
रक्षाबंधन जैसे पारिवारिक और सांस्कृतिक पर्व को लेकर बनी एक ज्वेलरी कंपनी के हालिया विज्ञापन के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कई प्रकार की चर्चाएँ शुरू हो गई हैं। इस विज्ञापन ने एक बार फिर यह प्रश्न सामने ला दिया है कि भारतीय संस्कृति को आधुनिक बनाने के नाम पर आखिर उसके साथ किया क्या जा रहा है।
विज्ञापन में कृति सेनन आधुनिकता के नाम पर फूहड़ परिधान में अपने भाई को राखी बांधती दिखाई देती हैं और विज्ञापन में पालतू कुत्ते को भी राखी बांधने का दृश्य शामिल है। विज्ञापन प्रसारित होने के बाद सोशल मीडिया पर इसके पहनावे और पर्व की प्रस्तुति को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। लोगों ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि क्या भारतीय त्योहारों की सांस्कृतिक पहचान को आधुनिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर इस तरह पुनर्परिभाषित किया जाना चाहिए?

लेकिन इस विवाद को केवल कृति सेनन के कपड़ों, किसी अभिनेत्री की निजी पसंद या सोशल मीडिया पर हुई आलोचना तक सीमित करना पर्याप्त नहीं है। यह विवाद उस बहुत बड़े सांस्कृतिक बदलाव की एक छोटी सी झलक है, जिसमें भारत की परंपराओं, पारिवारिक संबंधों, धार्मिक प्रतीकों और सामाजिक मूल्यों को धीरे धीरे उस भाषा में ढाला जा रहा है जिसमें ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस और कल्चरल मार्क्सिस्ट समूहों का एजेंडा छिपा है।
यह वही ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस हैं, जो अब केवल साबुन, कपड़े, आभूषण, कार या मोबाइल नहीं बेचती। वह जीवनशैली बेचती है। वह सामाजिक स्वीकार्यता बेचती है। वह आधुनिक होने की परिभाषा बेचती है। वह यह तय करने की कोशिश करती है कि परिवार कैसा दिखे, रिश्तों की भाषा कैसी हो, परंपराओं को किस तरह प्रस्तुत किया जाए और कौन सी पुरानी मान्यताएँ आधुनिक उपभोक्ता के लिए स्वीकार्य हैं।

वर्तमान विवाद में भी सवाल यह नहीं है कि एक अभिनेत्री क्या पहनती है। सवाल यह है कि जब कोई बहुराष्ट्रीय या बड़ा भारतीय ब्रांड किसी भारतीय पर्व को अपने विज्ञापन का विषय बनाता है, तो वह उस पर्व को किस अर्थ में प्रस्तुत करता है। क्या वह भारतीय परंपरा को उसके अपने संदर्भ में समझता है या उसे बाजार के अनुकूल नया रूप देता है? यहीं से ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस की भूमिका शुरू होती है।
भारत जैसे विशाल और सांस्कृतिक रूप से विविध समाज में यह प्रक्रिया और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां त्योहार केवल "बाज़ार" नहीं हैं। राखी केवल एक आभूषण खरीदने का अवसर नहीं है। दीपावली केवल खरीदारी का पर्व नहीं है। विवाह केवल फैशन और विलासिता का प्रदर्शन नहीं है। इनके पीछे धार्मिक विश्वास, पारिवारिक दायित्व, सामाजिक एकता, सम्बन्धों की संरचना और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं हैं। लेकिन ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस की नजर से देखा जाए तो यही भावनात्मक और सांस्कृतिक तत्व सबसे आकर्षक "व्यावसायिक" सामग्री बन जाते हैं।
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जिस त्योहार के साथ करोड़ों लोगों की भावनाएं जुड़ी हों, उसे विज्ञापन में इस्तेमाल करना स्वाभाविक रूप से अधिक प्रभावी होता है। ब्रांड को नई कहानी गढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती। सदियों से समाज में मौजूद भावनात्मक व्यवहार उसके सामने तैयार रहता है। उसे केवल पैकेजिंग बदलनी होती है। यहीं से संस्कृति का व्यवसायीकरण शुरू होता है, और यह व्यवसायीकरण हमेशा परंपरा को सीधे खारिज करके नहीं होता। इसका अधिक प्रभावी तरीका है परंपरा को बचाए रखना, लेकिन उसका अर्थ बदल देना।
रक्षाबंधन होगा, लेकिन राखी का पारंपरिक संदर्भ बदल दिया जाएगा है। दीपावली रहेगी, लेकिन उसका केंद्र धार्मिक अनुष्ठान से हटकर खरीदारी और जीवनशैली बना दिया जाएगा। भारतीय वस्त्र रहेंगे, लेकिन उन्हें केवल फैशन की वस्तु बना दिया जाएगा। परिवार दिखाई देगा, लेकिन उसकी पारंपरिक जिम्मेदारियां और मूल्य धीरे धीरे पृष्ठभूमि में चले जाएंगे। संस्कृति का बाहरी रूप बचा रहेगा, लेकिन उसकी आत्मा को ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस की जरूरतों के अनुसार ढाला जाएगा।

यही कारण है कि कृति सेनन का विज्ञापन केवल एक अलग घटना नहीं है। वह एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा दिखाई देता है। विज्ञापन में रक्षाबंधन मौजूद है, राखी मौजूद है, भाई बहन का रिश्ता मौजूद है, लेकिन पूरा दृश्य उस आधुनिक फैशन और जीवनशैली की भाषा में प्रस्तुत किया जाता है जो मूल सांस्कृतिक संदर्भ से अलग है। इसीलिए मूल प्रश्न इसलिए यह है ही नहीं कि कृति ने क्या पहना, मूल प्रश्न तो यह है कि एक पारंपरिक भारतीय पर्व को बेचने के लिए उस पर्व की दृश्यात्मक और सांस्कृतिक भाषा को किस हद तक बदला जा रहा है? और यहीं हमें कल्चरल मार्क्सिज़म को समझने की आवश्यकता है।
कल्चरल मार्क्सिज़म शब्द आज भले यह लगे कि यह हाल ही में लाया गया शब्द है, लेकिन इसके पीछे जो व्यापक बौद्धिक षड्यंत्र है, उसमें संस्कृति, सामाजिक संरचनाओं, सत्ता, परंपरा और जनसंचार की भूमिका को ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस से अलग करके नहीं देखा गया। फ्रैंकफर्ट स्कूल के कम्युनिस्ट विचारकों थियोडोर अडोर्नो और मैक्स हॉर्खाइमर ने कल्चरल इंडस्ट्री की अवधारणा के माध्यम से यह विचार सामने लाया कि आधुनिक संस्कृति किस तरह से ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस से जुड़ सकती है। उनके अनुसार संस्कृति कोई निजी अभिव्यक्ति मात्र नहीं होगी, बल्कि बड़े पैमाने पर ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस के लिए निर्मित और वितरित होने वाली वस्तु बन सकती है।

हमें यह समझना भी आवश्यक है कि ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस को परंपरा से कोई स्थायी प्रेम नहीं है और आधुनिकता से भी कोई वैचारिक लगाव नहीं है। उसे केवल बिक्री चाहिए। अगर परंपरा बिकती है तो ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस परंपरा का उत्सव मनाएगा। अगर परंपरा के विरुद्ध विद्रोह बिकता है तो ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस विद्रोह को भी चमकदार पैकेज में बेच देगा। अगर धार्मिक त्योहार बिक्री बढ़ाते हैं, तो ब्रांड त्योहारों के सबसे बड़े समर्थक बन जाएंगे। और अगर पारंपरिक मान्यताओं को चुनौती देने वाला संदेश युवा उपभोक्ताओं में अधिक लोकप्रिय है, तो वही ब्रांड उसी संदेश को अपनी पहचान बना लेंगे। यानी ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस का कोई स्थायी सांस्कृतिक पक्ष नहीं है। उसका पक्ष लाभ है।
यही कारण है कि हम जब अपने आस पास देखते हैं तो यह दिखाई देता है कि आज विद्रोह भी बिकता है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी बिकती है। कभी परंपरा से असहमति बिकती है, तो पारंपरिक परिवार की आलोचना भी बिकती है और इसके साथ ही पारंपरिक भारतीय परिधान, त्योहार और धार्मिक प्रतीक भी बिक सकते हैं। ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस दोनों को एक साथ बेच सकता है, क्योंकि उसके लिए दोनों विचार अंततः उपभोक्ता व्यवहार में बदलने वाली सामग्री हैं।

अब यहाँ बॉलीवुड की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। बॉलीवुड भारतीय समाज में केवल मनोरंजन उद्योग नहीं है। वह फैशन, भाषा, सम्बन्धों, जीवनशैली और सामाजिक आकांक्षाओं को प्रभावित करने वाली मशीन है। यह इंडस्ट्री कल्चरल मार्क्सिज़म और ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस का ऐसा गठजोड़ है, जो कभी स्पष्ट दिखाई नहीं देता है। फिल्मों में दिखने वाली जीवनशैली विज्ञापनों में पहुंचती है और विज्ञापनों में दिखाई देने वाला सेलिब्रिटी उपभोक्ता की आकांक्षा बन जाता है।
बॉलीवुड का सबसे बड़ा प्रभाव यह नहीं है कि वह किसी एक विचार को सीधे दर्शकों के दिमाग में डाल देता है। उसका प्रभाव इससे अधिक सूक्ष्म है। वह धीरे-धीरे यह सामान्य बनाता है कि क्या आधुनिक है, क्या पुराना है, क्या आकर्षक है, क्या पिछड़ा हुआ है, क्या स्वीकार्य है और किस चीज पर शर्म महसूस करनी चाहिए।
ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस के लिए यह व्यवस्था अत्यंत सुविधाजनक है। उसे भारत की संस्कृति समाप्त करने की आवश्यकता नहीं है। उसे केवल इतना करना है कि भारतीय संस्कृति का ऐसा संस्करण लोकप्रिय हो जाए जो बाजार के अनुकूल हो। यही वह बिंदु है जहां कल्चरल मार्क्सिज़म का षड्यंत्र शुरू होता है। दरअसल पहले परंपरा समाज तय करता था, अब कई मामलों में विज्ञापन एजेंसी उसका दृश्य रूप तय करती है। पहले त्योहार का अर्थ परिवार और समाज की स्मृति से निर्धारित होता था। अब ब्रांड की रचनात्मक टीम उसके लिए नया नैरेटिव लिखते हैं। और बॉलीवुड इन व्यवस्थाओं को सबसे अधिक आकर्षक चेहरा देता है।
यहीं कल्चरल मार्क्सिज़म का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु सामने आता है। यदि परंपरा, परिवार, धार्मिक प्रतीकों और सामाजिक मान्यताओं को लगातार संदेह की दृष्टि से देखा जाए, और दूसरी तरफ व्यक्ति की इच्छा, उपभोक्ता और व्यक्तिगत पहचान को सर्वोच्च मूल्य की तरह प्रस्तुत किया जाए, तो उसका अंतिम लाभ किसे मिलता है? हर बार ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस को। क्योंकि सामूहिकता की जगह व्यक्ति केंद्र में आएगा तो व्यक्ति की आवश्यकताएँ बढ़ेंगी। सामाजिक मान्यता की जगह निजी पसंद केंद्र में आएगी, तो नए उत्पादों और नई जीवनशैली के लिए बाजार बढ़ेगा।

इसलिए कल्चरल मार्क्सिज़म और ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस के बीच का यह गठजोड़ समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक तरफ सांस्कृतिक संरचनाओं और पारंपरिक संबंधों को तोड़ने की विचारधारात्मक प्रक्रिया दिखाई देती है, दूसरी तरफ वही विखंडन बाजार के लिए नए उपभोक्ता वर्ग और नई आकांक्षाएं पैदा कर सकता है।
हमें यह समझना भी आवश्यक है कि भारत को आधुनिक बनने के लिए यह प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है कि वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कितना दूर जा सकता है। बल्कि वास्तविक चुनौती यही है कि भारतीय संस्कृति को आधुनिकता के नाम पर किस दिशा में धकेला जा रहा है।
आज जो हम देख रहे हैं, वह उस बड़ी लड़ाई की एक झलक है जिसमें भारतीय संस्कृति और ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस आमने-सामने हैं। एक तरफ वह संस्कृति है जिसने हजारों वर्षों में परिवार, पर्व, सम्बंध और सामाजिक जीवन के अर्थ गढ़े हैं। दूसरी तरफ वह ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस है जो हर अर्थ को एक उत्पाद, हर भावना को एक विज्ञापन और हर पहचान को एक उपभोक्ता में बदलने की क्षमता रखता है।
इसलिए आज असली लड़ाई किसी अभिनेत्री के कपड़ों पर नहीं है। असली लड़ाई इस बात पर है कि भारतीय संस्कृति का अर्थ कौन तय करेगा। परिवार तय करेगा या विज्ञापन एजेंसी? समाज तय करेगा या सोशल मीडिया? पीढ़ियों की परम्परा तय करेगी या ब्रांड की रणनीति? और आधुनिकता की परिभाषा भारत स्वयं करेगा या ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस उसे धीरे धीरे बाजार की भाषा में लिखेंगे?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर ग्लोबल मार्केट फ़ोर्सेस के हाथों में चला गया, तो खतरा यह नहीं होगा कि भारतीय संस्कृति अचानक गायब हो जाएगी। उससे कहीं अधिक खतरनाक स्थिति यह होगी कि भारतीय संस्कृति हर जगह दिखाई देगी, लेकिन उसका अर्थ बाजार तय करेगा।