भारत के शत्रु को “महान” बता रही INDIA ब्लॉक की पार्टी, कांग्रेस और राहुल गांधी चुप क्यों?

CPI(M) ने माओ जेडोंग की 50वीं पुण्यतिथि पर उसे “महान क्रांतिकारी” बताते हुए सलाम किया है। वही माओ 1962 में भारत के खिलाफ युद्ध के समय चीन के शीर्ष नेतृत्व में निर्णायक भूमिका में था और उसकी नीतियां करोड़ों मौतों व दमन से जुड़ी रही हैं।

The Narrative World    10-Sep-2026   
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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी अर्थात CPI(M) ने माओ जेडोंग की 50वीं बरसी पर जो किया, वह सिर्फ एक सोशल मीडिया पोस्ट नहीं है। वह भारतीय राजनीति में उस वैचारिक सच्चाई का खुला प्रदर्शन है जिसे वर्षों से लोकतंत्र, संविधान, असहमति और मानवाधिकार की भाषा के पीछे छिपाया जाता रहा है।


9 सितंबर को CPI(M) के आधिकारिक अकाउंट से लिखा गया, “We salute the great revolutionary Mao Zedong, the main leader and strategist of the Chinese revolution.” यानी भारत की एक प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टी ने माओ कोमहान क्रांतिकारीबताते हुए उसे सलाम किया। इसमें न कोई आलोचनात्मक टिप्पणी थी, न माओ के शासन की भयावह मानवीय कीमत का उल्लेख था और न ही भारत के खिलाफ 1962 के युद्ध का कोई संदर्भ था।


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यही वह एक वाक्य है जिसे भारत के राजनीतिक विमर्श के सामने रखकर देखने की जरूरत है। क्योंकि यह उसी माओ की प्रशंसा है जिसके नेतृत्व में चीन ने भारत के खिलाफ 1962 का युद्ध लड़ा था और भारत के सैकड़ों सैनिक बलिदान हुए थे। यह उसी माओ की प्रशंसा है जिसकी राजनीतिक परियोजनाएं चीन में करोड़ों लोगों की मौत से जुड़ी हुई हैं। ग्रेट लीप फॉरवर्ड के दौरान जबरन सामूहिकीकरण और श्रम अभियानों से जुड़े अकाल में मौतों के अनुमान करोड़ों में हैं।


The China Quarterly में प्रकाशित 2025 के शोध में माओ की नीतियों से जुड़े ग्रेट लीप फॉरवर्ड अकाल में 45 मिलियन तक मौतों का अनुमान दिया गया है। सांस्कृतिक क्रांति के ग्रामीण चीन पर प्रभाव का अध्ययन करने वाले Andrew Walder और Yang Su ने 7.5 लाख से 15 लाख मौतों और लगभग 3.6 करोड़ लोगों के राजनीतिक उत्पीड़न का अनुमान दिया था।


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फिर भी भारत की एक कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस नीत INDIA ब्लॉक में राहुल गांधी की प्रमुख सहयोगी दल CPI(M) को माओ में सबसे पहले और सबसे प्रमुख रूप से क्या दिखाई देता है? “महान क्रांतिकारी।और उसके बादसलाम।


जब एक राजनीतिक पार्टी अपने आधिकारिक मंच से माओ को “great revolutionary” (महान क्रांतिकारी) कहती है, तो वह इतिहास नहीं पढ़ा रही होती, वह अपनी वैचारिक निष्ठा प्रदर्शित कर रही होती है। और इस वैचारिक निष्ठा की सबसे बड़ी बात यह है कि माओ की विरासत में चीनी क्रांति नहीं, बल्कि सत्ता के लिए निर्मम राजनीतिक हिंसा है, राज्य शक्ति का केंद्रीकरण है, अकाल है, दमन है, नरसंहार है, सांस्कृतिक क्रांति है और सबसे महत्वपूर्ण भारत के खिलाफ युद्ध है।


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लेकिन कांग्रेस और राहुल गांधी के महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में मौजूद CPI(M) को इन सबका उल्लेख करना जरूरी नहीं लगता। उसे माओ के मौत के पचास बरस बाद भी यह बताना जरूरी नहीं लगता कि जिस व्यक्ति को वह महान कह रही है, उसकी नीतियों से जुड़ी मानवीय त्रासदियां किस पैमाने की थीं। उसे यह भी जरूरी नहीं लगता कि भारतीय लोगों को याद दिलाया जाए कि माओ का भारत से संबंध केवल मार्क्सवादी विचारधारा या चीनी क्रांति तक सीमित नहीं था। माओ का भारत से एक और सीधा संबंध है, और वह संबंध 1962 की गोलियों और युद्ध से जुड़ा है।


1962 में चीन ने भारत पर हमला किया। उस समय चीन का सर्वोच्च नेता माओ जेडोंग था। अब 1962 का युद्ध कोई ऐसा सैन्य घटनाक्रम नहीं था जिसे माओ से अलग करके देखा जा सके। माओ ने ही भारत पर हमला करने की रणनीति बनाई थी और सेना को हमला करने के लिए भेजा था। अध्ययन के अनुसार माओ का उद्देश्य भारत को दबाव में लाना और व्यापक अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक समीकरणों में चीन की स्थिति मजबूत करना था। अक्टूबर 1962 में माओ ने युद्ध का फैसला किया तथा 20 अक्टूबर को चीनी सेना ने भारतीय क्षेत्रों पर समन्वित हमला शुरू किया।


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इसलिए जब कांग्रेस और राहुल गांधी का एक सहयोगी दल माओ कोमहान क्रांतिकारीकहकर सलाम करता है, तो वह किसी ऐसे विदेशी नेता को सम्मान नहीं दे रहा जिसका भारत से कोई लेना देना नहीं था। वह उस व्यक्ति की प्रशंसा कर रहा है जिसने शत्रु के रूप में भारत के खिलाफ युद्ध किया। यह तथ्य भारतीय राजनीतिक विमर्श में गायब क्यों हो जाता है? यह प्रश्न जितना CPI(M) से है, उतना ही उन लोगों से भी है जो CPI(M) के साथ राजनीतिक मंच साझा करते हैं और लोकतंत्र की नैतिकता पर बड़े बड़े भाषण देते हैं।


यहीं कांग्रेस और INDIA ब्लॉक की भूमिका और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। उसके राजनीतिक गठबंधन में शामिल एक कम्युनिस्ट पार्टी भारत के खिलाफ युद्ध करने वाले चीनी नेता कोमहान क्रांतिकारीकहकर सलाम करती है और कांग्रेस इस पर चुप है। गठबंधन केवल सीटों का जोड़ नहीं होता। अगर INDIA ब्लॉक स्वयं को लोकतंत्र बचाने वाला राजनीतिक मोर्चा बताता है, तो उसे यह भी बताना होगा कि उसके सहयोगियों की वैचारिक सीमाएं कहां तक हैं।


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CPI(M) स्वयं INDIA ब्लॉक से अपनी राजनीतिक निकटता छिपाती नहीं है। उसके आधिकारिक राजनीतिक दस्तावेजों में INDIA ब्लॉक के साथ सहयोग और भाजपा के खिलाफ संयुक्त राजनीतिक संघर्ष की बात स्पष्ट रूप से दर्ज है। पार्टी ने संसद के भीतर और बाहर समान मुद्दों पर INDIA ब्लॉक के घटक दलों के साथ सहयोग की अपनी नीति भी दोहराई है। ऐसे में कांग्रेस यह कहकर जिम्मेदारी से बच नहीं सकती कि माओ की श्रद्धांजलि CPI(M) का आंतरिक मामला है। यदि CPI(M) राजनीतिक रूप से कांग्रेस का सहयोगी है, यदि उसके साथ आप भाजपा विरोधी राजनीतिक मोर्चे का हिस्सा हैं, यदि उसके नेताओं के साथ मंच साझा करते हैं, तो उसके वैचारिक बयानों पर सवाल उठाना भी उसी लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा होना चाहिए।


भाजपा के किसी नेता के बयान पर पूरा विपक्ष एक सुर में खड़ा हो सकता है। संघ, राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, फासीवाद और अधिनायकवाद जैसे शब्दों की पूरी शब्दावली सक्रिय हो जाती है। प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है, बयान आते हैं, सोशल मीडिया अभियान चलते हैं और लोकतंत्र खतरे में होने की घोषणा कर दी जाती है। लेकिन जब उसी राजनीतिक खेमे का एक सहयोगी माओ को महान बताकर सलाम करता है, तो अचानक लोकतंत्र की सारी घंटियां बंद हो जाती हैं। मानवाधिकार के पहरेदार चुप हो जाते हैं। असहमति के योद्धाओं को जैसे कुछ दिखाई ही नहीं देता।


कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए कि उसके लिए लोकतंत्र का अर्थ क्या है। क्या लोकतंत्र केवल नरेंद्र मोदी और भाजपा की आलोचना करने का अधिकार है? क्या मानवाधिकार केवल तब याद आते हैं जब आरोप किसी भाजपा सरकार या संगठन पर लगाया जा सके? क्या राजनीतिक हिंसा का विरोध केवल तब किया जाना चाहिए जब उसका संबंध आपके प्रतिद्वंद्वी से हो? अगर नहीं, तो माओ के मामले में कांग्रेस की आवाज कहां है?


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INDIA ब्लॉक के दूसरे दलों से भी यही प्रश्न पूछा जाना चाहिए। क्या वे CPI(M) के इस बयान से सहमत हैं? क्या उनके लिए माओमहान क्रांतिकारीहैं? क्या वे उस व्यक्ति की सार्वजनिक प्रशंसा को स्वीकार करते हैं जिसके नेतृत्व वाले चीन ने 1962 में भारत के खिलाफ युद्ध किया? क्या गठबंधन में बने रहने की राजनीतिक मजबूरी इतनी बड़ी है कि इस प्रश्न पर भी कोई सार्वजनिक असहमति दर्ज नहीं की जाएगी?


यह गठबंधन भाजपा विरोध को अपनी साझा पहचान बना सकता है, लेकिन वह यह नहीं बता पा रहा कि सत्ता और विचारधारा के प्रश्न पर उसकी अपनी सीमा क्या है। एक तरफ संविधान और लोकतंत्र की दुहाई, दूसरी तरफ माओ की प्रशंसा! एक तरफ फासीवाद के खिलाफ संघर्ष, दूसरी तरफ ऐसे नेता का महिमामंडन जिसके शासन की राजनीतिक संस्कृति में व्यापक दमन और हिंसा शामिल थी। एक तरफ भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित की बात, दूसरी तरफ उस चीनी नेतृत्व की वैचारिक विरासत के प्रति श्रद्धा जिसने भारत के खिलाफ युद्ध किया। यह विरोधाभास इतना स्पष्ट है कि इसे समझने के लिए किसी राजनीतिक विशेषज्ञ की जरूरत नहीं है।


यहां कांग्रेस की चुप्पी केवल राजनीतिक चुप्पी नहीं लगती, बल्कि राजनीतिक सुविधा दिखाई देती है। उसे CPI(M) की जरूरत है, उसे विपक्षी एकता की जरूरत है, उसे भाजपा विरोधी वोटों का जोड़ चाहिए और इसलिए वह ऐसे सवालों को उठाने से बचती है जिनसे गठबंधन की एकता में दरार पड़ सकती है।


CPI(M) ने माओ को सलाम किया है। अब कांग्रेस और INDIA ब्लॉक की बारी है कि वे बताएं, क्या वे उस सलाम से असहमत हैं या राजनीतिक सुविधा के लिए उसे निगल जाएंगे।