जनगणना 2027 पूर्वोत्तर भारत के लिए केवल जनसंख्या गणना नहीं, बल्कि पहचान, प्रतिनिधित्व, संसाधन-वितरण और विकास की प्राथमिकताओं को नए सिरे से समझने का अवसर है। हालांकि इसके साथ प्रवासन, NRC और परिसीमन को लेकर आशंकाएं भी उभर रही हैं।
दरअसल, लंबे समय के बाद जनगणना की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी है। कोविड-19 महामारी के कारण 2021 में टली यह प्रक्रिया अब 2026-27 में दो चरणों में पूरी की जा रही है। पहला चरण, यानी मकान सूचीकरण और आवास गणना (हाउसलिस्टिंग एंड हाउसिंग सेंसस) – 1 अप्रैल से 30 सितंबर 2026 के बीच देशभर में आयोजित हो रहा है, जबकि जनसंख्या से जुड़े विस्तृत सामाजिक-आर्थिक आंकड़े दूसरे चरण में 2027 में एकत्र किए जाएंगे।
यह जनगणना कई मायनों में ऐतिहासिक है, यह आजादी के बाद की आठवीं और भारत की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना है, जिसमें मोबाइल ऐप और सेल्फ-एनुमरेशन जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसके साथ ही लगभग नौ दशकों बाद इसमें जातिगत गणना को भी जोड़ने का फैसला लिया गया है।
देश के बाकी हिस्सों के लिए यह एक प्रशासनिक और सांख्यिकीय प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन पूर्वोत्तर भारत असम, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड, मिज़ोरम, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश के लिए जनगणना का मतलब कहीं ज्यादा गहरा है। यहां जनगणना सिर्फ आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि पहचान, भूमि अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अस्तित्व से जुड़ा सवाल बन जाती है।
इन क्षेत्रों की जनसांख्यिकीय बुनावट इतनी नाजुक और बहुस्तरीय है कि हर जनगणना अपने साथ पुरानी आशंकाओं को फिर से जगा देती है, घुसपैठ का डर, स्वदेशी समुदायों के अल्पसंख्यक बन जाने की चिंता, और परिसीमन जैसी प्रक्रियाओं के जरिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व खो देने का खतरा। यही वजह है कि जनगणना 2027 की शुरुआत के साथ ही पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्यों से मांगों, आशंकाओं और विरोध प्रदर्शनों की झड़ी लग गई है।
सामाजिक संदर्भ व चर्चा मुख्य स्तम्भ :
भारतवर्ष विभिन्नताओं के राष्ट्र के रूप में जाना जाता है, भारत के पूर्वोत्तर समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि यहा विभिन्न समुदाय है। बांग्लादेश, म्यांमार, भूटान और चीन जैसे देशों से सीमा-रेखा साझा करने वाला यह क्षेत्र दशकों से सीमा-पार प्रवासन, अवैध घुसपैठ और सामुदायिक संघर्षों का साक्षी रहा है।
इसी पृष्ठभूमि में स्थानीय समुदायों में यह गहरी आशंका है कि अनियंत्रित अवैध प्रवासन उनकी जनसंख्या को असंतुलित कर सकता है, जिससे वे अपनी ही भूमि में रहते हुए अल्पसंख्यक बनने की स्तिथि में आ जाते हैं।
इसी आशंका ने पूर्वोत्तर में तीन बड़ी मांगों को जन्म दिया है, जो जनगणना व अन्य विषयों के दौरों में उभरकर सामने प्रतीत होती हैं -
1. इनर लाइन परमिट (ILP) व्यवस्था का विस्तार
2. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का क्रियान्वयन या अद्यतन
3. स्वदेशी समुदायों के लिए विशेष संवैधानिक सुरक्षा के उपाय
जनगणना 2027 के साथ ये तीनों मांगें एक बार फिर सतह पर आ गई हैं, क्योंकि जनगणना के आंकड़े ही भविष्य में परिसीमन (डिलिमिटेशन), आरक्षण और संसाधनों के उपयोग का आधार बनते हुए नज़र आ रहे हैं।
असम में लोकपियल (जनगणना) – मुस्लिम समाज में भाषा के दो पहलू :
अब्दुल हमीद (अध्यक्ष, असम गौरिया परिषद) -
असम के मूलनिवासी मुसलमानों से अपील की है कि वे आने वाली लोकपियल में असमिया को अपनी मातृभाषा बताएं। अपने बयान में उन्होंने कहा कि असमिया भाषा असम की एकता, संस्कृति और विरासत की नींव है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि राज्य की भाषाई पहचान, सामाजिक सद्भाव और सामूहिक हितों को बनाए रखने के लिए भाषा के बारे में सही जानकारी देना ज़रूरी है। उन्होंने मुस्लिम समुदाय के लोगों से जनगणना की प्रक्रिया के दौरान सही जानकारी देने और ज़िम्मेदारी से काम करने की अपील की।
आशक अली दीवान (प्रगज्योतिषपुरिया द्रविड़ियन परिषद के अध्यक्ष और लेखक) -
"असमिया नाम की कोई भाषा नहीं है और "असमिया नाम की कोई नस्ल नहीं है।" उन्होंने आगे कहा कि बंगाली बोलने वाले लोगों को खुद को बंगाली बताना चाहिए और लोकपियल प्रक्रिया में अपनी मातृभाषा बंगाली दर्ज करानी चाहिए।
असम भूमिपुत्र गण मंच –
मुस्लिम संगठन ने मुसलमानों से अपील कर रहा है कि वे 'लोकपियल' में अपनी मातृभाषा के तौर पर असमिया के बजाय बंगाली दर्ज कराएं।
मणिपुर: 'पहले NRC, फिर जनगणना' की मांग
मणिपुर में जनगणना को लेकर सबसे तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। जून 2026 में इंफाल में हजारों की संख्या में लोग, छात्र, युवा संगठन, आंतरिक रूप से विस्थापित लोग (IDPs), कलाकार और स्वदेशी समुदायों के सदस्य, सड़कों पर उतरे और जनगणना से पहले 1951 के आधार पर NRC को अद्यतन करने की मांग रखते है।
प्रदर्शनकारियों के हाथों में 'नो NRC, नो सेंसस', 'ओनली अपडेशन ऑफ एनआरसी (NRC) कैन सेव मणिपुर' और 'मणिपुर राज्य की उपेक्षा न करें' जैसे नारे लिखी तख्तियां थीं।
14 सिविल सोसाइटी संगठनों (CSOs) कांगलीपाक की अगुवाई में हुई इस रैली के संयोजक शांता नाहाकपम ने तर्क दिया कि NRC अद्यतन करने की मांग अब केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह स्वदेशी पहचान, भूमि अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सुरक्षा से सीधे जुड़ गई है।
जातिगत जनगणना
जातिगत गणना को इस बार की जनगणना में शामिल करने के फैसले ने देशभर में राजनीतिक हलचल मचाई है, लेकिन पूर्वोत्तर के संदर्भ में यह बहस अलग रंग लेती है।
पूर्वोत्तर के अधिकांश राज्य, खासकर वे जो संविधान की छठी अनुसूची के तहत आते हैं जैसे मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा और असम के कुछ स्वायत्त परिषद क्षेत्र, वहां आबादी का बड़ा हिस्सा पहले से ही अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणी में आता है।
ऐसे में जातिगत गणना का व्यावहारिक असर बाकी भारत की तुलना में यहां भिन्न होगा, क्योंकि यहा जाति-आधारित सामाजिक स्तरीकरण की बजाय जनजाति-आधारित पहचान प्रमुख है। इसके बावजूद, जनजातीय सूचियों में शामिल न किए गए समुदायों और उप-जनजातियों के वर्गीकरण को लेकर मेघालय जैसे राज्यों में असंतोष लगातार बना हुआ है, क्योंकि सही वर्गीकरण न होने पर आरक्षण और विकास योजनाओं का लाभ इन समुदायों तक नहीं पहुंच पाता।
जनगणना आंकड़ों से आगे का विषय एवं विचार
पूर्वोत्तर में जनगणना को लेकर आशंका का एक बड़ा स्रोत यह है कि जनगणना के आंकड़े ही भविष्य में परिसीमन का आधार बनते हैं। असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और नागालैंड में सुरक्षा कारणों से 2002-08 के राष्ट्रव्यापी परिसीमन अभ्यास को टाल दिया गया था। बाद में असम में मार्च 2023 में परिसीमन हुआ, जो 1976 के बाद असम में पहला परिसीमन था।
इस अनुभव ने पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में यह विषय उत्तेजित हुआ है कि जनगणना 2027 के बाद होने वाला राष्ट्रव्यापी परिसीमन के बिंदु क्या आधार तय करेंगे।
जनगणना 2027 की शुरुआत के साथ पूर्वोत्तर भारत में जो मांगें और प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि इस क्षेत्र के लिए जनगणना कभी भी केवल एक सांख्यिकीय विषय नहीं रहा बल्की इसके साथ ही साथ यह पहचान, भूमि, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक अस्तित्व की उस गहरी चिंता का हिस्सा है, जो पूर्वोत्तर के समुदाय के जीवन का आधार हैं या सामाजिक विषय की नीव।
लेख -
हेमेन्द्र शर्मा
शोध कार्य व सामाजिक समसामयिक विश्लेषक
उत्तर-पूर्व अध्ययन केंद्र, नई दिल्ली