
बस्तर में माओवादी हिंसा समाप्त हो चुकी है और यह स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी घटना है। हज़ारों की संख्या में माओवादी आत्मसमर्पण कर चुके हैं, और अब उनके हथियार बरामद हो रहे हैं, साथ ही सुरक्षा बल उन क्षेत्रों तक पहुंच बना रहे हैं जिन्हें कभी नक्सलियों का गढ़ माना जाता था।
लेकिन इसी समय कांग्रेस ने बस्तर में एक नए राजनीतिक अभियान की तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस जल, जंगल, जमीन, विस्थापन, खनिज संसाधन, ग्रामसभा और जनजातीय अधिकारों को केंद्र में रखकर आंदोलन खड़ा करने की घोषणा की जा रही है और राहुल गांधी को इस अभियान से जोड़ने की तैयारी है।
यह कहना गलत होगा कि कांग्रेस और माओवादी एक ही संगठन हैं, दोनों की कार्यप्रणाली और राजनीतिक वैधता एक जैसी नहीं है। लेकिन पिछले कुछ समय से देखें तो कांग्रेस की राजनीति वामपंथी धुरी पर ही टिकी हुई है। इसीलिए अब सवाल इन दोनों के बीच संगठनात्मक समानता का नहीं है, बल्कि सवाल है नैरेटिव का, भाषा का और समाज को राजनीतिक रूप से देखने के तरीके का। सवाल यही उठ रहा है कि क्या कांग्रेस अब बस्तर की राजनीति को माओवादी नज़रिए से देख रही है?

माओवादियों की हिंसा का एक केंद्रीय तत्व रहा है कि स्थानीय असंतोष को व्यापक सत्ता विरोधी संघर्ष में बदला जाए। माओवादी बीते चार दशकों से बस्तर में शासन व्यवस्था के विरुद्ध असंतोष पैदा करने, स्थानीय लोगों को लामबंद करने और विस्थापन, कॉरपोरेट शोषण तथा सुरक्षा बलों से जुड़े आरोपों को बढ़ाने में लगे हुए थे। इसके लिए माओवादियों ने "जल-जंगल-जमीन" के नारे का उपयोग किया और स्थानीय जनता को इसके नाम पर भड़काए रखा।
अब बस्तर में कांग्रेस की रणनीति को देखिए। कांग्रेस भी जल, जंगल, जमीन को लेकर आंदोलन शुरू करना चाहती है। खनिज संसाधनों और खदान आवंटन को मुद्दा बनाया जा रहा है। विस्थापन और पुनर्वास को राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाया जा रहा है। ग्रामसभा और वनाधिकार की चर्चा को व्यापक राजनीतिक संघर्ष में बदलने की तैयारी है। कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व की योजना चरणबद्ध आंदोलन की है और राहुल गांधी के संभावित बस्तर दौरे को भी इसी अभियान से जोड़ा जा रहा है।

यहां असली सवाल यह नहीं है कि जल, जंगल और जमीन महत्वपूर्ण हैं या नहीं। जनजातीय अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। वनाधिकार कानून लागू होना चाहिए। उचित पुनर्वास होना चाहिए। स्थानीय लोगों को विकास में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।
सवाल यह है कि इन मुद्दों का राजनीतिक इस्तेमाल किस दिशा में किया जा रहा है। क्या इन सवालों को लोकतांत्रिक संस्थाओं, कानून, प्रशासन और विकास की प्रक्रिया के भीतर समाधान की दिशा में ले जाया जा रहा है या फिर इन्हें लगातार एक स्थायी संघर्ष के रूप में पेश किया जा रहा है? यही अंतर महत्वपूर्ण है।
देखने पर यह प्रतीत होता है कि माओवादियों ने जो किया, कांग्रेस उसका राजनीतिक संस्करण तो नहीं बना रही? माओवादियों ने बस्तर को केवल सुरक्षा बलों और हथियारों की लड़ाई नहीं बनाया था। उन्होंने एक वैचारिक ढांचा खड़ा किया। उस ढांचे में एक तरफ कथित शोषित जनता थी और दूसरी तरफ राज्य, प्रशासन, सुरक्षा बल, उद्योग और व्यवस्था। यही मूलतः वर्ग संघर्ष की राजनीति का ढांचा है।

कम्युनिस्ट राजनीति का पुराना फार्मूला यही रहा है कि समाज में विरोधी वर्गों की पहचान की जाए, उनके बीच मौजूद वास्तविक या कथित असमानताओं को राजनीतिक संघर्ष का आधार बनाया जाए और उस संघर्ष को सत्ता परिवर्तन की दिशा में ले जाया जाए। माओवादियों ने भारत में इसी संघर्ष को सशस्त्र रूप दिया।
बस्तर में उसका परिणाम क्या हुआ, यह किसी से छिपा नहीं है। गांवों के लोग मारे गए। पुलिसकर्मी बलिदान गए। जनप्रतिनिधियों की हत्या हुई। सड़कें और स्कूल निशाना बने। विकास का ढांचा बाधित हुआ। जिन जनजातीय लोगों के नाम पर माओवादी लड़ाई लड़ने का दावा करते रहे, वही लोग सबसे ज्यादा हिंसा के शिकार हुए। गृह मंत्रालय के अनुसार 2004 से 31 मार्च 2025 के बीच वामपंथी-माओवादियों ने देश के विभिन्न हिस्सों में लगभग 8,895 लोगों की हत्या की और इनमें बड़ी संख्या में जनजातीय लोग शामिल थे।

2013 का झीरम हमला माओवादी आतंक का एक बड़ा उदाहरण है। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर माओवादी हमले में 27 लोगों की हत्या हुई थी, जिनमें 10 पुलिसकर्मी शामिल थे। राष्ट्रीय जांच एजेंसी के रिकॉर्ड में इस हमले का विवरण दर्ज है। इतिहास का यह अध्याय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज उसी बस्तर में कांग्रेस फिर से राजनीतिक जमीन बनाने के लिए उतर रही है। लेकिन अगर राजनीति का आधार लगातार राज्य बनाम समाज, विकास बनाम जमीन, सरकार बनाम अधिकार और संसाधन बनाम कथित कॉरपोरेट कब्जे के रूप में गढ़ा जाएगा, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि कांग्रेस बस्तर को किस दिशा में ले जाना चाहती है।
सशस्त्र नक्सलवाद खत्म हुआ है, तभी आंदोलन की जरूरत क्यों पड़ रही है? बस्तर के मौजूदा हालात में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। बीते दो वर्षों में बड़ी संख्या में माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है। बड़ी संख्या में हथियार और नकदी बरामद हुई। अर्थात जिस समय बस्तर में बंदूक आधारित माओवादी प्रभाव टूट रहा है, उसी समय कांग्रेस जल, जंगल, जमीन के नाम पर एक बड़ा राजनीतिक आंदोलन खड़ा करने की तैयारी कर रही है। यह समय का संयोग हो सकता है। लेकिन राजनीति में संयोगों को सवालों से मुक्त नहीं किया जाता।
अगर खनिज संसाधनों का दोहन ही जल-जंगल-जमीन के विरुद्ध है, तो फिर पिछली कांग्रेस सरकारों ने बस्तर में लौह अयस्क खनन और नगरनार जैसे औद्योगिक प्रोजेक्ट क्यों आगे बढ़ाए? क्या तब कांग्रेस को जनजातीय अधिकारों और पर्यावरण की चिंता नहीं थी?

माओवादियों ने बस्तर में वर्ग-संघर्ष की बंदूक उठाई थी। कांग्रेस अब उसी संघर्ष की राजनीति को आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। शहरों में वामपंथी नैरेटिव और बस्तर में माओवादी नैरेटिव, क्या कांग्रेस की नई राजनीति का यही दोहरा मॉडल है?
कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि उसका लक्ष्य क्या है। क्या वह बस्तर को विकास की मुख्यधारा में ले जाने के लिए राजनीतिक अभियान चला रही है या वह उन पुराने सामाजिक विभाजनों को फिर से राजनीतिक ऊर्जा देना चाहती है जिन्हें माओवादी अपनी हिंसा को सही ठहराने के लिए दशकों तक इस्तेमाल करते रहे?

राहुल गांधी का ‘जल, जंगल, जमीन’ नैरेटिव यह भी कोई नया प्रयोग नहीं है। जून 2026 में राहुल गांधी ने आदिवासी प्रोफेशनल्स कॉन्क्लेव में भाजपा और आरएसएस पर जनजातीय समुदायों के जल, जंगल और जमीन के अधिकार छीनने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस इन अधिकारों की रक्षा के लिए हर लड़ाई लड़ने को तैयार है। कांग्रेस ने खुद राहुल गांधी के इस बयान को अपने आधिकारिक मंच पर प्रकाशित किया है।
2024 में बस्तर की चुनावी सभा में भी राहुल गांधी ने जनजातीय समुदायों के संसाधनों पर उनके अधिकार की बात करते हुए जल, जंगल और जमीन को कांग्रेस के राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया था।
इसलिए 2026 का बस्तर अभियान अचानक पैदा हुआ कोई स्थानीय आंदोलन नहीं है। यह राहुल गांधी और कांग्रेस के उस व्यापक "कम्युनिस्ट" राजनीतिक नैरेटिव का विस्तार है जिसमें जनजातीय समाज और सत्ता के बीच अधिकारों के संघर्ष को केंद्रीय स्थान दिया जा रहा है। यहीं ‘दिमागी नक्सल’ शब्द की प्रासंगिकता सामने आती है।

दिमागी नक्सल का अर्थ यह नहीं है कि सरकार की आलोचना करने वाला हर व्यक्ति नक्सली है। असली सवाल यह है कि क्या कोई राजनीतिक शक्ति माओवादी विचारधारा के उस नैरेटिव ढांचे को लोकतांत्रिक भाषा में आगे बढ़ा रही है जिसमें हर समस्या का समाधान संघर्ष, टकराव और राज्य विरोधी लामबंदी में खोजा जाता है? अगर ऐसा है, तो समस्या बंदूक की नहीं है। समस्या विचार की है।
माओवादी कहते थे कि व्यवस्था शोषणकारी है, इसलिए उसे खत्म करना होगा। कांग्रेस कहती है कि सरकार जनजातीय अधिकार छीन रही है, इसलिए उसके खिलाफ आंदोलन करना होगा। माओवादी जमीन, जंगल और संसाधनों को अपने संघर्ष का आधार बनाते थे। कांग्रेस आज उन्हीं विषयों को बस्तर के बड़े राजनीतिक आंदोलन का आधार बना रही है। माओवादी राज्य और उसके संस्थानों के प्रति अविश्वास पैदा करना चाहते थे। कांग्रेस लोकतांत्रिक राजनीति में रहते हुए राज्य सरकार और केंद्र सरकार के खिलाफ उसी अविश्वास को राजनीतिक पूंजी में बदलना चाहती दिखाई देती है।

बस्तर में वनाधिकार और संसाधनों से जुड़े कुछ सवाल ज़रूर हैं। लेकिन यही वह जगह है जहां कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करना जरूरी है। किसी अधिकार की लड़ाई को समाधान तक ले जाना राजनीति है। उसी अधिकार की लड़ाई को लगातार सरकार विरोधी संघर्ष में बदलते रहना अलग तरह की राजनीति है।
कांग्रेस यदि कहती है कि उसे जनजातीय अधिकारों की चिंता है, तो सवाल यह होना चाहिए कि वह अधिकारों को संस्थागत तरीके से मजबूत करने की बात कितनी करती है और संघर्ष की राजनीति को कितना बढ़ाती है। क्योंकि बस्तर को अब संघर्ष की राजनीति की नहीं, संघर्ष से बाहर निकलने की राजनीति की जरूरत है।
दशकों तक माओवादी हिंसा ने बस्तर को मुख्यधारा से काटा। अब जब सड़कें पहुंच रही हैं, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हो रही है, प्रशासनिक उपस्थिति बढ़ रही है और बड़ी संख्या में माओवादी आत्मसमर्पण कर चुके हैं, तब बस्तर की नई कहानी रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, स्थानीय उद्यम और सुरक्षित भविष्य की होनी चाहिए।

लेकिन यदि कांग्रेस जैसे राजनीतिक दल फिर से बस्तर की पहचान केवल संघर्ष, शोषण, विस्थापन और सत्ता विरोधी आंदोलन के माध्यम से तय करने लगेंगे, तो यह उस मानसिक ढांचे को जीवित रखने जैसा होगा जिसने इस क्षेत्र को वर्षों तक हिंसा में फंसाए रखा। यह पूछ अब आवश्यक हो चुका है कि कांग्रेस को बस्तर चाहिए या बस्तर का असंतोष? क्योंकि यही आज का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न है।
सच्चाई यही है कि बस्तर को अब ‘वर्ग संघर्ष’ से मुक्ति चाहिए। बस्तर ने माओवाद की कीमत चुकाई है। उसने अपने जवान खोए हैं। अपने जनप्रतिनिधि खोए हैं। अपने ग्रामीण खोए हैं। विकास के कई दशक खोए हैं। अब बस्तर को किसी नए संघर्ष की प्रयोगशाला बनाना सबसे बड़ी राजनीतिक भूल होगी।
माओवादियों ने बंदूक से वर्ग संघर्ष थोपने की कोशिश की। कांग्रेस अगर उसी समाज को राजनीतिक वर्ग संघर्ष के स्थायी नैरेटिव में ढालने की कोशिश करती है, तो यह बस्तर के साथ न्याय नहीं होगा।
जनजातीय अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। जमीन के अधिकार सुरक्षित होने चाहिए। वनाधिकार लागू होने चाहिए। विस्थापन की समस्या का समाधान होना चाहिए। खनिज संपदा में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। लेकिन इन सबका रास्ता लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने से निकलेगा, समाज को संघर्ष की स्थायी मानसिकता में धकेलने से नहीं।

इसलिए आज बस्तर के सामने सिर्फ यह सवाल नहीं है कि नक्सली कितने बचे हैं। इससे बड़ा सवाल है कि नक्सलवाद के जाने के बाद उसकी जगह कौन सा विचार आएगा। अगर जवाब विकास, सुरक्षा, अधिकार, रोजगार और लोकतांत्रिक सहभागिता है, तो बस्तर का भविष्य सुरक्षित है। लेकिन अगर जवाब फिर से हम बनाम वे, शोषित बनाम शोषक, जनजातीय बनाम राज्य और संघर्ष बनाम व्यवस्था है, तो बंदूक भले खामोश हो गई हो, नक्सली नैरेटिव अभी जिंदा है। और यही वह राजनीति है जिसे ‘दिमागी नक्सल’ की रणनीति कहा जा सकता है।
बस्तर को नक्सलवाद की बंदूक से मुक्ति मिल चुकी है। अब उसे नक्सलवाद के नैरेटिव से भी मुक्त होना होगा। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या कांग्रेस इस मुक्ति की राजनीति करेगी, या नक्सलवाद के बाद खाली हुई वैचारिक जगह को अपने "दिमागी नक्सल" वाले राजनीतिक नैरेटिव से भरने की कोशिश करेगी? यही सवाल आज कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए, और इसका जवाब बस्तर के भविष्य का रास्ता तय करेगा।