ खुले तौर पर खिलवाड़ किया गया और किसी ने कोई जिम्मेदारी नहीं ली?
वास्तव में, सारा विरोध नेपाल और बांग्लादेश की तरह सड़क-आधारित सत्ता परिवर्तन के उद्देश्य से किया गया था।
क्या ये युवा वास्तव में केवल NEET पेपर लीक का ही विरोध कर रहे थे? यदि हाँ, तो फिर सरकारी संपत्ति को नष्ट क्यों किया गया? पुलिस अधिकारियों पर पथराव क्यों किया गया? राष्ट्रीय सुरक्षा बलों पर सरेआम हिंसक हमले क्यों किए गए? भारतीय सेना को गालियाँ क्यों दी गईं और हिंदू देवी-देवताओं का घोर अपमान क्यों किया गया? यहाँ तक कि प्रधानमंत्री की हत्या तक की बातें क्यों की गईं?
कई तथाकथित विचारक यह मानते हैं कि सरकार को युवाओं से बात करनी चाहिए थी। तो क्या जंतर-मंतर पर एकत्रित हुए युवा वास्तव में इस देश के भविष्य के बारे में सोचते हैं? वे युवा, जिन्होंने जंतर-मंतर पर फूहड़ता की सारी हदें पार कर दीं और जिनमें से कई, कथित रूप से, केवल अय्याशी के उद्देश्य से वहाँ एकत्रित हुए थे, क्या वे वास्तव में इस देश के हित और इसके भविष्य को समझते हैं?
क्या वास्तव में इस भीड़तंत्र को युवाओं के हितों का ख्याल था? क्या यह वही जेन-ज़ी (Gen Z) है, जिस पर इस देश का भविष्य टिका है? क्या विरोध का वह तरीका उचित था, जिसमें देश की संस्कृति का खुलेआम अपमान किया जा रहा था?
अधिकार और कर्तव्य सदैव एक-दूसरे के पूरक होते हैं। जितने पुरज़ोर तरीके से अधिकारों की मांग की जा रही थी, क्या उन युवाओं को राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध था?
आज वर्तमान में देश का युवा अपने कर्तव्यों से विचलित हो चुका है। वह केवल अधिकारों की, वह भी अनैतिक तरीकों से, मांग करना जानता है, परंतु राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को भूल चुका है।
हम केवल भारतीय संविधान में दिए गए मूल अधिकारों की मांग करना तो भली-भांति जानते हैं, परंतु उसी संविधान में उल्लिखित मूल कर्तव्यों का बोध होना भी हमारे लिए उतना ही आवश्यक है।
यह तो स्पष्ट है कि जिसका दायित्व है, उसे कठघरे में खड़ा तो होना ही होगा। परंतु इसे केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। निश्चित रूप से युवाओं पर लाठी चलाना कुछ हद तक अनुचित था।
शांतिपूर्ण एवं निःशस्त्र होकर विरोध प्रदर्शन करना देश के संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों में समाहित है। परंतु इस बात का ध्यान रखना भी नितांत आवश्यक है कि ऐसे प्रदर्शन से देश-विरोधी ताकतों को हवा न मिले।
हमें यह बोध होना आवश्यक है कि हमारे लिए राष्ट्र सर्वोपरि है।
लेख
डॉ. भूपेंद्र करवन्दे
सहायक प्राध्यापक विधि
शा. जे. योगानंदम छत्तीसगढ़ महाविद्यालय रायपुर