
मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति ने बंदूक छोड़ दी है, लेकिन क्या उसने माओवाद भी छोड़ दिया है? गढ़चिरौली की गोंडवाना यूनिवर्सिटी के एक फैसले के बाद यह प्रश्न अब सामने आ रहा है। ख़बर यह है कि एक समय प्रतिबंधित आतंकी संगठन सीपीआई (माओवादी) के पोलित ब्यूरो और केंद्रीय समिति का सदस्य रहा, छह करोड़ रुपये के इनाम वाला और महाराष्ट्र तथा छत्तीसगढ़ की सीमा पर माओवादी आतंक का प्रभावशाली रणनीतिकार माना जाने वाला भूपति अब उसी क्षेत्र में जनजातीय ग्रामीणों और ग्रामसभाओं को उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की जानकारी देगा।
गोंडवाना विश्वविद्यालय के ‘एकल’ कार्यक्रम में भूपति को तीन महीने के अनुबंध पर समन्वयक नियुक्त किया गया है और उसे हर महीने 30 हजार रुपये मानदेय मिलेगा। उसकी जिम्मेदारियों में पेसा और वनाधिकार से जुड़े अधिकारों की जानकारी देना, वन अधिकार दावों के दस्तावेज तैयार कराने में सहायता करना, ग्रामसभाओं और प्रशासन के बीच समन्वय करना तथा सरकारी योजनाओं की निगरानी जैसे काम शामिल हैं।
लेकिन आत्मसमर्पण के बाद मुख्यधारा में वापसी की यह कहानी सुनने में जितनी अच्छी लगती है, उसके भीतर छिपा सवाल उतना ही असहज करने वाला है। क्योंकि यह किसी सामान्य पूर्व नक्सली को सामान्य नौकरी देने का मामला नहीं है। यह उस व्यक्ति को एक ऐसे संवेदनशील सामाजिक और प्रशासनिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका देने का मामला है, जहां उसकी पुरानी विचारधारा और उसके पुराने अनुभव दोनों प्रभाव पैदा कर सकते हैं।
बात यही है कि माओवादियों के आत्मसमर्पण का स्वागत किया जा सकता है, हमने भी इसे व्यापक रूप से प्रोत्साहित किया। यह भी ठीक है कि हिंसा छोड़ने वाले व्यक्ति को समाज में वापस आने का अवसर मिलना चाहिए। और देखा जाए तो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की यही ताकत है कि वह बंदूक छोड़ चुके व्यक्ति को सामान्य जीवन का रास्ता देती है। लेकिन आत्मसमर्पण और वैचारिक परिवर्तन एक ही विषय नहीं हैं।

बंदूक छोड़ना एक व्यवहारिक निर्णय हो सकता है, लेकिन विचारधारा छोड़ना उससे बिल्कुल अलग प्रक्रिया है। और जब बात उस व्यक्ति की हो जो दशकों तक माओवादी आतंकी संगठन के शीर्ष स्तर पर रहा हो, तो केवल हथियार डाल देने को वैचारिक परिवर्तन का प्रमाण मान लेना केवल सतही सोच होगी।
पूर्व माओवादी भूपति कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो कभी किसी जंगल में नक्सलियों के साथ कुछ समय के लिए जुड़ गया हो। वह प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) के पोलित ब्यूरो और केंद्रीय समिति का सदस्य था। 2025 में उसके आत्मसमर्पण के समय उसे नक्सल संगठन के सबसे प्रमुख लोगों में था और महाराष्ट्र तथा छत्तीसगढ़ की सीमा पर उसके लंबे समय तक सक्रिय रहने की बात सामने आई थी। उसके सिर पर छह करोड़ रुपये का इनाम था। उसने 14 अक्टूबर 2025 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सामने 60 अन्य माओवादियों के साथ आत्मसमर्पण किया था। उनके पास से 54 हथियार भी जमा किए गए थे, जिनमें सात AK-47 और नौ INSAS राइफलें शामिल थीं।
_202609081022248502_H@@IGHT_268_W@@IDTH_480.jpeg)
इस व्यक्ति की माओवादी आतंकी संगठन में जगह समझने के लिए इन तथ्यों को भूलना संभव नहीं है। क्योंकि आज उसकी सबसे बड़ी योग्यता के रूप में जिस "जमीनी अनुभव" और क्षेत्र की समझ का उल्लेख किया जा रहा है, वह अनुभव उसे किसी विश्वविद्यालय की कक्षा या प्रशासनिक प्रशिक्षण से नहीं मिला। वह अनुभव उसे माओवादी आतंकी गतिविधियों के रूप में दशकों तक काम करने से मिला। वही आतंकी संगठन जो भारतीय राज्य की वैधता को चुनौती देता था, वही नेटवर्क जिसने ग्रामीण इलाकों में समानांतर सत्ता और नियंत्रण स्थापित किया, वही समूह जिसकी रणनीति सशस्त्र युद्ध पर आधारित थी, उसी का प्रमुख व्यक्ति आज ग्रामीणों और प्रशासन के बीच समन्वयक बन रहा है। यहीं से समस्या शुरू होती है।
माओवाद को केवल बंदूक के रूप में देखना उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत को न समझना है। नक्सलवाद/माओवादी के लिए बंदूक केवल उसका हथियार थी, लेकिन विचारधारा उसका आधार है। भारत सरकार के Bureau of Police Research and Development के एक प्रकाशन में सीपीआई (माओवादी) को देश में हिंसा और नागरिकों तथा सुरक्षा बलों की हत्या के लिए प्रमुख वामपंथी उग्रवादी संगठन बताया गया है और कहा गया है कि लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार को सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से उखाड़ फेंकने की उसकी विचारधारा भारतीय संविधान के लिए अस्वीकार्य है।

सीपीआई (माओवादी) के अपने दस्तावेजों में भी उसका वैचारिक आधार मार्क्सवाद, लेनिनवाद और माओवाद बताया गया है, तथा सत्ता हासिल करने के लिए "Protracted People's War" यानी लंबे समय तक चलने वाले सशस्त्र जनयुद्ध की रणनीति का वर्णन मिलता है। उस दस्तावेज में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों को घेरते हुए अंततः सत्ता पर कब्जा करने की रणनीति का उल्लेख है।
इसलिए माओवाद को केवल "गरीबों और जनजातीय लोगों के अधिकारों की लड़ाई" के रूप में प्रस्तुत करना उसके राजनीतिक चरित्र को जानबूझकर छोटा करना है। जनजातीय क्षेत्रों की वास्तविक समस्याएं हो सकती हैं। भूमि, जंगल, विस्थापन, प्रशासनिक उपेक्षा और विकास से जुड़ी शिकायतें भी वास्तविक हो सकती हैं। लेकिन इन शिकायतों की मौजूदगी किसी हिंसक विचारधारा को वैध नहीं बना देती। माओवादी आतंक ने इन्हीं वास्तविक समस्याओं को अपने राजनीतिक और सशस्त्र संघर्ष के लिए इस्तेमाल किया।

और यही कारण है कि भूपति को पेसा और वनाधिकार कानून के काम से जोड़ना सामान्य नियुक्ति नहीं है। यह बहुत संवेदनशील क्षेत्र है। पेसा ग्रामसभाओं को अनुसूचित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण अधिकार देता है। वनाधिकार कानून वन पर निर्भर समुदायों के अधिकारों को कानूनी मान्यता देता है। इन अधिकारों को लागू करना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है। लेकिन जिस व्यक्ति को इन अधिकारों के बारे में ग्रामीणों को समझाने और उनके दावों को प्रशासन तक पहुंचाने का अधिकार दिया जा रहा है, उसके अपने वैचारिक विचारों पर स्पष्टता होना जरूरी है।
यहां एक बहुत सीधा सवाल है। क्या भूपति ने सार्वजनिक रूप से माओवादी विचारधारा को त्याग दिया है? अगर हां, तो उसकी स्पष्ट घोषणा कहां है? अगर उसने यह कहा है कि वो माओवादी विचारधारा को पूरी तरह अस्वीकार करता है, तो यह महत्वपूर्ण जानकारी जनता के सामने होनी चाहिए। लेकिन यदि वह अब भी माओवादी विचारधारा के कुछ हिस्सों को सही या अच्छा मानता है, तो उसके लिए यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि उसे जनजातीय समाज के बीच संवैधानिक अधिकारों की व्याख्या करने वाली भूमिका क्यों दी गई?
कोई पूर्व माओवादी आत्मसमर्पण के बाद खेती करे, व्यवसाय करे, कौशल आधारित काम करे, किसी निजी संस्था में नौकरी करे या पुनर्वास योजना का लाभ ले, यह अलग विषय है। लेकिन उसी व्यक्ति को ग्रामसभाओं, जनजातीय अधिकारों, वन अधिकार दावों और प्रशासन के बीच संस्थागत समन्वयक बनाना अलग स्तर की जिम्मेदारी है।
क्योंकि यहां व्यक्ति को केवल वेतन नहीं दिया जा रहा। उसे पहुंच दी जा रही है। लोगों तक सीधी पहुंच। ग्रामसभाओं तक सीधी पहुंच। प्रशासनिक प्रक्रियाओं तक सीधी पहुंच। और यही वह चीज है जिसे किसी भी संवेदनशील क्षेत्र में हल्के में नहीं लिया जा सकता। सबसे बड़ा जोखिम यह नहीं है कि भूपति कोई काम गलत करवा देगा, बल्कि सबसे बड़ा जोखिम यह है कि किसी पुराने वैचारिक नेटवर्क से निकला व्यक्ति वैध संस्थागत भूमिका के माध्यम से अपने प्रभाव को नए रूप में इस्तेमाल कर सकता है।
_202609081024373975_H@@IGHT_175_W@@IDTH_320.jpeg)
माओवादी आतंक के इतिहास को देखें तो उसने केवल हथियारों से प्रभाव नहीं बनाया था। उसने नैरेटिव से भी बनाया था। उसने ही राज्य को शोषक बताया। उसने ही लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता पर सवाल खड़े किए। उसने ही जनजातीय क्षेत्रों में असंतोष को अपने राजनीतिक संघर्ष का आधार बनाया। उसने कई क्षेत्रों में समानांतर सत्ता संरचनाएं खड़ी करने की कोशिश की। इसलिए आज जब राज्य उन्हीं क्षेत्रों में अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत कर रहा है, तब किसी पूर्व शीर्ष माओवादी की भूमिका को लेकर अतिरिक्त सावधानी होनी चाहिए।
और यही सवाल उन हजारों परिवारों के प्रति भी है जिन्होंने माओवादी हिंसा की कीमत चुकाई। उन सुरक्षा बलों के परिवारों के प्रति जिन्होंने जंगलों में अपनी जान गंवाई। उन ग्रामीणों के प्रति जिन्हें पुलिस का मुखबिर बताकर मारा गया। उन लोगों के प्रति जिनके गांवों में माओवादी प्रभाव का अर्थ डर था। उन युवाओं के प्रति जिन्हें बंदूक उठाने के लिए इस्तेमाल किया गया। उनके लिए यह देखना आसान नहीं होगा कि कभी उसी आतंक का शीर्ष चेहरा आज संवैधानिक अधिकारों का मार्गदर्शक बनकर प्रस्तुत किया जा रहा है।

यहां भावनात्मक प्रतीकों से ज्यादा संस्थागत सावधानी की जरूरत है। अगर आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी को संविधान की प्रति देकर मुख्यधारा में लाया गया था, तो अब अगला सवाल यह होना चाहिए कि क्या उसने वास्तव में उस संविधान को स्वीकार भी किया है।
अक्टूबर 2025 में भूपति के आत्मसमर्पण के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सरेंडर माओवादियों को भारतीय संविधान की प्रतियां देकर मुख्यधारा में स्वागत किया था। उस समय इसे नक्सलवाद के खिलाफ संघर्ष में एक नए दौर की शुरुआत के रूप में प्रस्तुत किया गया था। लेकिन संविधान की किताब हाथ में पकड़ लेना और संविधान की लोकतांत्रिक भावना को स्वीकार करना दो अलग बातें हैं। यही फर्क आज देखना होगा।
यदि भूपति कहता है कि वह लोकतांत्रिक भारत में विश्वास करता है, माओवाद को अस्वीकार करता है, सशस्त्र युद्ध को गलत मानता है और अब पूरी तरह संवैधानिक व्यवस्था के भीतर काम करेगा, तो यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है। लेकिन अगर वह अभी भी उस विचारधारा को सही मानता है जिसने बंदूक को सत्ता हासिल करने का माध्यम माना, तो उसे जनजातीय अधिकारों के नाम पर संस्थागत अधिकार देना एक गंभीर प्रश्न बन जाता है।

यहां सबसे खतरनाक बात यह होगी कि पुनर्वास के नाम पर आतंक, हिंसा और नरसंहारों को भुला दिया जाए। भूपति का अतीत उसकी जिंदगी का कोई छोटा हिस्सा नहीं है। वह उसी माओवादी आतंकी संगठन का शीर्ष नेता था, जिसकी आतंकी गतिविधियों ने महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती क्षेत्रों को लंबे समय तक आतंकित किया। उसके आत्मसमर्पण को पुलिस और सुरक्षा बलों ने माओवादी संगठन के लिए बड़ा झटका माना था।
तो जिस व्यक्ति का आत्मसमर्पण माओवादी संगठन के लिए बड़ा झटका था, उसी व्यक्ति को अब उसी क्षेत्र में सामाजिक और प्रशासनिक प्रभाव वाली भूमिका मिल रही है, यह अपने आप में सवाल पैदा करता है। और यहीं गोंडवाना विश्वविद्यालय का फैसला चिंता पैदा करता है।
क्योंकि आज भारत के सामने माओवादी हिंसा के बाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हमने केवल बंदूक को हराया है या विचारधारा को भी? जंगल में बंदूकें शांत हो जाना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है, लेकिन यदि वही विचार किसी नए रूप में सामाजिक संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, अधिकार आंदोलनों और स्थानीय असंतोष के बीच फिर से जगह बनाने लगे, तो समस्या का चरित्र बदल जाएगा, उसका अंत नहीं होगा।
इसलिए भूपति के मामले में असली हेडलाइन यह नहीं होनी चाहिए कि "पूर्व नक्सली अब जनजाति अधिकारों के लिए काम करेगा।" असली सवाल यह है कि क्या बंदूक छोड़ चुका एक पूर्व माओवादी अब सचमुच संविधान के पक्ष में खड़ा है, या राज्य ने बिना पर्याप्त वैचारिक परीक्षा के उसी पुराने वैचारिक प्रभाव को एक नया संस्थागत दरवाजा खोल दिया है?
इस सवाल का जवाब भूपति को देना चाहिए। विश्वविद्यालय को देना चाहिए। पुलिस को देना चाहिए। और उस जवाब को जनता के सामने आना चाहिए। क्योंकि पुनर्वास का अर्थ यह नहीं है कि अतीत के आतंक को भुला दिया जाए। और मुख्यधारा में लौटने का अर्थ यह भी नहीं है कि पुराने विचारों को बिना जांचे देश के प्रमुख संस्थानों में प्रवेश दे दिया जाए। बंदूक छोड़ना शुरुआत है। विचारधारा छोड़ना ही अंतिम लक्ष्य है। और भूपति के मामले में यही परीक्षा अभी बाकी दिखाई देती है।