चिदंबरम और दिमागी नक्सल...क्या सच में?

“दिमागी नक्सल” शब्द पर पी. चिदंबरम की प्रतिक्रिया ने एक पुरानी बहस को फिर सामने ला दिया है। गृह मंत्री रहते हुए वे स्वयं माओवादी संगठनों, फ्रंट संगठनों, नागरिक समाज और शहरी क्षेत्रों में सक्रिय समर्थक नेटवर्क की चर्चा कर चुके थे। ऐसे में उनके वर्तमान बयान और पुराने सरकारी रुख के बीच का विरोधाभास क्या बताता है?

The Narrative World    22-Aug-2026   
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दिमागी नक्सलशब्द चर्चा में है। वामपंथ के लिए यह शब्द ऐसा है जैसे किसी ने तीखी मिर्च खा ली है और आसपास पानी भी नहीं। ऐसा नहीं कि यह शब्द, संदर्भ अथवा तत्व नया है। वैचारिक आतंकवाद, बौद्धिक आतंकवाद, शहरी नक्सल, अर्बन नक्सल जैसे अनेक शब्द पहले से चलन में हैं और दिमागी नक्सल अपने निहितार्थ में इनका ही पर्यायवाची है।


कॉंग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लाल किले की प्राचीर से दिए गए भाषण में कहे गएदिमागी नक्सलशब्द पर प्रतिक्रिया देते हुए अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर लिखा—“I am proud to be a dimagi naxal!” अर्थात - “मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है।इस उद्घोषणा के बाद मुझे यह स्पष्टता होने लगी है कि उनके देश के गृह मंत्री के रूप में सम्पन्न कार्यकाल में माओवाद को समाप्त करने में सफलता क्यों नहीं मिल सकी थी?


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कुछ बातें याद दिलाना चाहता हूँ; पहला यह कि जून 2009 में पी. चिदंबरम के कार्यकाल के दौरान ही केंद्र सरकार ने 'कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी)' को गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत एक आतंकवादी संगठन के रूप में प्रतिबंधित कर दिया था।


महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिसूचना केवल हथियारबंद CPI (Maoist) तक सीमित नहीं थी; आधिकारिक दस्तावेज में दर्ज शब्द थे - “CPI (Maoist), all its formations and front organisations”


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यह रोकथाम इसलिए क्योंकि सरकार नक्सल फंडिंग को, प्रचार सामग्री को और विस्तार को रोकना चाहती थी। मुख्य रूप से माओवादियों के अर्बन नेटवर्क पर या दिमागी नक्सलियों पर चोट करना ही मंसूबा रहा होगा।


इसी बात की स्पष्टता के लिए इंडियन एक्सप्रेस की 19 फरवरी 2010 की खबर महत्व की है, जब महिला पत्रकारों से बातचीत में तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम ने कहा था कि नक्सलियों को कुछ NGOs और सिविल सोसाइटी सेइंटेलेक्चुअल और मटेरियल सपोर्टमिल रहा है। इसी प्रेस वार्ता में उन्होंने यह भी कहा किमाओवादी अपनी प्रभाव-परिधि बढ़ाने के लिए नागरिक समाज के समर्थन, मीडिया और कानूनी प्रक्रियाओं का उपयोग करते हैं यह क्या है? क्या यहदिमागी नक्सलपर निशाना नहीं है?



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एक संदर्भ है पत्र सूचना कार्यालय, भारत सरकार, मुख्यमंत्रियों का आंतरिक सुरक्षा सम्मेलन, 16 अप्रैल 2012 का; इस सम्मेलन में तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा था किमाओवादी मुखौटा संगठन खड़े करने और नागरिक समाज के समूहों का समर्थन प्राप्त करने में सफल रहे हैं उनका सबसे महत्वपूर्ण कथन था - “कई शहरी क्षेत्र माओवादी समर्थक गतिविधियों के नए केंद्र बनकर उभरे हैं।


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देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरा बताने वाले प्रधानमंत्री के दौर के गृहमंत्री यदि स्वयं कोदिमागी नक्सलकहते हैं तो क्या माना जाए? क्या यही वह कारण तो नहीं कि देश से नक्सलवाद का उन्मूलन करने में दशकों का समय लग गया? पूर्ववर्ती असफलताओं को वर्तमान सफलताओं की कसौटी पर तो कसना ही होगा; इसलिएदिमागी नक्सलशब्द का चर्चा में बने रहना आवश्यक और सार्थक है।


लेख


राजीव रंजन प्रसाद

लेखक, साहित्यकार