
वामपंथी रंगकर्मी सफ़दर हाशमी की हत्या नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ का मंचन करने के दौरान कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा की गई थी। सफ़दर हाशमी की हत्या तत्कालीन कांग्रेस की राजनीति, राजनीतिक हिंसा और कलाकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई। उन दिनों मुझ पर भी लाल रंग का नशा था। इप्टा के बैनर तले ‘हल्ला बोल’ नाटक हमने बस्तर संभाग में अनेक नुक्कड़ों पर किया था और मैं उसमें सूत्रधार की भूमिका निभाया करता था।
दंतेवाड़ा में बस स्टैंड के पास इस नाटक के मंचन के दौरान हमें प्रशासन के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। पुलिस ने नाटक के कलाकारों और वहाँ एकत्र भीड़ को तितर-बितर करने के लिए हल्का बल प्रयोग भी किया। उन दिनों आंदोलन और प्रतिरोध करने वालों को अपनी क्रिया की प्रतिक्रिया का पूरा अंदाज़ा हुआ करता था। प्रतिरोध पत्थरों से नहीं, अभिव्यक्ति और उसकी रचनात्मकता से होता है।

दमन से घोंट दी गई आवाज़ की अनुगूँज और अधिक बढ़ती है। अखबारों ने घटना के समाचार प्रकाशित किए और जो बात एक नुक्कड़ तक सिमट जानी थी, वह दूर तक और देर तक फैल गई। इस घटना का उल्लेख मैं दो कारणों से कर रहा हूँ। पहला, यह बताने के लिए कि वामपंथ और उसके विभिन्न हथकंडों को मैंने बहुत निकट से देखा और समझा है; यही अनुभव आगे चलकर इस विचारधारा से मेरे मोहभंग का एक बड़ा कारण भी बना।
इसी प्रसंग को जोड़ते हुए अब विषय पर आते हैं। आंदोलन विचारों को उछालने के लिए होते हैं, पत्थर नहीं। इस संदर्भ में शहीद भगत सिंह को भी अक्सर गलत रूप में उद्धृत किया जाता है। उन्होंने केंद्रीय असेंबली में बम अवश्य फेंके थे, लेकिन उसे ऐसी जगह फेंका गया था जहाँ किसी के घायल होने तक की संभावना न्यूनतम रहे। उनका उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं, अपनी आवाज़ को सत्ता के बहरे कानों तक पहुँचाना था।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो हुआ, वह न तो आंदोलन था और न ही किसी भी तरह के छात्र-सरोकारों से दिपके गैंग का कोई वास्तविक संबंध दिखाई देता है। जंतर-मंतर से अनियंत्रित हुई भीड़ यदि संसद तक पहुँच जाती, तो ऐसा वीभत्स दृश्य उत्पन्न हो सकता था जो देश-दुनिया में भारत की छवि को मटियामेट कर देता। इस स्थिति को पैदा करने में इन ‘तिलचट्टों’ ने भी कोई कोर-कसर उठा नहीं रखी थी।

इसके उलट, मैं झारखंड में चल रहे छात्र आंदोलन में दिखाई दे रहे अनुशासन का प्रशंसक हूँ। आखिर छात्रों के मंच पर राजनीतिक नारों की उपादेयता ही क्या है? जंतर-मंतर पर नाचते-गरियाते, रील बनाते हुजूम के पास अपनी माँगों की स्पष्ट फेहरिस्त तक नहीं थी; जबकि झारखंड में आंदोलनरत छात्रों को साफ-साफ पता है कि वे क्या चाहते हैं, क्यों चाहते हैं और उनकी माँगों के क्या परिणाम होंगे।
यहाँ मीडिया और सोशल मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए कोई किसी राजनेता या अधिकारी को अभद्र गालियाँ नहीं दे रहा, न अशोभनीय कार्टून बनाकर चर्चा बटोरने की कोशिश कर रहा है।

ऐसा भी नहीं है कि झारखंड के छात्र आंदोलन को वैचारिक रूप से ‘लाल’ करने की कोशिश नहीं हुई। आंदोलनकारी छात्रों ने डफली लेकर पहुँची नेहा बोरा को अपना मंच नहीं दिया। इसी दौरान उन पर स्याही फेंके जाने की घटना भी हुई।
यहाँ एक बात याद दिलाना आवश्यक है कि स्याही अभिजीत दिपके पर भी जंतर-मंतर पर फेंकी गई थी। मीडिया ने उस घटना को उतना बड़ा मुद्दा नहीं बनाया, जितना नेहा बोरा वाले प्रसंग को बना दिया क्यों? किसलिए तीन-चार दिनों तक छात्रों, उनकी माँगों और उनके मूल प्रश्नों के बजाय बहस का केंद्र स्याही बन गई? मानो आंदोलन के असली सवालों पर बात करने के बजाय पूरी कवरेज को उसी स्याही में डुबो देना अधिक सुविधाजनक हो? मीडिया कई बार अपना लाल रंग ऐसी ही कालिमाओं के पीछे छिपा लेता है।

झारखण्ड के छात्र विधानसभा का घेराव करने निकले थे। उन्हें पता था कि प्रशासन रोकेगा, बल प्रयोग की आशंका भी रहेगी। लेकिन गौर कीजिए कि एक भी छात्र हाथ में पत्थर उठाए क्यों नहीं दिखाई देता? बल प्रयोग हुआ, छात्र मार भी खाते रहे, लेकिन भीड़ उद्दंड नहीं हुई; दिल्ली वाले प्रदर्शनकारियों की तरह किसी पुलिसकर्मी पर टूट क्यों नहीं पड़ी? क्योंकि शायद वे जानते थे कि वे पत्थर उठाने नहीं, पत्थर को पिघलाने के लिए स्वयं को तपाने निकले हैं।
यही किसी आंदोलन की वास्तविक शक्ति होती है। उसका अनुशासन ही उसकी नैतिक ताकत बनता है। यही कारण है कि झारखंड से उठी यह आवाज़ धीरे-धीरे बड़ी होती जा रही है। जिसे राष्ट्रीय विमर्श ने लगभग उपेक्षित कर दिया था, उसी आंदोलन ने अपनी खामोशी, संयम और स्पष्टता से भीतर ही भीतर एक तूफान खड़ा कर दिया है। जय जोहार।
लेख
राजीव रंजन प्रसाद
लेखक, साहित्यकार