अमेरिका और कम्युनिज्म - भाग (१) - मैकेर्थे

अमेरिका से इतर मैकेर्थे एवं उनके अपने देश मे पैर पसारे बैठे कम्युनिस्ट तंत्र से उनके इस संघर्ष जैसी घटनाओं के विश्व मे सैकड़ो उदाहरण हैं जो लोकतांत्रिक राष्ट्रों में कम्युनिस्टों की घुसपैठ पर प्रश्न उठाने को लेकर राजनीतिक हत्याओं के शिकार हो चुके हैं

The Narrative World    28-Oct-2022
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american communism 
 
विश्व भर में जब भी कम्युनिज्म अथवा वामपंथी विचारधारा की बात होती है तो इसे सामान्यतः मार्क्स, स्टालिन, माओ अथवा लेनिन की जीवनी एवं इनके द्वारा ही विकसित किये गए कम्युनिज्म की विस्तृत शाखाओं तक समेट दिया जाता है, अधिक से अधिक ज्यादा गहराई में उतरने पर रूस एवं चीन के अतिरिक्त कंबोडिया, वियतनाम, इंडोनेशिया जैसे राष्ट्रों में हुए नरसंहारों के अतिरिक्त हमें कम्युनिज्म को जानने समझने के लिए बहुत कुछ नहीं मिलता, तो क्या कम्युनिस्ट विचारों का प्रसार केवल इतना सा ही है यह फिर इसके दूसरे स्वरूप भी हैं जो उदारवादी विचारों का चोला ओढ़कर दुनिया के कई लोकतांत्रिक राष्ट्रों को भीतर से खोखला करने पर आमादा हैं? क्या आधुनिक राष्ट्र की अवधारणा विकसित होने के उपरांत के राष्ट्रों में सबसे पुराना लोकतंत्र माने जाने वाला अमेरिका भी कभी इसकी जद में रहा है यदि हाँ तो फिर वर्तमान परिदृश्य में वह कितना प्रभावी है, आलेखों की इस श्रृंखला के माध्यम से हम इन्ही प्रश्नों के उत्तर ढूंढने का प्रयास कर रहे हैं।
तो बात वर्ष 1948 की है जब दुनिया की दो महाशक्तियां शीत युद्ध में एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने के लिए खूब जोर आजमाइश कर रही थी, उस काल में अमेरिका एवं सोवियत संघ का यह संघर्ष दोनों राष्ट्रों के लिए सामरिक रुप से महत्वपूर्ण तो था ही वैश्विक स्तर पर भी इसका अपना व्यापक प्रभाव था, जिसने संभवतः विश्व को दो गुटों में विभक्त किया हुआ था।
 
इसी काल में अमेरिका सेना में मेजर के पद पर रहे जोसेफ मैकेर्थे ने इस शीत युद्ध से लगभग एक वर्ष पूर्व ही अपनी राजनीति यात्रा शुरू की थी, यह यात्रा रिपब्लिकन उम्मीदवार मैकेर्थे ने 1946 के सीनेट चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के हॉवर्ड मैक मुरे को हरा कर प्रारंभ की थी, राजनीतिक दृष्टि से सामान्य दिखाई देने वाले इस चुनाव में विजयी उम्मीदवार मैकेर्थे आने वाले वर्षो में अमेरिकी राजनीति की दशा-दिशा परिवर्तित करने का प्रयास करने वाले थे और इसकी शुरुआत उन्होंने फरवरी 1950 में कि जब अब तक राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान गढ़ने से दूर रहे मैकेर्थे ने मीडिया समेत अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में यह दावा कर सनसनी मचा दी कि अमेरिकी प्रशासनिक तंत्र सोवियत संघ के कम्युनिस्ट जासूसों से भरा पड़ा है।
 
9 फरवरी को लिंकन डे के अवसर पर दिए गए अपने उद्बोधन में मैकेर्थे ने दावा किया कि अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट में कई कम्युनिस्ट जासूस कार्य कर रहे हैं जो अंदर से अमेरिकी नीतियों को प्रभावित करने एवं उसके स्थापित लोकतांत्रिक मूल्यों को परिवर्तन करने की दृष्टि से कार्यरत हैं। मैकेर्थे के इस दावे ने जैसे अमेरिकी राजनीति में भूचाल ला दिया और देखते देखते उनके पक्ष (आम जनमानस) और विपक्ष में (सामान्यतः कम्युनिस्ट्स) समर्थन अथवा विरोध करने वालों की सूची वृहद होती चली गई।
 
उस दौर में मजबूत सोवियत संघ, चीन में कम्युनिस्ट विचारों की सफलता समेत सोवियत संघ द्वारा परमाणु परीक्षण जैसे कई प्रत्यक्ष घटनाओं ने अमेरिकी जनमानस के मन में उग्र कम्युनिस्ट विचारों से अपनी लोकतांत्रिक मूल्यों पर खतरे की आशंकाओं को स्वाभाविक तौर पर जन्म दिया था हालांकि जिस बात ने अमेरिकियों को सबसे ज्यादा हैरान किया था वो आंतरिक प्रशासनिक व्यव्यस्था में कम्युनिस्टों की व्यापक घुसपैठ थी, दरअसल इससे पूर्व सामान्यतः अमेरिकी, कम्युनिस्ट विचार को ज्यादातर एक राष्ट्र एवं उसकी साम्राज्यवादी सोच की पहुंच तक सिमित रखते आये थे, उनके अनुसार लोकतांत्रिक व्यवस्था को सिरे से नकारने वाले इन विचारों से खतरा केवल बाह्य तौर पर ही था, इसलिए उनके लिए मैकेर्थे का दावा अप्रत्याशित एवं हैरान करने वाला था।
 
बहरहाल मैकेर्थे अपने दावे के अनुसार अमेरिकी प्रशासनिक तंत्र में कम्युनिस्टों की पड़ताल में लग गए, अपने इस अभियान में उन्होंने अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट, रक्षा प्रतिष्ठानों, विश्वविद्यालयों, हॉलीवुड, प्रतिष्ठित समाचार पत्रों समेत अमेरिकी तंत्र में सक्रिय कई कम्युनिस्टों के वास्तविक स्वरूप को उजागर भी किया जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान सरकार को भी राज्य की व्यव्यस्था को खोखला कर रहे दीमकों पर नकेल कसने के लिए बाध्य होना पड़ा, हालांकि इससे पहले की मैकेर्थे अपने प्रयासों से अमेरिकी तंत्र में मजबूती से पकड़ बनाए बैठे कम्युनिस्ट तंत्र को उखाड़ फेंकने के लिए प्रभावी मैकेनिज्म को स्थापित कर पाते, उदारवादी विचारों का चोला ओढ़े बैठा अमेरिकी कम्युनिस्ट तंत्र उन पर पूरी शक्ति से टूट पड़ने की ताक में लग गया।
 
मैकेर्थे के दावे से तिलमिलाए कम्युनिस्ट तंत्र को उन्हें मिल रहे जनसमर्थन को उनकी छवि धूमिल कर सीमित करने का यह अवसर तब मिला जब मैकेर्थे रक्षा विभाग एवं सैन्य अधिकारियों की कम्युनिस्ट विचारों के प्रति झुकाव की जांच का विषय उठाने का प्रयास कर रहे थे, कम्युनिस्ट तंत्र ने मैकेर्थे पर आक्रमण के लिए कुछ समय पहले उनके द्वारा नामित किए गए डेविड शाइन नामक युवक को आधार बनाकर यह दावा किया कि डेविड के माध्यम से मैकेर्थे सेना के आंतरिक मामलों में दखल देने एवं इसे तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, बस फिर क्या था देखते ही देखते मीडिया, विभिन्न अधिकार समुहों एवं राजनीतिक पार्टियों में उदारवादी चोला ओढ़े नेताओं ने मैकेर्थे के विरुद्ध पूरी शक्ति से मोर्चा खोल दिया।
 

maccarthy 
लगभग एक महीने चले इस दुष्प्रचार का मैकेर्थे ने दृढ़ता से सामना किया और अमेरिकी लोकतंत्र को तबाह करने पर आमादा कम्युनिस्टों के विरुद्ध जनता के बीच अपनी आवाज उठाते रहे, लेकिन व्यक्तिगत क्षमता के बलबूते कम्युनिस्टों से लड़ रहे मैकेर्थे अंततः राजनीतिक अखाड़े में पराजित हो गए और सेना समेत पूरे प्रशासनिक तंत्र में घुसपैठ कर चुके कम्युनिस्टों के दबाव में काँग्रेस को वर्ष 1954 में उनके विरुद्ध निंदा प्रस्ताव पारित करना पड़ा, इस एक घटना से मैकेर्थे की विश्वसनीयता को गंभीर धक्का पहुंचा था और तमाम प्रयासों के उपरांत भी मैकेर्थे इससे कभी उबर नहीं पाए, हालांकि मैकेर्थे की इस हार से सबसे बड़ा नुकसान तो उस मुहिम को हुआ जो अमेरिकाई लोकतंत्र को आंतरिक रूप से कमजोर कर रहे कम्युनिस्टों के विरुद्ध छेड़ी गई थी।
राजनीतिक रूप से अर्श से फर्श तक कि यात्रा कर चुके मैकेर्थे की वर्ष 1957 में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई, हालांकि अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यव्यस्था में सेंध लगाए बैठे कम्युनिस्टों के लिए खतरा बन कर उभरे मैकेर्थे की मौत उनके लिए पर्याप्त नहीं थी इसलिए सुनियोजित रूप से कम्युनिस्टों को लेकर उनके दावों के विरुद्ध खूब दुष्प्रचार किया गया, उन्हें पूर्वाग्रह से ग्रसित एवं प्रमाणों के बिना आक्षेप लगाने वाले व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया परिणामस्वरूप आज अमेरिकी राजनीतिक व्यव्यस्था 'मैकेर्थिसम' को इसी स्वरूप में जानती है।
 
मैकेर्थे की इस राजनीतिक हत्या का प्रभाव आने वाले वर्षो में अमेरिकी राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से प्रतिबिंबित होने वाला था जो कमोबेश अब तक जारी है, हालांकि इसका एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अमेरिका से इतर मैकेर्थे एवं उनके अपने देश मे पैर पसारे बैठे कम्युनिस्ट तंत्र से उनके इस संघर्ष जैसी घटनाओं के विश्व मे सैकड़ो उदाहरण हैं जो लोकतांत्रिक राष्ट्रों में कम्युनिस्टों की घुसपैठ पर प्रश्न उठाने को लेकर राजनीतिक हत्याओं के शिकार हो चुके हैं, दुर्भाग्य से भारत भी इसका अपवाद नहीं।
(तथ्य - साभार राजीव मिश्रा, लेखक - विषैला वामपंथ)