दो BRICS, दो तस्वीरें: तब कांग्रेस की अव्यवस्था थी, आज भारत का आत्मविश्वास है

2012 में कांग्रेस नीत UPA सरकार की मेजबानी में सुरक्षा चूक, ठप संचार व्यवस्था और परिवहन अव्यवस्था ने भारत की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल खड़े किए थे। 2026 में वही दिल्ली अधिक सटीक तैयारी, बेहतर समन्वय और आत्मविश्वास के साथ विश्व के नेताओं की मेजबानी कर रही है।

The Narrative World    11-Sep-2026   
Total Views |

Representative Image
सितंबर
2026 में भारत एक बार फिर नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अन्य सदस्य देशों के शीर्ष नेता राजधानी पहुंच रहे हैं। इस बार दिल्ली में सुरक्षा, यातायात, होटल, एयरपोर्ट और वीवीआईपी आवाजाही के लिए बहुस्तरीय तैयारियां की गई हैं।


Representative Image

लेकिन इस आयोजन को केवल आज की व्यवस्था से देखना अधूरा होगा। चौदह साल पहले, मार्च 2012 में, जब कांग्रेस नेतृत्व वाली UPA सरकार ने चौथे BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी, तब भी भारत को दुनिया के सामने अपनी बढ़ती वैश्विक शक्ति का प्रदर्शन करना था। अंतर यह था कि उस समय अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के इस मंच के पीछे राजनीतिक-प्रशासनिक अव्यवस्था की ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने भारत की सुरक्षा और शासन क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।


2012 का BRICS सम्मेलन 29 मार्च को नई दिल्ली में हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मेजबान थे और रूस, चीन, ब्राजील तथा दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्राध्यक्ष भारत आए थे। यह वह दौर था जब भारत स्वयं को तेजी से उभरती वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा था। BRICS उस समय अपेक्षाकृत नया लेकिन तेजी से प्रभावशाली होता मंच था और दिल्ली को विश्व की नजरों के सामने अपनी कूटनीतिक और प्रशासनिक क्षमता साबित करनी थी। लेकिन सम्मेलन से पहले और उसके दौरान सामने आई घटनाओं ने इस दावे की चमक को कई जगह धुंधला कर दिया।


Representative Image

सबसे गंभीर सुरक्षा घटना इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सामने आई। रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव के दिल्ली पहुंचने से कुछ घंटे पहले टर्मिनल 1D के बाहर एक कूड़ेदान से 185 जिंदा .22 कैलिबर कारतूस बरामद हुए। पुलिस के अनुसार एक सफाईकर्मी ने इन्हें भूरे कपड़े में पैक हालत में पाया था। पुलिस ने मामला दर्ज किया और CCTV फुटेज की जांच शुरू की। अब सोचिए कि जिस समय दिल्ली विदेशी राष्ट्राध्यक्षों की सुरक्षा के लिए हाई अलर्ट पर थी, उसी समय एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट परिसर के बाहर इतनी बड़ी संख्या में जिंदा कारतूस कैसे पहुंच गए?


Representative Image

इसके बाद राजधानी की परिवहन व्यवस्था ने सरकार की फिर से पोल खोल दी। BRICS सम्मेलन के दिन दिल्ली मेट्रो की द्वारका, वैशाली और नोएडा की ओर जाने वाली लाइन पर प्रगति मैदान के पास ट्रैक सर्किट में तकनीकी खराबी आ गई। DMRC के अनुसार सिग्नलिंग में आई खराबी के कारण ट्रेनों को सामान्य गति से काफी कम गति पर चलाना पड़ा। खराबी लगभग दोपहर बाद ठीक हुई और उसके बाद भी सामान्य संचालन बहाल होने में समय लगा। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मेट्रो की इस समस्या के साथ वीआईपी आवाजाही के कारण लगाए गए ट्रैफिक डायवर्जन ने दिल्लीवासियों की परेशानी और बढ़ा दी।


Representative Image

वहीं चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ की यात्रा ने कांग्रेस सरकार के सुरक्षा प्रबंधन की एक और परत खोल दी। तिब्बती प्रदर्शनकारियों ने उनके भारत दौरे का विरोध किया। पुलिस ने बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया और चीनी राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए राजधानी में व्यापक इंतजाम किए। इसके बावजूद प्रदर्शनकारी संवेदनशील इलाकों के काफी करीब पहुंचने में सफल रहे।

29
मार्च को तिब्बती कार्यकर्ताओं ने एक फुटओवर ब्रिज पर झंडा फहराया, जो उस होटल से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर था जहां हू जिंताओ BRICS बैठक के लिए पहुंचे थे। पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका और हिरासत में लिया। इससे पहले भी प्रदर्शनकारियों ने उस होटल तक पहुंचने की कोशिश की थी जहां चीनी राष्ट्रपति ठहरे हुए थे।


Representative Image

और फिर सामने आया एक ऐसा मामला जिसने दिखाया कि अत्यधिक वीआईपी सुरक्षा के बीच सामान्य कानून व्यवस्था किस तरह पीछे छूट सकती है।


हू जिंताओ के दौरे और BRICS सम्मेलन के दौरान खान मार्केट को भी लगभग सुरक्षा घेरे में रखा गया था। इसके बावजूद 29 मार्च की रात वहां एक चोर ने Café Turtle और उससे सटे एक बुकस्टोर में सेंध लगाई और बाद में पास के एक डॉक्टर के क्लिनिक में भी घुस गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पहली जगह से 45 हजार रुपये से अधिक की रकम चोरी हुई और लगभग इतनी ही रकम क्लिनिक से भी ले जाई गई। विडंबना यह थी कि बाजार में दो दर्जन से अधिक CCTV कैमरे लगे होने के बावजूद कैमरों में चोर का चेहरा स्पष्ट रूप से कैद नहीं हो सका।


Representative Image

लेकिन 2012 की सबसे गंभीर प्रशासनिक कहानी शायद कारतूस, मेट्रो या चोरी से भी अधिक महत्वपूर्ण थी। वह थी पुलिस की संचार व्यवस्था का संकट। दिल्ली पुलिस का लगभग 100 करोड़ रुपये का TETRA संचार नेटवर्क BRICS सुरक्षा ऑपरेशन के दौरान ठप हो गया। यह वही प्रणाली थी जिसे पुराने वायरलेस नेटवर्क की जगह आधुनिक और अधिक समन्वित संचार व्यवस्था के रूप में विकसित किया गया था। इसका उद्देश्य पुलिस और दूसरी एजेंसियों को एक साझा संचार मंच उपलब्ध कराना था। लेकिन जब विदेशी राष्ट्राध्यक्षों की आवाजाही और सुरक्षा के दौरान इस नेटवर्क की सबसे अधिक आवश्यकता थी, तभी इसमें समस्या आ गई। पुलिस को बैकअप व्यवस्था पर लौटना पड़ा।


यह मामला केवल तकनीक के खराब होने का नहीं था। यह सरकारी खरीद, परीक्षण, निगरानी और जवाबदेही की पूरी श्रृंखला पर सवाल था। यदि कोई संचार प्रणाली 100 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी वास्तविक आपात स्थिति में भरोसेमंद नहीं है और पुलिस पहले से उसके बैकअप का इस्तेमाल करती रही है, तो सवाल यह है कि उसे पूर्ण रूप से परिचालन में लाने की जल्दबाजी क्यों थी और उसकी कमियों को समय रहते दूर क्यों नहीं किया गया?


Representative Image

यहीं 2012 के BRICS सम्मेलन की सबसे बड़ी कहानी छिपी है। अलग-अलग घटनाओं को अलग-अलग देखने पर हर घटना के लिए एक स्पष्टीकरण मिल सकता है। कारतूस किसी यात्री ने फेंके होंगे। मेट्रो में तकनीकी खराबी हुई होगी। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस को चकमा दिया होगा। चोर ने सुरक्षा व्यवस्था का फायदा उठाया होगा। TETRA प्रणाली में तकनीकी समस्या आई होगी। लेकिन शासन की परीक्षा केवल इस बात से नहीं होती कि किसी एक घटना के लिए स्पष्टीकरण उपलब्ध है या नहीं। शासन की असली परीक्षा तब होती है जब कई प्रणालियां एक साथ दबाव में हों। और 2012 में यही दबाव दिखाई दिया।


कांग्रेस नीत UPA सरकार के सामने केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने की चुनौती नहीं थी। उसे यह साबित करना था कि भारत दुनिया की बड़ी शक्तियों के साथ बैठने के योग्य ही नहीं, बल्कि एक बड़े वैश्विक आयोजन को पेशेवर तरीके से संचालित करने में भी सक्षम है। इसके बजाय सम्मेलन के आसपास सुरक्षा डर, सार्वजनिक परिवहन की परेशानी, यातायात अव्यवस्था, संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास प्रदर्शन और पुलिस संचार प्रणाली की विफलता जैसी खबरें सामने आईं।


Representative Image

यही वह जगह है जहां 2026 का भारत एक महत्वपूर्ण तुलना प्रस्तुत करता है। सितंबर 2026 में दिल्ली एक बार फिर दुनिया के शीर्ष नेताओं की मेजबानी कर रही है। इस बार BRICS का आकार भी 2012 की तुलना में काफी बड़ा है। भारत जिस संगठन की मेजबानी कर रहा है उसमें अब 11 सदस्य देश हैं और दर्जनों प्रतिनिधिमंडल राजधानी पहुंच रहे हैं। रूस के पुतिन और चीन के शी जिनपिंग जैसे नेताओं की सुरक्षा अपने आप में विशाल चुनौती है। इसके बावजूद तैयारी का तरीका कहीं अधिक व्यापक और बहुस्तरीय दिखाई देता है।


दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था में लगभग 15,000 पुलिसकर्मियों और अर्धसैनिक बलों की लगभग 200 कंपनियों की तैनाती की है। अलग-अलग रिपोर्टों में कुल सुरक्षा तैनाती के आंकड़े इससे भी अधिक बताए गए हैं। 500 से अधिक CCTV कैमरों की निगरानी, विशेष मार्गों की सुरक्षा, एयरपोर्ट से लेकर होटलों और भारत मंडपम तक सुरक्षा घेरा, तकनीकी निगरानी और मॉक ड्रिल जैसी तैयारियां की गई हैं। अधिकारियों ने इसे 2023 के G20 शिखर सम्मेलन के स्तर की तैयारियों के समान बताया है।


Representative Image

दिल्ली पुलिस ने पड़ोसी राज्यों के साथ भी समन्वय बैठकें की हैं। दिल्ली, गाजियाबाद और नोएडा के बीच यातायात और सुरक्षा समन्वय की तैयारी की गई है। मार्गों का सर्वेक्षण, संवेदनशील स्थानों की पहचान, आपात प्रतिक्रिया, सीमा निगरानी और खुफिया सूचनाओं के आदान प्रदान पर भी जोर दिया गया है।


यही वह प्रशासनिक बदलाव है जो 2012 और 2026 के बीच सबसे अधिक दिखाई देता है। आज की तैयारी केवल वीआईपी के होटल और कार्यक्रम स्थल तक सीमित नहीं है। पूरी सुरक्षा श्रृंखला को एयरपोर्ट, होटल, सड़क, यातायात, तकनीकी निगरानी और आपात प्रतिक्रिया के साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है।


Representative Image

बेशक, आज की व्यवस्था भी आलोचना से मुक्त नहीं है। दिल्ली में इस समय भारी ट्रैफिक प्रतिबंध हैं। कई मार्ग बदले गए हैं। आम नागरिकों, डिलीवरी कर्मचारियों, ऑटो चालकों और दूसरे कामगारों को असुविधा हो रही है। राजधानी के कई निवासियों की नाराजगी दर्ज की गई है। एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन के नाम पर नागरिकों की परेशानी को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।


लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है। सुरक्षा के लिए लगाया गया प्रतिबंध प्रशासनिक विफलता नहीं है। यदि किसी मार्ग को विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की सुरक्षा के लिए कुछ समय के लिए बंद किया जाता है और पहले से वैकल्पिक मार्ग, पुलिस तैनाती तथा सार्वजनिक सूचना की व्यवस्था की जाती है, तो वह एक प्रशासनिक निर्णय है। इसके विपरीत यदि सुरक्षा घेरे के बीच जिंदा कारतूस मिलें, संचार नेटवर्क बंद हो जाए, मेट्रो घंटों बाधित हो और हाई सिक्योरिटी इलाके में चोरी हो जाए, तो वह तैयारी की कमजोरी का संकेत बनता है।


Representative Image

भारत 2026 में अपने वैश्विक कद को केवल भाषणों से नहीं, बल्कि अपनी प्रशासनिक क्षमता से भी प्रदर्शित कर रहा है। 2023 का G20 अनुभव इस बदलाव की पृष्ठभूमि में है। उस आयोजन ने भारत को एक विशाल अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए सुरक्षा, कूटनीति, शहरी प्रबंधन और लॉजिस्टिक्स को एक साथ संचालित करने का अनुभव दिया। 2026 का BRICS उसी संस्थागत आत्मविश्वास की अगली परीक्षा है।


2012 में भारत एक उभरती हुई शक्ति था जो दुनिया को यह बताना चाहता था कि वह वैश्विक नेतृत्व के लिए तैयार है। 2026 में भारत का आत्मविश्वास अलग है। अब वह केवल यह दावा नहीं कर रहा कि वह बड़ी बैठकों में भाग लेने वाला देश है। वह यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह ऐसी बैठकों की मेजबानी भी उसी स्तर की तैयारी और पेशेवर क्षमता के साथ कर सकता है।


कांग्रेस नेतृत्व वाली UPA सरकार की आलोचना इसी बिंदु पर सबसे अधिक प्रासंगिक हो जाती है। यह कहना पर्याप्त नहीं कि उस समय भी भारत के पास सक्षम अधिकारी और संस्थाएं थीं। प्रश्न यह है कि राजनीतिक नेतृत्व ने उन संस्थाओं से किस स्तर की तैयारी और जवाबदेही की अपेक्षा की। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की प्रतिष्ठा को केवल कूटनीतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाली प्रशासनिक दक्षता से भी मापा जाता है।


Representative Image

2012 में दुनिया ने एक ऐसा भारत देखा था जो बड़े वैश्विक आयोजन की मेजबानी तो कर रहा था, लेकिन उसकी व्यवस्था कई स्तरों पर दबाव में टूटती दिखाई दी। 2026 में दुनिया एक अलग भारत देख रही है। एक ऐसा भारत जो अपनी सुरक्षा व्यवस्था को पहले से परतदार बना रहा है, राज्यों और एजेंसियों के बीच समन्वय कर रहा है, मॉक ड्रिल कर रहा है, तकनीकी निगरानी बढ़ा रहा है और बड़े आयोजन को एक संपूर्ण ऑपरेशनल मिशन की तरह देख रहा है।


यह अंतर केवल सरकार बदलने का अंतर नहीं है। यह शासन की सोच में बदलाव का अंतर है। राष्ट्रीय गौरव केवल इस बात से पैदा नहीं होता कि दुनिया के नेता भारत आए और प्रधानमंत्री के साथ तस्वीर खिंचवाकर लौट गए। असली गौरव तब पैदा होता है जब एयरपोर्ट सुरक्षित हो, पुलिस का संचार तंत्र काम करे, सार्वजनिक व्यवस्था नियंत्रित रहे, आपातकालीन योजनाएं तैयार हों और दुनिया को यह भरोसा मिले कि भारत जब जिम्मेदारी लेता है तो उसे निभाना भी जानता है।


2012 का BRICS सम्मेलन कांग्रेस शासन की उस कमजोरी का उदाहरण बन गया जिसमें वैश्विक महत्वाकांक्षा और जमीनी प्रशासनिक क्षमता के बीच दूरी दिखाई दी। 2026 का BRICS सम्मेलन उस दूरी को पाटते हुए एक नए भारत की तस्वीर पेश कर रहा है। एक ऐसा भारत जो अब केवल दुनिया की निगाहों में आने से संतुष्ट नहीं है, बल्कि दुनिया की निगाहों के सामने अपने प्रशासनिक कौशल का प्रदर्शन भी करना चाहता है। और यही बदलाव आज के भारत के आत्मविश्वास का सबसे ठोस आधार है।