
संसद में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व के लिए भी आरक्षण नीति को विस्तारित किया गया है। संविधान निर्माताओं का मानना था कि जाति व्यवस्था के कारण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ऐतिहासिक रूप से पिछड़े रहे और उन्हें भारतीय समाज में सम्मान तथा समान अवसर नहीं दिया गया।
प्राचीन काल से ही यह जातियां छोटे-बड़े समूह के रूप में अस्तित्व में रही हैं और सनातन परम्परा का निर्वहन करती आ रही हैं। इन सभी जनजातियों की एक विशिष्ट जीवनशैली, संस्कृति है जिनकी आस्था किन्हीं न किन्हीं सनातन देवी-देवताओं के प्रति विद्यमान है।
इनकी पूजा-पद्धति पंचतत्वों और पर्व-त्यौहार प्रकृति पर आधारित हैं। वन, जनजातियों का मित्र है और जीवनयापन का सहयोगी है। प्रकृति के रूप में भूमि, जल, वायु, अग्नि और आकाश की पूजा करते हैं।
नृत्य, गीत, चित्रकला, वाद्ययंत्र, भाषा, वेषभूषा आदि एक विशिष्ट सनातनीय पहचान है। जनजातियों की सामाजिक व्यवस्थाएं, अनुशासन, संस्कारों में सर्वे भवतु सुखिनः, वसुधैव कुटुम्बकम् ..... . और अतिथि देवो भव की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। जनजाति समाज सनातन हिन्दू समाज की रीढ़ है।
सनातन को सुरक्षित रखना है तो रीढ़ का मजबूत होना आवश्यक है। जनजाति समाज प्रारंभकाल से ही अपने धरती, धर्म, जल, जंगल, अस्मिता और अस्तित्व के लिए संघर्ष करता आया है। अपने पुरखों पर अटूट श्रद्धा रखता आया है।
देश की आजादी और सुरक्षा के संघर्ष और आंदोलन में लाखों जनजातियों ने प्राणों से प्रिय भारत के लिए प्राण न्यौछावर कर बलिदान दिए हैं। इन बलिदानियों के वंशज और जनजाति समाज भी स्वतंत्र भारत में सुख-चैन का जीवन निर्वहन कर सकें, इस हेतु उन्हें संविधान में आरक्षण की सुविधाएं दी गई हैं। उन्हें शत-प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिलना ही चाहिए।
धर्मांतरित ईसाई और मुस्लिम न तो जनजाति संस्कृति, संस्कार के अनुरूप व्यवहार करते हैं और न ही जनजातीय देवी-देवताओं में आस्था रखते हैं। जनजाति समाज के तो भगवान शिव-पार्वती आराध्य देव हैं वहीं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और श्रीकृष्ण भी आदर्श और पूजनीय हैं।
जनजातियों ने भारत के शौर्य पराक्रम, संत- महात्मा ऋषि परम्परा को हजारों वर्ष तक विदेशी आक्रांताओं के षड्यंत्रों के बावजूद भी जीवंत और अक्षुण्ण बनाए रखा है, यह जनजाति समाज की देशभक्ति का परिचायक है। देश की पवित्र मान्यताओं एवं मानबिन्दुओं को उन्होंने कलंकित नहीं होने दिया है।
विगत 75 वर्षों से वे परम्परागत, धर्म-संस्कृति, रीति-रिवाज, पर्व-त्यौहार, पूजा-पाठ करते आ रहे हैं पर उनके अधिकांश आरक्षण का लाभ वे लोग ले रहे हैं, जो धर्मांतरित होकर ईसाई या मुस्लिम बनकर सनातन धर्म-संस्कृति, रीति- रिवाज, संस्कार और पर्व-त्यौहारों को छोड़ चुके हैं। वास्तव में जिन उद्देश्यों को लेकर अनुसूचित जनजाति को आरक्षण की सुविधाएं दी गई थीं, वह अधूरा है।
उच्चतम न्यायालय के दो निर्णयों में स्पष्ट है -
1. ऐसा व्यक्ति धर्मांतरित होने के बाद भी क्या सामाजिक रूप से अयोग्य, कमजोर है और क्या वह अब भी अपनी पुरानी जाति के रीति-रिवाजों और परम्पराओं का पालन कर रहा है? (केरल राज्य बनाम अन्य बनाम चन्द्रमोहनन)
2. मेघालय के एक मामले में शासकीय आदेश को गुवाहाटी उच्च न्यायालय और बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहकर न्यायोचित एंव वैध ठहराया कि ऐसे मुखिया को परम्परा के अनुसार गांव के धार्मिक अनुष्ठान एवं प्रशासनिक दोनों कार्य एक साथ करने पड़ते हैं और एक धर्मांतरित ईसाई ऐसा नहीं कर सकता (एवान लांकेई रिम्बाई बनाम जयंतिया हिल्स डिस्ट्रिक्ट कॉउन्सिल एवं अन्य - 2006)
स्वर्गीय कार्तिक उरांव द्वारा संसद में पेश किये गये विधेयक द्वारा निर्मित संयुक्त संसदीय समिति की प्रस्तावित रिपोर्ट "2 अ. कंडिका-2 में निहित किसी बात के होते हुए कोई भी व्यक्ति जिसने जनजाति आदिमत तथा विश्वासों का परित्याग कर दिया हो और ईसाई या इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया हो, वह अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं समझा जाएगा"।
संविधान में अनुसूचित जनजातियों के लिये आरक्षण के अलावा सुरक्षात्मक दृष्टि से अनुसूचित क्षेत्रों में 5वीं, 6ठी अनुसूची और पैसा कानून 1996 का प्रावधान किया गया है, जिससे उन्हें आजीविका की पूर्ति हो तथा वे अस्मिता और अस्तित्व की रक्षा कर सकें।
जनजाति सुरक्षा मंच ने संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट को आगे बढ़ाने का काम किया है, यह राष्ट्रहित, देशहित और समाजहित के लिए सराहनीय कदम है।
जनजाति सुरक्षा मंच का एक ही उद्देश्य है "जो धर्मांतरित होकर ईसाई या मुसलमान हो गए हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति की आरक्षण सूची से हटाया जाए"। इस विधेयक से संसद की सभा में पारित होकर राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हो जाने से जनजातियों की अनेक समस्याओं का समाधान है।
जनजाति सुरक्षा मंच के आह्वान को सहयोग देने के लिए राष्ट्रवादी, देशभक्त समाज को आगे आना नितान्त आवश्यक है। परम्परागत जनजातियों का वर्तमान स्थिति में आरक्षण का होना जरूरी है क्योंकि यह उनके जीवन मरण का प्रश्न है।
यह विधेयक (रिपोर्ट) जनजातियों का ब्रह्मास्त्र है। इस अस्त्र का उपयोग अब नहीं तो कब करेंगे अर्थात इस विधेयक का संसद से पारित होना आवश्यक है। जनजाति समाज के अनेक मुद्दे हैं। लेकिन अभी केवल एक ही मुद्दा है कि जो धर्मांतरित हो गए हैं. आरक्षण की सूची से उनकी डी-लिस्टिंग की जाए।
जैसे भी हो, इस मांग की जब तक पूर्ति नहीं हो जाय तब तक न हम चैन से रहेंगे, न ही समाज और सरकार को चैन से रहने देंगे। करो या मरो के रूप में इस आन्दोलन को लेना पड़ेगा। मुझे पूरा विश्वास है कि इस आन्दोलन के माध्यम से स्व. कार्तिक उरांव का सपना, संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट को पारित कराने में सफलता हासिल होगी, जिससे जनजाति समाज अपने अधिकारों को प्राप्त कर गौरवान्वित होगा।
सत्येन्द्र सिंह, जशपुर