बस्तर : ईसाई कन्वर्ज़न के विरुद्ध जनजाति समाज में आक्रोश, कांकेर से सुकमा तक ग्रामसभाओं ने खोला मोर्चा

सुकमा के पोलमपल्ली से लेकर कांकेर तक ईसाई कन्वर्ज़न के विरुद्ध जनजातीय समाज का आक्रोश अब ग्रामसभाओं के फैसलों में दिखाई देने लगा है। पेसा और पांचवीं अनुसूची के अधिकारों का हवाला देते हुए गांव अपनी परंपरा और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए मुखर हो रहे हैं।

The Narrative World    25-Aug-2026   
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सुकमा के पोलमपल्ली में 22 अगस्त को हुई विशेष ग्रामसभा ने बस्तर में अवैध कन्वर्ज़न को लेकर चल रही लंबी चर्चा को एक बार फिर सामने ला दिया है। ग्रामसभा ने गांव की पारंपरिक व्यवस्था, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक सौहार्द का हवाला देते हुए एक सूचना एवं चेतावनी बोर्ड लगाने का फैसला किया है। बोर्ड में ग्रामसभा की पूर्व अनुमति के बिना धार्मिक सभाओं, प्रचार प्रसार और कन्वर्ज़न से संबंधित गतिविधियों पर रोक की बात कही गई है। पादरियों, ईसाई मिशनरी संस्थाओं और प्रचारकों के गांव में प्रवेश तथा घर घर प्रचार के लिए भी ग्रामसभा को पहले सूचना देने की बात लिखी गई है।


दरअसल सुकमा के पोलमपल्ली से निकला ग्रामसभा का यह निर्णय अब बस्तर के बदलते सामाजिक माहौल का बड़ा संकेत बन गई है। वास्तव में यह केवल एक गांव का फैसला नहीं है। यह उस आक्रोश का सार्वजनिक रूप है जो पिछले कुछ समय से बस्तर के अलग अलग जनजातीय क्षेत्रों में दिखाई दे रही है।


पिछले एक वर्ष में कांकेर, नारायणपुर और सुकमा के अलग अलग इलाकों से सामने आए मामलों को साथ रखकर देखें तो एक बड़ा प्रश्न उभरता है। जनजातीय बहुल गांवों में स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि बल, प्रलोभन, कपट या अन्य तरीकों से होने वाला अवैध कन्वर्ज़न केवल व्यक्ति की धार्मिक पहचान बदलने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे गांव की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, धार्मिक आस्थाओं, रूढ़ि परंपरा और आपसी संबंधों में तनाव पैदा होता है। यही कारण है कि बस्तर के गांवों में ग्रामसभा अब अपनी सांस्कृतिक सीमाओं और सामाजिक व्यवस्था को लेकर अधिक मुखर दिखाई दे रही है।


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असल में बीते वर्ष कांकेर में जो हुआ, उसने इस पूरे प्रश्न को राज्य और देश के सामने ला दिया। कांकेर जिले के कई गांवों में ग्रामसभाओं के माध्यम से ऐसे बोर्ड लगाए गए, जिनमें पादरियों और कन्वर्टेड ईसाइयों के प्रवेश को लेकर चेतावनी दी गई। इन बोर्डों में पांचवीं अनुसूची और पंचायत उपबंधों के विस्तार से संबंधित पेसा कानून का उल्लेख किया गया था।


ग्रामसभाओं का कहना था कि अनुसूचित क्षेत्रों में उनकी परंपरा, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक व्यवस्था की रक्षा कानूनी रूप से मान्य ग्रामसभा अधिकारों का हिस्सा है। इन बोर्डों के विरुद्ध मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहुंचा। यहां जनजातीय समाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात न्यायालय की उस टिप्पणी में थी, जिसमें जबरन कन्वर्ज़न, प्रलोभन या कपट के माध्यम से कन्वर्ज़न रोकने के उद्देश्य से लगाए गए ऐसे होर्डिंग को अपने आप में असंवैधानिक नहीं माना गया। न्यायालय ने इस विषय को केवल धार्मिक स्वतंत्रता के प्रश्न के रूप में नहीं देखा, बल्कि पेसा क्षेत्र में स्थानीय संस्कृति और ग्रामसभा की भूमिका को भी ध्यान में रखा।


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बिलासपुर उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध फरवरी 2026 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए चुनौती खारिज कर दी। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह माना था कि जबरन कन्वर्ज़न को रोकने के लिए लगाए गए सामान्य चेतावनी बोर्ड को केवल असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। न्यायालय ने इन्हें जनजातीय हितों और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए उठाए गए कदम के संदर्भ में देखा था।


हमें यह समझना होगा कि बस्तर के गांवों में कन्वर्ज़न को लेकर पैदा हुआ आक्रोश सामान्य घटना नहीं है। जनजातीय समाज के लिए यह संस्कृति का विषय है। बस्तर के जनजातीय समाज में धर्म, संस्कृति, ग्राम व्यवस्था, देवस्थल, उत्सव और सामाजिक अनुशासन अलग-अलग बंटे हुए विषय नहीं हैं। किसी परिवार की धार्मिक पहचान बदलने के बाद यदि वह पारंपरिक ग्राम अनुष्ठानों, देवी देवताओं, उत्सवों या संस्कारों से अलग होता है, तो उसका प्रभाव परिवार से आगे पूरे गांव के सामाजिक ताने-बाने पर पड़ता है।


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इसी वजह से जनजातीय समाज अब कन्वर्ज़न को केवल व्यक्तिगत आस्था परिवर्तन के रूप में देखने को तैयार नहीं है। गांवों में यह सवाल उठ रहा है कि यदि किसी व्यक्ति को इलाज, आर्थिक सहायता, शिक्षा, संकट में मदद या अन्य प्रकार के प्रलोभन के माध्यम से प्रभावित करके उसकी धार्मिक पहचान बदली जाती है, तो इसे केवल धार्मिक प्रचार कहकर छोड़ देना कितना उचित है?


बस्तर का जनजातीय समाज जिस मुद्दे को उठा रहा है, उसे महज धार्मिक विषय कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। यदि कन्वर्ज़न बल, प्रलोभन या कपट के माध्यम से होता है तो वह कानून का भी विषय है। और यदि किसी अनुसूचित क्षेत्र की ग्रामसभा यह कहती है कि उसके गांव में ऐसी गतिविधियां नहीं चलेंगी, तो उस मांग को पेसा और पांचवीं अनुसूची के संदर्भ में समझना होगा।


बस्तर में यह आक्रोश केवल कुछ स्थानों तक सीमित नहीं है। सुकमा का पोलमपल्ली इसका ताजा उदाहरण है। यहां ग्रामसभा ने सीधे तौर पर अपनी पारंपरिक पहचान को केंद्र में रखकर निर्णय लिया। स्थानीय ग्रामीणों ने ग्रामसभा के फैसले को गांव की शांति, सौहार्द, आपसी सम्मान और जनजातीय समाज की रूढ़ि परम्परा को बचाने की कोशिश बताया है।


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जनजातीय समाज की चिंता का सबसे संवेदनशील पक्ष मृत्यु संस्कारों से भी जुड़ा है। बस्तर में ऐसे विवाद सामने आए हैं जहां कन्वर्टेड ईसाई परिवारों के अंतिम संस्कार और शव दफनाने को लेकर गांवों में तनाव पैदा हुआ। यह विवाद केवल जमीन के छोटे से टुकड़े का विवाद नहीं है, क्योंकि जनजातीय समाज में मृत्यु संस्कार रीति-परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसी प्रकार पूजा, मड़ई, देवस्थल और पारंपरिक अनुष्ठानों को लेकर भी मतभेद पैदा होने की शिकायतें सामने आती रही हैं।


इसलिए जब जनजातीय ग्रामीण कहते हैं कि वे अपनी संस्कृति बचाना चाहते हैं तो इसे केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया मानना सही नहीं होगा। उनके सामने अपने गांव की सामाजिक संरचना को बचाए रखने का प्रश्न है। अगर कन्वर्ज़न के बाद एक हिस्सा गांव के पारंपरिक देवस्थलों, उत्सवों और संस्कारों से अलग हो जाता है, तो ग्रामसभा के सामने स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न आता है कि स्थानीय सामाजिक जीवन की एकता कैसे बनी रहेगी।


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यही वह बिंदु है जहां बस्तर की ग्रामसभाओं का प्रतिरोध एक बड़े सामाजिक आंदोलन का रूप लेता दिखाई देता है। कांकेर में ग्रामसभा ने बोर्ड लगाया। अब सुकमा में ग्रामसभा ने सूचना पट्ट लगाने का निर्णय लिया। दोनों घटनाओं के पीछे एक ही मूल चिंता दिखाई देती है, अपनी परंपरा और अपनी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा।


कांकेर से सुकमा तक की घटनाओं को जोड़ने पर यही सबसे बड़ा संदेश निकलता है कि बस्तर के जनजातीय गांव अब अपने सांस्कृतिक प्रश्नों को लेकर चुप रहने के पक्ष में नहीं हैं। वे यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि ईसाई मिशनरियों द्वारा विकास, सहायता, शिक्षा, स्वास्थ्य या धार्मिक प्रचार की आड़ में उनकी परंपराओं को धीरे-धीरे कमजोर किया जाए। मिशनरी गतिविधियों में बल, प्रलोभन या कपट शामिल है तो उसके खिलाफ आवाज उठाना उनका अधिकार ही नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक व्यवस्था की रक्षा का प्रयास भी है।


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वास्तव में कांकेर के गांवों ने जो सवाल उठाया था, पोलमपल्ली उसी सवाल को आगे बढ़ाता दिखाई दे रहा है। और शायद बस्तर की मौजूदा कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। यहां जनजातीय समाज अब ईसाई मिशनरी षड्यंत्र के सामने चुप नहीं रहना चाहता। वह अपनी संस्कृति, अपनी ग्राम व्यवस्था और अपनी परंपरा के बारे में स्वयं बोलना चाहता है। कन्वर्ज़न के खिलाफ उठती ये आवाजें इसी आत्मरक्षा की भावना से निकल रही हैं।


कन्वर्ज़न के खिलाफ यह प्रतिरोध आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है। क्योंकि अब यह सवाल किसी एक गांव का नहीं रह गया है। यह बस्तर के जनजातीय समाज के सामने खड़ा वह सवाल है जिसमें उसके लिए अपनी परम्परा बचाने और आने वाली पीढ़ियों को अपनी परंपरा सौंपने की चिंता जुड़ी हुई है।