"जो भोलेनाथ का नहीं वो हमारी जात (ST) का नहीं"
इस प्रकार के नारे 'सड़क से संसद' तक संपूर्ण राष्ट्र का जनजाति समुदाय लगा रहा है, जिसमें समस्त भारतवर्ष की भावना उसके साथ जुड़ती जा रही है।
वस्तुतः डीलिस्टिंग के इस अभियान में संविधान के अनुच्छेद 342 में संशोधन वैसा ही किया जाना है, जैसा कि अनुच्छेद 341 में है अर्थात अनुसूचित जनजातियों के मानक में अनुसूचित जातियों की भांति धर्मपरिवर्तित लोगों को बाहर किया जाना है।
धर्मपरिवर्तितों में इस समुदाय से ईसाई एवं मुस्लिम हो चुके लोगों को माना जा रहा है। वह इसलिए क्योंकि उन्हें धर्मांतरण के साथ ही अल्पसंख्यकों का कानूनी स्टेटस और लाभ मिलता है, जबकि वे अनुसूचित जनजातियों में भी लाभ हड़प रहे हैं।
यह दोहरा लाभ कहलाता है।
विभिन्न अध्ययनों में यह भी जानकारी आई है कि इस प्रकार का कानूनी मसौदा, 1970 में डॉ कार्तिक उरांव द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था, जिस पर 348 सांसदों के हस्ताक्षर भी थे, परंतु ईसाई मुख्यमंत्रियों, नेताओं और चर्च के प्रतिनिधियों के दबाव में तत्कालीन सरकार इसे पारित नहीं कर पाई थी, जो एक प्रकार से धर्म के आधार पर जनजातियों के साथ अन्याय ही हुआ।
डॉ. कार्तिक उरांव के अनुसार डीलिस्टिंग नहीं किया जाना, धर्मपरिवर्तन करने वाले लोगों को एसटी की परिभाषा से बाहर नहीं किया जाना, मूल जनजाति के विरुद्ध एक क्रूर अन्याय है, क्योंकि धर्म परिवर्तित 5% ईसाई और मुस्लिम, कुल अनुसूचित जनजातियों का लगभग 60% से अधिक नौकरियां, छात्रवृत्ति एवं अनुदान हड़प रहे।
डीलिस्टिंग के संबंध में सबसे कीमती मानक है विशेष संस्कृति। यदि किसी ने विशेष संस्कृति जो जनजातियों की है, छोड़ दिया तो वह अपनी पहचान खो चुका होता है। इसे पूजा पद्धति से ही संस्कृति कहा जाता है, क्योंकि आस्था ही धर्म और संस्कृति का आधार है।
यह भी उल्लेखनीय है कि इन जातियों को जो संविधानिक आरक्षण मिला है वह आदि मत, आदि विश्वास जिसे सनातन धर्म पद्धति कहा जाता है, के आधार पर मिला है, अन्यथा वे अल्पसंख्यक वर्ग में होते।
इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा केरल राज्य बनाम चंद्रमोहन के वाद में महत्वपूर्ण निर्णय दिया है जिसका संक्षिप्त सार निम्नानुसार दिया गया है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की वीएन खरे सीजे, एसबी सिन्हा एवं एसएच कपाड़िया की खंडपीठ ने अपने अवलोकन में पाया कि "आर्टिकल 342 के अनुसार अनुसूचित जनजातियों को आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए, जहां से वे पीड़ित हैं, संरक्षण प्रदान करने के प्रयोजन के लिए अधिकार प्रदान करना है। यहां जहां वे हैं पद का आशय जिस रीति रिवाजों, परम्पराओं, आदि विश्वास और आस्थामय संस्कृति, जिसे सनातन धर्म कहा जाता है, से है।"
उच्च न्यायालय का विचार था कि चूंकि पीड़िता के माता-पिता ने ईसाई धर्म अपना लिया है, इसलिए पीड़ित अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं रहा। इस आधार पर, उच्च न्यायालय ने प्रतिवादी के खिलाफ अधिनियम की धारा 3 (एल) (xi) के तहत लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया।
यह उक्त निर्णय के विरुद्ध है, केरल राज्य ने विशेष अनुमति याचिका के माध्यम से इस अपील को प्राथमिकता दी है।
1. पीड़ित परिवार को दो शताब्दी पहले ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया गया था। पीड़िता की मां रोमन कैथोलिक हैं। रोमन कैथोलिक के रीति-रिवाजों के तहत, कैथोलिक महिलाएं केवल एक कैथोलिक से शादी कर सकती हैं, जिसके लिए दूल्हे के लिए खुद को रोमन कैथोलिक के रूप में परिवर्तित करना भी आवश्यक है और ऐसा रूपांतरण हुआ है और पीड़िता का पिता अब रोमन कैथोलिक का सदस्य है। पीड़िता के परिवार ने अधिसूचित जनजाति का सदस्य बनना बंद कर दिया है।
2. एक जनजाति के प्रथागत कानून न केवल उसकी संस्कृति को नियंत्रित करते हैं, बल्कि उत्तराधिकार, विरासत, विवाह, देवताओं की पूजा आदि भी करते हैं। विभिन्न जनजातियों की विशेषताएं इस तथ्य के बावजूद कि वे लंबे समय से एक ही क्षेत्र में रह रहे हैं, अलग-अलग हैं। वे निर्विवाद रूप से विभिन्न देवताओं का पालन करते हैं। उनकी अलग-अलग संस्कृतियां हैं। उनके रीति-रिवाज भी अलग हैं।
3. धर्म परिवर्तन के कारण कोई जनजाति जनजाति नहीं रह जाता है, जबकि संविधान (अनुसूचित जाति) [(केंद्र शासित प्रदेश)] आदेश, 1951 के तहत अधिसूचित अनुसूचित जातियों के संबंध में यह दिखाने के लिए कि कोई भी व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध से अलग धर्म को मानता है, उसे समझा नहीं जाएगा। अनुसूचित जाति का सदस्य होने के लिए, ऐसा कोई प्रावधान संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में निहित नहीं है। हमारी राय में यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
4. किसी व्यक्ति को संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 के दायरे में लाया जा सके, उसे एक जनजाति से संबंधित होना चाहिए। राष्ट्रपति के आदेश का लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से एक व्यक्ति को एक जनजाति का सदस्य होने की शर्त को पूरा करना होगा और जनजाति का सदस्य बने रहना होगा। यदि बहुत समय पहले किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण के कारण, वह / उसके पूर्वज उन रीति-रिवाजों, अनुष्ठानों और अन्य लक्षणों का पालन नहीं कर रहे हैं, जिनका जनजाति के सदस्यों द्वारा पालन किया जाना आवश्यक है और यहां तक कि प्रथा का पालन नहीं कर रहे हैं उत्तराधिकार, वंशानुक्रम, विवाह आदि के नियम, उसे एक जनजाति के सदस्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
5. अंततः धार्मिक विश्वासों और सिद्धांतों पर स्थापित होती है, धर्म अनिवार्य रूप से सामाजिक आचरण के साथ मिश्रित होता है और यही कारण है कि जाति हिंदू समाज की एक अभिन्न विशेषता बन गई है। लेकिन इससे यह अनिवार्य रूप से एक अपरिवर्तनीय नियम के रूप में पालन नहीं होता है कि जब भी कोई व्यक्ति हिंदू धर्म को त्यागता है और किसी अन्य धार्मिक विश्वास को अपनाता है, तो वह स्वतः ही उस जाति का सदस्य नहीं रह जाता है जिसमें वह पैदा हुआ था और जिससे वह अपने धर्मांतरण से पहले था।
6. धर्मांतरण पर, एक व्यक्ति उस समुदाय को नियंत्रित करने वाले कानून से भिन्न कानून द्वारा शासित हो सकता है जिससे वह मूल रूप से संबंधित था
7. हमारा मत है कि व्यक्ति अनुसूचित जनजाति का एक व्यक्ति जिसने दूसरे धर्म को अपनाया है, उस समुदाय के रीति-रिवाजों और परंपरा का भी पालन कर रहा है, जिससे वह पहले था, यदि नहीं तो वह ST नहीं रहेगा अर्थात धर्म परिवर्तित करने वाले एसटी का आरक्षण, संरक्षण और शासकीय सुविधाएं नहीं ले सकते हैं। अतः केरल सरकार की अपील खारिज की जाती है ।
इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि माननीय उच्चतम न्यायालय का उक्त निर्णय, सनातन धर्म पद्धति वाली आदिधर्मी, धर्मपूर्वी, शिव पूजक और प्रकृति पूजक जनजातियों की संस्कृति को उसकी पहचान का अनन्य स्वरूप प्रदान करती है।
लेख
डॉ. मन्नालाल रावत