यही वह दौर था जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अफ़ज़ल गुरु की फाँसी और भारत की क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े विषय पर विवाद खड़ा हुआ था। उसी वर्ष जुलाई में हिज़्बुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद ख़ालिद की सोशल मीडिया पोस्ट ने उसकी सच्चाई सबके सामने ला दी थी।
आज जब उमर ख़ालिद जैसे अलगाववादी एवं आतंकी समर्थक तत्व को “इतिहासकार”, “छात्र कार्यकर्ता” या “राजनीतिक बंदी” जैसे शब्दों के साथ प्रस्तुत किया जाता है, तब यह प्रश्न उठता है कि क्या उसकी राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों को देश भूल जाए?
कहानी की शुरुआत 2016 से
फरवरी 2016 में जेएनयू परिसर में इस्लामिक आतंकी अफ़ज़ल गुरु और मकबूल भट्ट के समर्थन में कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसके आयोजन में उमर ख़ालिद की भूमिका थी। इसी दौरान जेएनयू में "भारत तेरे टुकड़े होंगे…इंशाल्लाह इंशाल्लाह" जैसे नारे लगे। बाद में इसी मामले में ख़ालिद पर राजद्रोह सहित कई आरोप लगाए गए।
इस्लामिक आतंकी बुरहान वानी का समर्थन
8 जुलाई 2016 को सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में इस्लामिक जिहादी बुरहान वानी मारा गया। वह इस्लामिक आतंकी संगठन हिज़्बुल मुजाहिदीन का कमांडर था। बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर घाटी में व्यापक अशांति फैली।
इसी दौरान उमर ख़ालिद की एक फेसबुक पोस्ट सामने आई। ख़ालिद ने बुरहान वानी की प्रशंसा की थी और पोस्ट में Che Guevara के हवाले से बंदूक और संघर्ष को जारी रखने वाली पंक्ति इस्तेमाल की थी।
ख़ालिद ने लिखा था कि “मुझे इसकी परवाह नहीं कि मैं गिर जाऊँ, अगर कोई दूसरा मेरी बंदूक उठा ले और चलाता रहे। ये चे ग्वेरा के शब्द थे, लेकिन ये बुरहान वानी के भी हो सकते थे। बुरहान मौत से नहीं डरता था। वो गुलामी और अधीनता में जीने से डरता था। वो इससे नफरत करता था। वो एक आजाद इंसान की तरह जीया और आजाद इंसान की तरह मरा।”
उसका अंत उसने इन शब्दों में किया, “गुलामी का अंत हो। इंडियन स्टेट (यानी एक देश के रूप में भारत), तुम ऐसे लोगों को कैसे हरा सकते हो, जिन्होंने अपने डर को ही हरा दिया है। रेस्ट इन पॉवर बुरहान!”
यह केवल किसी मारे गए व्यक्ति की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने का मामला नहीं था। उसी पोस्ट में बुरहान को ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया जो “subjugation” में जीवन से डरता था और “free man” की तरह जीया और मरा।
इस पर उमर को बहुत तीखा विरोध झेलना पड़ा था। उसने पोस्ट डिलीट कर दी, लेकिन एक दूसरी पोस्ट लिखी, तंज कसते हुए कि “वो भी अब दूसरों की तरह कायर बन जाएगा और बुरहान को आतंकवादी बताएगा।”
उमर की पोस्ट की ‘बुनाई’ को परखिए और इस पंक्ति को ऊपर फिर से पढ़िए - “अगर कोई दूसरा मेरी बंदूक उठा ले और चलाता रहे।” इसका मतलब बुरहान वानी का हथियार उठाना, हिजबुल मुजाहिदीन का कमांडर होना, 10 लाख का ईनामी आतंकी होना… उमर को नायकत्व लगता था।
जबकि बुरहान भारतीय सेना पर हमलों का आरोपी था। हिजबुल मुजाहिदीन, जिसका बुरहान एक कमांडर था, का मकसद कश्मीर को भारत से अलग कर पाकिस्तान में मिलाना है और जिसके लिए बुरहान कश्मीरी युवाओं को फेसबुक वगैरह से इन्फ्लुएंस कर अपने साथ मिला रहा था।
उमर ने सीधे भारत को एक राष्ट्र के रूप में संबोधित करते हुए लिखा था कि तुम ऐसे लोगों को कैसे हरा सकते हो, जिन्होंने अपने डर को ही हरा दिया। इसका भी अर्थ यही निकल रहा है कि वो कश्मीर के अलगाव में बंदूक उठाने वालों, सीमा पार से ट्रेनिंग लेकर भारत पर हमला करने वालों को आतंकी नहीं मानता था। “ऐसे लोगों” से उसका और क्या तात्पर्य रहा होगा?
यहीं से सबसे गंभीर प्रश्न पैदा होता है। यदि बुरहान वानी किसी सामान्य राजनीतिक संगठन का नेता होता, तो उसकी राजनीतिक प्रशंसा को अलग तरीके से देखा जा सकता था।
लेकिन वह हिज़्बुल मुजाहिदीन का आतंकी था। इसलिए किसी व्यक्ति द्वारा बुरहान वानी को क्रांतिकारी नायक की भाषा में प्रस्तुत करना स्वाभाविक रूप से यह सवाल पैदा करता है कि वह हिंसक कश्मीरी आतंकवाद को किस नजर से देखता था।