उत्सव का दृश्य
15 अगस्त 1947 को, भारत के हर गांव और शहर में उत्सव का माहौल था क्योंकि हमारा देश गुलामी की जंजीरों से आजाद होने वाला था। कांग्रेस हाईकमान ने आदेश दिया कि पूरे भारत में हर स्थान पर ऐसा जश्न मनाया जाए, जिसके सामने दीपावली का जश्न भी फीका लगे।
स्वतंत्र भारत की राजधानी की चमक देवराज इंद्र की अमरावती से भी कई गुना ज्यादा थी। चारों तरफ रोशनी की जगमगाहट के बीच लोग खुशी से झूम रहे थे और हजारों की संख्या में लाल किले की तरफ जाते लोग नेताओं का जय-जयकार कर रहे थे, जिन पर हेलिकॉप्टर से पुष्पवर्षा भी की जा रही थी।
पंडित जवाहर लाल नेहरू और लॉर्ड माउंटबेटन जैसे व्यक्तित्व शाही सवारी पर सुशोभित होकर लाल किले की तरफ हजारों की संख्या के साथ चल रहे थे। सैनिक बलों द्वारा सलामी दी गई और सभी नेताओं ने हाथ हिलाकर जनता का अभिवादन भी स्वीकार किया।
खून की एक बूंद के बिना आजादी मिल गई, साबरमती के संत का प्रचार करते हुए - "दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल..." आदि गीतों द्वारा दिल्ली की जनता को यह संदेश दिया जा रहा था कि हमें आजादी बिना रक्तपात किए ही मिली है और इसी प्रकार एक दिन सारे अंग्रेज भारत छोड़कर जाने में मजबूर हो गए।
आजाद भारत के अभिनंदन और स्वागत का समय जैसे-जैसे नजदीक आ रहा था, जनता का जोश आकाश तक पहुँच चुका था। नीचे चमकदार आकाश में छाई काली घटा का आंखों देखा विवरण करते हुए आकाशवाणी ने संदेश प्रसारित किया कि, "देखो कैसे कुदरत भी भारत की स्वतंत्रता का स्वागत करने को तैयार है, कितना शुभ मुहूर्त है। वर्षा के बाद कितना सुंदर इंद्रधनुष भारत की आजादी के लिए स्वागत का हार बना है।" (पुस्तक: अपनी जान की बाजी लगाकर, पृष्ठ 20)
विभीषिका का दृश्य
आकाशवाणी के वक्ता जब प्राकृतिक सुंदरता का आंखों देखा हाल सुना रहे थे, वहीँ इसी मनमोहक नजारे के विपरीत बेहद खौफनाक और दिल को पसीजने वाला दृश्य चल रहा था। भारत की धरती पर भारत राष्ट्र के प्रति नफरत और दुश्मनी फैलाने वाली विचारधारा के कारण पाकिस्तान का जन्म हुआ, जिसका परिणाम दिल्ली के नेताओं से दूर आम जनता ने झेला। कई मील लंबे काफिले लाहौर, मुल्तान, लायलपुर और सियालकोट आदि स्थानों से भारत की तरफ आ रहे थे।
आजादी के जश्न में शामिल होने के लिए लाल किले पर जा रहे काफिलों से यह काफिले बिल्कुल भिन्न थे। भारत में आ रहे काफिले खुशी से झूमकर नहीं बल्कि मौत से डरे हुए सहमे हुए लोगों का समूह था। अपना सबकुछ छोड़कर भागने पर मजबूर हुए लोगों की सारी दौलत उनके बहुत पीछे छूट गई, जिसे प्राप्त करना लगभग नामुमकिन सा प्रतीत हो रहा था। आलीशान महलों और गलीचों पर चलने वाले पैर कुछ सत्ता लोभी नेताओं के कारण मिट्टी और कीचड़ से भरे पड़े थे।
सबसे अधिक हृदय गर्भवती महिला को देखकर पसीजा, जिसने जंगलों और काफिलों के बीच अपनी संतान को जन्म दिया। भारत की ओर प्रस्थान कर रहे काफिलों पर मुस्लिम लीग के गुंडे कभी भी हमला कर नरसंहार फैलाते, बलात्कार करते और सारा प्रशासन इन कुकृत्यों में उनका सहभागी बना हुआ था। प्रशासन द्वारा बनाए गए सरकारी काफिलों और सुधार केंद्रों की स्थिति ऐसी थी, जहां न खाने को अन्न था और न पीने को जल।
अपनी ही भूमि पर शरणार्थी बने लोग और बच्चे कई दिनों तक भूखे प्यासे बिलखते रहे। खाना न खाने के कारण स्तनपान करवाने वाली महिलाओं के स्तनों से दूध तक आना बंद हो चुका था। स्थिति ऐसी थी कि कई बार अपना गला गीला करने के लिए खुद के मूत्र तक का प्रयोग करना पड़ता था। परंतु सरकार और सरकारी अधिकारी तो केवल लाल किले के जश्न में व्यस्त थे।
भारत के विभाजित भागों से कई स्थान आग की लपटों में जल रहे थे। ऐसे जल रहे घरों में अनेकों महिलाओं, पुरुषों और बच्चों की चीखों से आकाश दहल रहा था। चारों तरफ लाशों का ढेर लगा हुआ था, धड़ से अलग हुए सिर रास्तों पर गेंदों की भांति लुढ़क रहे थे। नन्हे मासूम शिशुओं को भालों पर उछाला जा रहा था। यहाँ पर भी सैनिकों द्वारा गोलियां चलाई गईं, परंतु सलामी के लिए नहीं, अपितु नरसंहार करने वाले जिहादियों का साथ देने के लिए।
महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर उन्हें लूटे हुए माल की तरह बेचा जा रहा था। सुहागन विधवा हो रही थी, बच्चे अनाथ हो रहे थे। मुस्लिम लीग के हथियारबंद जेहादी जबरन रास्ते पर लोगों का नरसंहार करते हुए और भारत जाने वाली पूरी की पूरी रेल गाड़ी को ही काट देते तथा आखिरी डिब्बों पर भारत के लिए संदेश लिख देते, "आजाद भारत के लिए पाकिस्तान का तोहफा।" ऐसे दृश्यों से ऐसा प्रतीत हुआ जैसे इंसानियत अपना दम तोड़ चुकी हो, परंतु फिर भी कई विद्वानों का मानना है कि कोई भी मजहब वैर करना नहीं सिखाता। ऐसे ही लोगों की कुटिलता का परिणाम अखंड भारत में खंडित होकर चुकाया है।
सैंकड़ों सालों तक भारत राष्ट्र की रक्षा करने वाला पंजाब स्वयं रक्षा की गुहार कर रहा था, स्थिति यह थी कि पंजाबी शरणार्थी बन अपनी ही भूमि पर भटक रहा था। सारे देश को खाना देने वाला किसान आज स्वयं दाने का मोहताज बना बैठा था। नहरों और दरियाओं के राज्य पंजाब के बच्चे पीने के लिए साफ पानी को तरस रहे थे। परंतु ऐसे भयानक दृश्यों के बीच कुछ साहसपूर्वक विरोध के दृश्य भी थे, जिसमें महिलाएं स्वयं माँ चंडी का रूप धारण कर जेहादी राक्षसों का खात्मा कर रही थीं। (आधीरात को आजादी, अनुवादित फ्रीडम एट मिडनाइट, पृष्ठ 213)
क्या था आजादी का संकल्प
14 और 15 अगस्त की मध्यरात्रि का समय था, जब पंडित नेहरू ने भावुक होकर संसद के सेंट्रल हॉल में संविधान सभा को संबोधित किया। कई वर्ष पहले हमने इस नियति को पाने का संकल्प लिया था। उस नियति से हमारा मिलन हो गया है। हमने उस नियति को पा लिया है। ठीक आधी रात को जब सारा विश्व सो रहा होगा, तब भारत जीवन और मुक्ति की अंगड़ाई लेकर उठेगा। यह वह ऐतिहासिक घड़ी है, जब पुराना युग समाप्त होता है और हम सब नए युग में प्रवेश कर चुके हैं। (ट्रस्ट विद डेस्टिनी का हिंदी अनुवाद)
नेहरू जी के इस संबोधन के बाद कुछ जनता उनकी बातों को समझने की कोशिश कर रही थी, जबकि कुछ उनकी बातों से उलझ चुकी थी। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि पंडित नेहरू किस नियति को पाने की बात कर रहे थे। क्या देश के नेता जिस नियति की बात कर रहे हैं उसमें अखंड भारत का विभाजन भी शामिल था? क्या उसमें विभाजित भारत में हो रहा नरसंहार भी शामिल था?
आजादी की रात कहा थे गाँधी?
आजादी की रात को जनता की असंख्य आंखें गांधीजी को तलाश रही थीं। गांधी जी अपने प्यारे शिष्य नेहरू, जिसे उन्होंने सरदार पटेल से इस्तीफा मांगकर प्रधानमंत्री बनाया था, की ताजपोशी पर कहाँ थे? ऐसे और भी कई प्रश्न गांधी जी और आजादी की रात्रि को लेकर हैं, जिसका उत्तर इतिहास के कई परतों के नीचे दफन होने की संभावना है।
नरसंहार पर कांग्रेस का मौन धारण
भारत भूमि को अपनी मातृभूमि और पुण्यभूमि मानने वाली जनता को यह उम्मीद थी कि पंडित नेहरू अपने राष्ट्र के प्रति पहले संबोधन में विभाजन के कारण हुए नरसंहार पर कुछ बयान देंगे, जिससे त्रासदी से ग्रस्त जनता के जख्मों पर शाब्दिक मरहम लग सके। परंतु दुख की बात यह थी कि नेहरू जी ने नरसंहार के प्रति कुछ जिक्र तक नहीं किया।
उन्होंने अपने संबोधन में केवल आजादी के जश्न और आजादी के स्वप्न को पूरा होने की बात कही। अखंड भारत, मातृभूमि भारत का अंग-भंग और त्रासदी से ग्रस्त लोगों की चीखों से आकाश तो दहला, परंतु नेहरू जी का हृदय न पसीजा, शायद इसीलिए उन्होंने इन सभी घटनाओं पर कुछ बोलना उचित न समझा।
14, 15 और 16 अगस्त को डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, पंडित नेहरू आदि नेताओं के भाषण होते रहे, समारोह होते रहे परंतु किसी ने भी दंगा पीड़ितों के साथ हमदर्दी ज़ाहिर न की।
सोची समझी रणनीति
किसी भी भाषण में इस समारोह में दंगों की बात न करना केवल एक गलती नहीं, बल्कि एक सोची समझी रणनीति थी, जिससे भारत की जनता का ध्यान भटकाया जा सके। चलिए माना कि आजादी के जश्न में ऐसी बात को करना सही न समझा हो, परंतु समय बीतने पर शरणार्थी लोगों के साथ हो रहे सरकारी व्यवहार से इसी रणनीति को बल मिलता है।
“तत्कालीन सरकार और वामपंथी इतिहासकारों की पूरी कोशिश थी कि भारत विभाजन और नरसंहार को इतिहास में कहीं छुपाया जाए, जिसमें काफी वर्षों तक वह सफल भी रहे। परंतु राष्ट्रवादी तत्वों द्वारा ऐसे कुकृत्यों को जनता तक पहुंचाने का काम किया जा रहा है।”
भारत के इतिहास में रानी पद्मावती का एक जौहर इतिहासकारों की रात की नींद खराब करता है, तो जहां हजारों माताओं, बहनों ने अपनी इज्जत रक्षा करने हेतु अनेकों जौहर किए, इन सभी तथ्यों से इतिहासकारों को बड़ा झटका तो लगना ही था।
रावलपिंडी, लाहौर, मुल्तान और सियालकोट से आने वाले शरणार्थी कैंपों में जब लोगों ने अपनी आपबीती का वर्णन किया तो वहां मौजूद सरकारी अधिकारी और नेताओं ने इसको एक बुरा स्वप्न समझकर भूल जाने की सलाह दी और आजादी के उत्सव को मनाने के लिए कहा। कांग्रेसी अधिकारियों और नेताओं का ऐसा व्यवहार उनके शीर्ष नेतृत्व से मिले आदेश ही प्रतीत होता था।
सारांश
भारत राष्ट्र कई सैकड़ों देशभक्तों की प्राणों की आहुति के कारण आजाद हुआ, इसमें केवल एक पार्टी का नहीं, बल्कि सारे राष्ट्र का योगदान है। कांग्रेस केवल बैठकर आजादी की बात करती रही, शायद इसी कारण कांग्रेस के किसी नेता को कालापानी की सजा या फांसी या उम्रकैद नहीं हुई। भारत को आजाद कराने में इस पार्टी की भूमिका एक चिंतन का विषय है, परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि विभाजन में इसी पार्टी का भरपूर योगदान है।
अंत में, भारत राष्ट्र की आत्मा भारत की जनता को आजादी या विभीषिका के विषय पर चिंतन छोड़कर निम्न पंक्तियों से अपने लेख को विराम देता हूँ:
सजा ये शहादतों की, खुदा ने सुनाई है
आजादी की कीमत हमने खून से चुकाई है।
लेख
रजत भाटिया
स्तंभकार - Writers For The Nation