हाल ही में अमेरिकी लेखिका एवं टिप्पणीकार रेनी लिन (Renee Lynn) का एक बयान भी चर्चा में रहा। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि भारत की इतिहास पुस्तकों में लंबे समय तक मुगल शासकों का महिमामंडन किया गया, जबकि अनेक भारतीय राजवंशों और सभ्यतागत उपलब्धियों को पर्याप्त स्थान नहीं मिला। उनके अनुसार, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारतीय ज्ञान परंपरा को जोड़ने और NCERT में किए गए परिवर्तनों के माध्यम से इस असंतुलन को सुधारने का प्रयास किया गया। रेनी लिन ने यह भी दावा किया कि इन परिवर्तनों के बाद विदेशों में स्थित कुछ प्रभावशाली वैचारिक वामपंथी लॉबी भारतीय शिक्षा सुधारों का विरोध कर रही हैं और शिक्षा मंत्रालय की नीतियों को लगातार निशाना बना रही हैं।
भारत में इतिहास-शिक्षा और धार्मिक आस्था लंबे समय से केवल एक अकादमिक विषय नहीं रहे हैं, बल्कि वैचारिक संघर्ष का भी केंद्र रहे हैं। वर्षों से यह आरोप लगाया जाता रहा है कि NCERT की पुरानी इतिहास पुस्तकों में मुगल काल को अपेक्षाकृत अधिक महत्व दिया गया, जबकि मौर्य, गुप्त, चोल, पल्लव, राष्ट्रकूट, प्रतिहार, अहोम, विजयनगर, मराठा तथा अनेक अन्य भारतीय राजवंशों और उनकी सभ्यतागत उपलब्धियों को अपेक्षित स्थान नहीं मिला। इस विषय पर इतिहासकारों, शिक्षाविदों और विभिन्न वैचारिक समूहों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF 2023) के बाद NCERT ने इतिहास के पाठ्यक्रम में व्यापक परिवर्तन किए। सरकार और NCERT के अनुसार, इन परिवर्तनों का उद्देश्य इतिहास को अधिक संतुलित, स्रोत-आधारित और भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करना है।
इन बदलावों के बाद देश और विदेश के वामपंथी विचारकों से जुड़े समूहों ने इन परिवर्तनों का विरोध करते हुए कहा कि इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण कालखंडों का दायरा सीमित किया गया है। वहीं राष्ट्रवादी विचारकों ने इन सकारात्मक परिवर्तनों को वास्तविकता का दर्पण बताया।
हाल ही में काकरोच जनता पार्टी (CJP) और विभिन्न सांस्कृतिक वामपंथी दलों द्वारा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लेकर दिल्ली तथा विपक्ष शासित राज्यों में हिंसक विरोध-प्रदर्शन भी हुए। यह विरोध-प्रदर्शन असफल रहे, किंतु नेपाल, बांग्लादेश और जेन ज़ी हिंसा की घटनाओं से अलग प्रतीत नहीं होते। इन प्रदर्शनों में विदेशी हैंडलरों द्वारा नियंत्रित सोशल मीडिया का प्रभाव अधिक दिखाई दिया।
भारत में हिंसा का बाहरी कारण भले ही पेपर लीक का मामला रहा हो, लेकिन आंदोलन की झलक में देशविरोधी गतिविधियों एवं हस्तक्षेप से यह स्पष्ट होता है कि इसका मूल आधार कहीं न कहीं पाठ्यक्रम परिवर्तन, इतिहास की प्रस्तुति और शिक्षा नीति जैसे मुद्दे रहे, जो बाहरी शक्तियों के प्रभाव में अदृश्य रूप से मौजूद थे। विरोध करने वालों का मत है कि यह आंदोलन मुख्यतः शिक्षा सुधारों के विरोध को लेकर हुआ। वहीं दूसरा समूह इस आंदोलन को भारतीय संस्कृति, धर्म, अखंडता और संप्रभुता में हस्तक्षेप के रूप में देखता है।
पश्चिमी डीप स्टेट के निशाने पर भारत की दो प्रमुख संस्थाएँ हैं, जिन पर भारत की मजबूत आधारशिला टिकी है।
पहला, भारत की स्वतंत्र राजनीतिक एवं न्यायिक संस्थाएँ।
हाल के वर्षों में भारत की स्वतंत्र विदेश नीति अमेरिका समर्थित पश्चिमी देशों के सामने, क्षेत्रीय देशों में अस्थिरता के बावजूद, एक मजबूत दीवार की तरह खड़ी रही है। अमेरिका हमेशा वामपंथ समर्थित सरकारों को बढ़ावा देने का प्रयास करता रहा है। डीप स्टेट के कुत्सित प्रभाव ने न्यायपालिका, मीडिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा कर भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करने का भरपूर प्रयास किया, ताकि नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार की तरह भारत की राजनीति को भी प्रभावित किया जा सके। किंतु वे इस उद्देश्य में सफल नहीं हुए।
दूसरा, भारत का सनातन धर्म एवं संस्कृति।
भारत के उत्कर्ष का मूल आधार सदैव धर्म और संस्कृति रहे हैं, चाहे वह धर्म की वैज्ञानिकता हो या आधुनिक प्रासंगिकता के साथ उसका समन्वय, जो अन्य पाश्चात्य धर्मों में नगण्य है। यही तथ्य सदैव विदेशियों को खटकता रहा है, जिसका विकल्प उन्होंने भारत के धर्म एवं दर्शन को कमजोर करने के रूप में खोजा। युवाओं के स्वरूप को धार्मिक से अधार्मिक, चेतन से अचेतन और सांस्कृतिक से विस्मृत बनाने का भरपूर प्रयास किया। CJP आंदोलन में भगवान राम और देवी सीता के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग तथा धर्म से अलगाव वामपंथियों की मंशा को स्पष्ट करता है।
अब प्रश्न उठता है कि वामपंथी षड्यंत्रकारियों ने अपने निशाने पर शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण आधारभूत स्तंभ को ही क्यों चुना? उत्तर सीधा और स्पष्ट है। किसी भी देश के वर्तमान और भविष्य का निर्धारण उसकी शिक्षा से होता है। यदि किसी देश की शिक्षा को प्रभावित कर दिया जाए, तो उसके वर्तमान और भविष्य को भी प्रभावित किया जा सकता है।
इसका उदाहरण मैकाले की शिक्षा पद्धति से समझा जा सकता है, जिसने शिक्षित गुलाम तैयार करने के उद्देश्य से भारत में पश्चिमी पाठ्यक्रम लागू किया और भारत को 200 वर्षों तक गुलाम बनाए रखने में भूमिका निभाई। वहीं स्वतंत्रता के बाद तुष्टिकरण की नीति के कारण आक्रांताओं का महिमामंडन बढ़ा-चढ़ाकर किया गया और भारतीयों के मन में इतिहास की वास्तविक झलक से पर्दा डाले रखा गया। अकबर को हजारों हिंदुओं की हत्या के बावजूद महान बताया गया, जबकि वीर मराठा, राजपूत, होलकर, पांड्य, काकतीय आदि भारतीय शासकों ने भारत के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद अपेक्षित स्थान नहीं पाया।
इतिहास किसी राष्ट्र की सामूहिक स्मृति होता है। यदि किसी कालखंड या राजवंश को पहले अपेक्षाकृत अधिक महत्व मिला था, तो समाधान किसी अन्य कालखंड की उपेक्षा नहीं, बल्कि सभी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परंपराओं, उपलब्धियों और संघर्षों का संतुलित एवं प्रमाण-आधारित अध्ययन तथा सांस्कृतिक पुनर्जागरण है। लोकतांत्रिक समाज में पाठ्यक्रम पर मतभेद स्वाभाविक हैं, किंतु इतिहास का अंतिम आधार साक्ष्य, शोध और अकादमिक विमर्श होना चाहिए।
भारत के लिए यह अवसर है कि वह अपने इतिहास को न तो किसी वैचारिक पूर्वाग्रह से देखे और न ही किसी राजनीतिक आग्रह से, बल्कि अपनी संपूर्ण सभ्यतागत यात्रा एवं अतीत के सांस्कृतिक गौरव को स्वाभिमान के साथ आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाए। वर्तमान समय की मांग यही प्रतीत होती है कि भारत के युवा पाश्चात्य बेड़ियों से मुक्त होकर सांस्कृतिक पुनर्जागरण की ओर लौटें।
लेख
प्रद्युम्न
इतिहासकार एवं सिविल सेवा विशेषज्ञ