
कांग्रेस ने महिलाओं की स्वतंत्रता के समर्थन में जिस भाषा को हाल के दिनों में अपने राजनीतिक संदेश का हिस्सा बनाया है, उसके पीछे केवल एक सामान्य नारीवादी नारा नहीं, बल्कि माओवाद-वामपंथ की वैचारिक विरासत दिखाई देती है।
कांग्रेस के मीडिया एवं प्रचार विभाग के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने 25 अगस्त को महिलाओं की स्वतंत्रता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हर महिला को अपनी पसंद के कपड़े पहनने का अधिकार है, चाहे वह हिजाब हो, घूंघट हो या कुछ और। इस संदेश के अंत में उन्होंने #BreakTheCage और #SmashThePatriarchy हैशटैग लगाए। यह भाषा इसलिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि “Break the Cage” उसी लाइन का अंग्रेज़ी अनुवाद है, जिसका इस्तेमाल दिल्ली के कट्टरपंथी कम्युनिस्ट छात्र समूह “Pinjra Tod” के लिए किया जाता रहा है।

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने भी बीते सप्ताह “Pinjra Toda” या “Break the Cage” को महिलाओं की मुक्ति, व्यक्तिगत स्वायत्तता और सामाजिक बंधनों के विरोध के केंद्रीय प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया है। 22 अगस्त को पुणे में राहुल गांधी ने छात्रों के बीच आयोजित “छात्रों की गूँज” कार्यक्रम में “पिंजरा तोड़” विषय के तहत महिलाओं की स्वतंत्रता और पहचान की बात की तथा षड्यंत्र के तहत केवल और केवल हिंदू ग्रंथों एवं प्रतीकों का विरोध किया।
कांग्रेस जिस “पिंजरा तोड़ो” का कार्यक्रम कर रही है, वह कोई नया राजनीतिक नाम नहीं है। यह दिल्ली में 2015 के आसपास उभरे कट्टरपंथी कम्युनिस्ट छात्र समूह का नाम है, जिसने शुरुआत में महिला छात्रावासों और पीजी में लगाए जाने वाले कथित अलग नियमों का विरोध किया था। इसी कट्टरपंथी कम्युनिस्ट समूह ने अपने नाम को अंग्रेजी में “Break the Cage” के रूप में भी प्रस्तुत किया था।

वास्तव में “पिंजरा तोड़” का अर्थ ही “Break the Cage” है। इसलिए जब कांग्रेस का एक वरिष्ठ नेता उसी अंग्रेजी शब्द को अपने आधिकारिक राजनीतिक संदेश के साथ जोड़ता है और उसके साथ “Smash the Patriarchy” जैसे नारे लगाता है, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या कांग्रेस केवल सामान्य भाषा इस्तेमाल कर रही है या वह जानबूझकर उसी कट्टरपंथी कम्युनिस्ट शब्दावली को मुख्यधारा में ला रही है, जिससे समाज को तोड़ा जाए?
इस मामले में एक वाक़या विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि पिंजरा तोड़ से जुड़े कुछ प्रमुख नाम 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगा षड्यंत्र मामले में अभियोजन का हिस्सा रहे हैं।
दिल्ली पुलिस की जांच और बाद की अदालती कार्यवाहियों में देवांगना कलिता और नताशा नरवाल के नाम सामने आए थे। दोनों ही पिंजरा तोड़ से जुड़े हुए थे। कलिता के बारे में पुलिस का कहना था कि वह पिंजरा तोड़ और अन्य WhatsApp समूहों से जुड़ी थीं और इन समूहों के माध्यम से लोगों को जुटाने तथा साजिश में भूमिका निभा रही थी।

दिल्ली हाई कोर्ट के बाद के आदेशों में भी अभियोजन के उस आरोप का विस्तार से उल्लेख हुआ जिसमें पिंजरा तोड़ से जुड़े लोगों, विरोध स्थलों और समन्वय का जिक्र है। सितंबर 2025 के दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश में अभियोजन की ओर से यह आरोप दर्ज किया गया कि पिंजरा तोड़ से जुड़े लोगों ने स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर लामबंदी की। उसी आदेश में 23 जनवरी 2020 की एक बैठक का उल्लेख है जिसमें उमर खालिद और अन्य आरोपियों की मौजूदगी थी।
पुलिस के अनुसार, उस बैठक में पिंजरा तोड़ से जुड़े लोग और उमर खालिद सहित अन्य लोग मौजूद थे और प्रदर्शन को आगे बढ़ाने तथा हिंसा की तैयारी कर रहे थे। यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस के वर्तमान नारे को समझना आवश्यक है।

बात यही उठती है कि कांग्रेस ने वही शब्दावली क्यों चुनी जो वर्षों से कम्युनिस्ट कट्टरपंथी समूह पिंजरा तोड़ की पहचान रही है? और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि राहुल गांधी के पुणे कार्यक्रम में “पिंजरा तोड़ो” और उसके तुरंत बाद पवन खेड़ा के आधिकारिक संदेश में “Break the Cage” का आना महज संयोग है या कांग्रेस की नई राजनीतिक भाषा का हिस्सा? यहां कांग्रेस के राजनीतिक परिवर्तन को समझना जरूरी है।
पुरानी कांग्रेस की राजनीति में समाज सुधार, महिला अधिकार और संवैधानिक समानता की भाषा जरूर थी, लेकिन आज कांग्रेस के संदेश में विश्वविद्यालयों से निकली नई वामपंथी राजनीतिक शब्दावली तेजी से दिखाई दे रही है। “Patriarchy”, “bodily autonomy”, “break the cage” और “individual identity” जैसे शब्द अब केवल अकादमिक बहस के शब्द नहीं रह गए हैं। वे कांग्रेस की राजनीतिक अभियान की भाषा बन चुके हैं।

इस शब्दावली को समझना आवश्यक है क्योंकि, समस्या तब पैदा होती है जब कोई राष्ट्रीय राजनीतिक दल यह स्पष्ट किए बिना किसी कम्युनिस्ट कट्टरपंथी समूह से निकले प्रतीकों को अपने अभियान में शामिल करता है, तो इसके पीछे उसकी क्या योजना हो सकती है?
यही वह परिवर्तन है जिसे कांग्रेस के वर्तमान संदेश के संदर्भ में देखना चाहिए। प्रश्न यह भी होना चाहिए कि क्या कांग्रेस अब उस राजनीतिक शब्दावली को मुख्यधारा में ला रही है जो दिल्ली के विश्वविद्यालयों के कट्टर वामपंथी छात्र समूहों में विकसित हुई? क्या “Break the Cage” केवल एक नारा है या कांग्रेस की नई वैचारिक भाषा का संकेत? इन सवालों का जवाब कांग्रेस को देना चाहिए।

एक और बात ग़ौर करने लायक है कि जिस कम्युनिस्ट कट्टरपंथी समूह के नाम से “Break the Cage” की पहचान बनी, उसके दो प्रमुख सदस्यों के नाम 2020 दिल्ली दंगा षड्यंत्र मामले में अभियोजन रिकॉर्ड में आए। जनवरी 2026 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश में भी उमर खालिद से संबंधित कार्यवाही में पिंजरा तोड़ और अन्य समूहों का उल्लेख आता है।
वहीं कांग्रेस का रूख हमने हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों के समय देखा था, जिसमें कांग्रेस के कई नेता न्यायालय द्वारा दोषी ठहराए जा चुके आम आदमी पार्टी के तत्कालीन नेता तहिर हुसैन जैसे दंगाइयों को भी निर्दोष बताने की मुहिम चलाई थी। वहीं इस्लामिक जिहादियों एवं कम्युनिस्ट कट्टरपंथी समूहों के द्वारा की गए दंगे का आरोप हिंदुओं पर मढ़ने का काम किया था। क्या यही कारण है कि कांग्रेस अब दिल्ली दंगे से जुड़े लोगों के नारों के माध्यम से उन्हें प्रोत्साहित करने का काम कर रही है?

कांग्रेस ने महिला स्वतंत्रता के नाम पर अपने अभियान को एक ऐसे वैचारिक फ्रेम में रखा है जिसकी जड़ें कम्युनिस्ट कट्टरपंथी समूह की शब्दावली में दिखाई देती हैं। यहां कांग्रेस के सामने असली सवाल यह नहीं है कि महिलाओं को क्या पहनना चाहिए। असली सवाल यह है कि कांग्रेस अपनी नई राजनीतिक भाषा कहां से ले रही है?
एक समय कांग्रेस स्वयं को भारतीय लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद, संवैधानिक उदारवाद और व्यापक सामाजिक गठबंधन की पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती थी। आज उसके शीर्ष नेता जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसमें कट्टर वामपंथी छात्र विमर्श और पहचान आधारित राजनीतिक सिद्धांतों की छाप अधिक स्पष्ट दिखाई देती है।