
दुनिया तेजी से बदलते भू राजनीतिक समीकरणों, व्यापारिक तनावों, ऊर्जा असुरक्षा और वैश्विक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व की बहस के बीच 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रही है। भारत के लिए यह महज दो दिन का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं है। 1 जनवरी 2026 को चौथी बार BRICS की अध्यक्षता संभालने के बाद भारत ने पूरे वर्ष जिस तरह इस समूह के एजेंडे को व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों, आपूर्ति श्रृंखला, डिजिटल सहयोग और ग्लोबल साउथ की आवाज जैसे व्यावहारिक मुद्दों से जोड़ा है, उसका राजनीतिक और कूटनीतिक प्रदर्शन अब भारत की राजधानी में होने वाले शिखर सम्मेलन में दिखाई देगा। भारत ने इस वर्ष 25 से अधिक शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए हैं।
भारत की BRICS अध्यक्षता का आधिकारिक सूत्र है, “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability”, जिसके साथ “Humanity First” का दृष्टिकोण जोड़ा गया है। यह शब्दावली अपने आप में भारत की कूटनीतिक दिशा को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। भारत ने BRICS की अध्यक्षता में ब्रिक्स को आर्थिक विकास, तकनीकी सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, डिजिटल परिवर्तन और विकासशील देशों की संस्थागत आवाज के मंच के रूप में आगे बढ़ाया गया है। यही वह अंतर है जो भारत की BRICS नीति को चीन की संभावित भू राजनीतिक प्राथमिकताओं से अलग पहचान देता है।

BRICS की कहानी समझना भी जरूरी है। ब्रिक शब्द मूल रूप से 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील के एक आर्थिक विश्लेषण से लोकप्रिय हुआ था, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन को तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के रूप में देखा गया था। बाद में इन देशों ने इसे राजनीतिक और आर्थिक समन्वय के मंच में बदला। 2006 में BRIC के रूप में औपचारिक अंतर सरकारी सहयोग शुरू हुआ और 2009 में पहला शिखर सम्मेलन हुआ। 2011 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसका नाम BRICS हो गया। 2024 से इसके विस्तार के साथ मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी सदस्य बने। वर्तमान में BRICS में 11 देश हैं।
यानी आज का BRICS के भीतर एशिया, अफ्रीका, पश्चिम एशिया और लैटिन अमेरिका की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और महत्वपूर्ण ऊर्जा तथा संसाधन शक्तियां मौजूद हैं। भारत की दृष्टि से यह विस्तार चुनौती से अधिक अवसर बन सकता है, क्योंकि एक ही मंच पर चीन, रूस, खाड़ी की प्रमुख शक्तियां, इंडोनेशिया, ब्राजील और अफ्रीकी देश मौजूद हैं। भारत इन लगभग सभी शक्तियों के साथ अलग-अलग स्तर पर राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंध रखता है। यही भारत की कूटनीतिक स्थिति को विशेष बनाता है। भारत ने 2026 की अध्यक्षता में इसी वास्तविक शक्ति को अधिक व्यावहारिक दिशा देने की कोशिश भी की है। अगस्त में जयपुर में आयोजित BRICS कॉमर्स मंत्रियों की बैठक इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।

BRICS अमेरिका के संदर्भ में भी भारत को अतिरिक्त कूटनीतिक जगह देता है। भारत खुलकर BRICS को अमेरिका के खिलाफ मंच नहीं बना रहा, लेकिन BRICS के भीतर भारत जिन विकल्पों, साझेदारियों और आर्थिक नेटवर्कों को मजबूत कर रहा है, वे अप्रत्यक्ष रूप से उसकी बातचीत की क्षमता बढ़ाते हैं। यह एक स्पष्ट कूटनीतिक परिणाम जरूर है कि भारत जितने अधिक आर्थिक और रणनीतिक विकल्प अपने पास रखता है, उतना ही वह किसी एक शक्ति पर निर्भर हुए बिना वॉशिंगटन के साथ बातचीत कर सकता है।
भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी रखता है, रूस के साथ ऊर्जा और रणनीतिक संबंध बनाए रखता है, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और संवाद दोनों करता है, खाड़ी देशों के साथ गहरे आर्थिक संबंध रखता है और ग्लोबल साउथ में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका को मजबूत कर रहा है। BRICS इस पूरी बहुस्तरीय विदेश नीति को एक मंच प्रदान करता है।

दिल्ली सम्मेलन के ठीक पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की उपस्थिति ने इस कूटनीतिक महत्व को और बढ़ा दिया है। शी की संभावित यात्रा सात वर्षों में उनकी पहली भारत यात्रा होगी और इसे भारत तथा चीन के बीच हालिया कूटनीतिक सुधार के संदर्भ में देखा जा रहा है।
BRICS में भारत की एक बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने आर्थिक सहयोग को केवल बड़ी सरकारी कंपनियों और बहुराष्ट्रीय संस्थानों तक सीमित नहीं रखा। भारत की अध्यक्षता में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के सहयोग को प्रमुखता मिली है। अप्रैल में BRICS लघु और मध्यम उद्यम कार्यसमूह की बैठक में छोटे और मध्यम कारोबारों के लिए ऋण अंतर, वित्तीय समावेशन, ऋण प्राप्त करने की तैयारी, वित्तीय तकनीक आधारित ऋण और वैश्विक व्यापार भुगतान पर चर्चा हुई। मई में तकनीक तक पहुंच और तकनीक के व्यावसायीकरण को लेकर दूसरी बैठक हुई।

जयपुर की बैठक में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के ऋण के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों पर सहमति भी बनी, जिसका उद्देश्य व्यापार वित्त के अंतर को कम करना और छोटे व्यवसायों की वैश्विक बाजारों तक पहुंच बढ़ाना है। भारत की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS का आर्थिक लाभ केवल बड़े निर्यातकों तक सीमित रखने के बजाय छोटे और मध्यम भारतीय उद्यमों तक पहुंचाने का प्रयास दिखाई देता है।
तकनीक के क्षेत्र में भी भारत ने अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की है। भारत के पास यूपीआई और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का अनुभव है और BRICS की अध्यक्षता के दौरान डिजिटल परिवर्तन, सूचना एवं संचार तकनीक सहयोग तथा मजबूत डिजिटल बुनियादी ढांचे को प्रमुखता दी गई। अगस्त में BRICS संचार मंत्रियों की बैठक का एजेंडा भी सूचना एवं संचार तकनीक, डिजिटल परिवर्तन, नवाचार और मजबूत डिजिटल बुनियादी ढांचे पर केंद्रित था।

ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की BRICS अध्यक्षता का परिणाम और अधिक ठोस दिखाई देता है। जून में गुरुग्राम में BRICS ऊर्जा मंत्रियों की बैठक आयोजित हुई, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा, विविध ऊर्जा स्रोत, महत्वपूर्ण खनिज, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती, बिजली ग्रिड का आधुनिकीकरण और ऊर्जा भंडारण पर चर्चा हुई।
यह भारत के लिए महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा उसकी आर्थिक वृद्धि से सीधे जुड़ी है। BRICS में रूस, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान और ब्राजील जैसे प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों की मौजूदगी भारत को एक ऐसे मंच पर रखती है जहां ऊर्जा सुरक्षा और ऊर्जा परिवर्तन दोनों पर बातचीत संभव है।
विज्ञान और तकनीक में भी यही पैटर्न दिखाई देता है। अगस्त में चेन्नई में BRICS विज्ञान, तकनीक और नवाचार से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक हुई, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत तकनीक, विज्ञान एवं तकनीक सहयोग और युवा वैज्ञानिकों तथा युवा नवोन्मेषकों से जुड़े कार्यक्रमों पर काम आगे बढ़ाया गया।

इस पूरी प्रक्रिया में शायद भारत की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि बैठक बुलाने और विभिन्न देशों को एक मंच पर लाने की क्षमता है। 2026 की अध्यक्षता के दौरान 25 से अधिक भारतीय शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित करना केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं है। यह एक कूटनीतिक संकेत भी है कि भारत अलग-अलग क्षेत्रों, संस्थानों और देशों को एक साझा मंच पर ला सकता है।
इसका एक प्रतीकात्मक महत्व भी है। 2023 में भारत ने नई दिल्ली में जी20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी और अफ्रीकी संघ को जी20 में स्थायी सदस्य के रूप में शामिल कराने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अब 2026 में वही भारत BRICS की अध्यक्षता के माध्यम से वैश्विक दक्षिण की दूसरी बड़ी राजनीतिक और आर्थिक धुरी के भीतर अपना प्रभाव प्रदर्शित कर रहा है। दिल्ली का भारत मंडपम एक बार फिर वैश्विक कूटनीति का केंद्र बनने जा रहा है।

दिल्ली में होने वाला सम्मेलन इसलिए केवल BRICS का सम्मेलन नहीं है। यह इस बात का प्रदर्शन भी है कि भारत आज किस तरह एक साथ कई वैश्विक शक्तियों के साथ संवाद कर सकता है, ग्लोबल साउथ की भाषा बोल सकता है, अपनी आर्थिक और तकनीकी क्षमता प्रस्तुत कर सकता है और फिर भी अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रख सकता है।