सनातनी होने का अर्थ: समादर और समन्वय

The Narrative World    15-Jan-2023
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भगवान बुद्ध और भगवान महावीर स्वामी दोनों समकालीन थे। एक का प्राकट्य जिस स्थान पर हुआ, दूसरे ने उसी स्थान पर अपना सर्वाधिक प्रचार किया। दार्शनिक स्तर पर मतभिन्नता होते हुए भी दोनों ने एक दूसरे का विरोध नहीं किया।
 
श्री रामानंदाचार्य राम जी की सगुण भक्ति करते थे तो जिन कबीर को उन्होंने अपना शिष्य बनाया वो राम की निर्गुण भक्ति करने वाले थे।
 
असम के संत माधव कंदली ने अपने द्वारा रचित वाल्मीकि रामायण के आधार पर रची रामकथा में पात्रों को दैविक रूप न देकर मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत किया जबकि उन्हीं के शिष्य श्रीमंत शंकर देव कृष्ण के निराकार रूप के प्रचारक निकले।
 
महर्षि दयानंद सरस्वती और रामकृष्ण - विवेकानंद द्वय भी समकालीन थे। साकार और निराकार की अवधारणा पर एकदम विपरीत मत रखने वाले होकर भी वो कभी आपस में गुत्थम गुत्था नहीं हुए।


यहां एक ही घर में नानक और बाबा श्रीचंद अवतरित हुए। सावरकर और गांधी समकालीन होकर भी एक- दूसरे से नहीं उलझे।


वर्ण और जाति व्यवस्था को हिंदू समाज के एक एकजुट होने तक यथारूप में रखने के हामी गुरूजी गोलवलकर और जाति व्यवस्था को समूल नष्ट करने की मंशा रखने वाले बाबा साहेब आंबेडकर ने भी कभी एक दूसरे की आलोचना नहीं की।


मैं जब दयानंद के आर्य समाज मंदिर में हवन करता हूं तो मैं आर्य समाजी रहता हूं, जब किसी वैष्णव जन की संगति में जाता हूं तो वहां वैष्णव हो जाता हूं, जब शिव के मंदिर जाता हूं तो शैव, जब शक्ति की उपासना करता हूं तो शाक्त, जब गुम्फाओं में जाता हूं तो बौद्ध हो जाता हूं।


जब असम के नामघरों में जाता हूं तो कृष्ण के निर्गुण निराकार रूप का आराधक बन जाता हूं, जब कबीर पंथ के मत में जाता हूं तो कबीर पंथी हो जाता हूं, रैदास के मंदिर जाकर रैदासी हो जाता हूं, संघ शाखाओं में जाकर स्वयंसेवक हो जाता हूं तो रामकृष्ण के मठ में जाकर वैसा हिंदू बन जाता हूं जो सेवक है और शाक्त है।


गांधी आश्रम में मैं गांधीवादी हूं और पावापुरी में जैन। बिरसा मुंडा का स्मरण करते हुए मैं वनवासी हूं और गुरुद्वारे में मत्था टेकते समय गुरुओं का सिख।


ऐसा इसलिए है क्योंकि हमें जो विचार विरासत में मिले हैं वो इस रूप में है जहां हरेक एक- दूसरे का सम्मान करता है और जो मध्यस्त हो वो भी सारे विचारों को समाहित करते हुए न्याय देता है।


“रामेश्वर सेतु निर्माण के अवसर पर शिवलिंग स्थापित करने के समय श्री राम जी ने जब कहा 'रामस्य ईश्वर: स: रामेश्वर:' अर्थात् जो राम के ईश्वर हैं वो रामेश्वर हैं तो शिवजी कह उठे 'राम ईश्वरो यस्य सः रामेश्वरः' अर्थात् श्री राम जिसके ईश्वर हैं वो रामेश्वर हैं और जब इसमें ब्रह्मा जी की राय पूछी गई तो उन्होनें फैसला दिया 'रामश्चासौ ईश्वरश्च, रामेश्वरः' अर्थात् 'जो राम है वो ईश्वर हैं और जो ईश्वर हैं वो शंकर हैं'।”


हिंदू होना वास्तव में यही समादार है, यही समन्वय है, अपनी भुजाएं फैलाकर सबको इस वर्तुल में समेट लेना है। जो लोग इस सार को नहीं समझते वो मूर्ख हैं। वर्तमान के जैन और वनवासी विवाद के समाधान की राह भी यही है।