पत्रकारिता में सहानुभूति और जांच के बीच एक बारीक लेकिन निर्णायक रेखा होती है। सहानुभूति व्यक्ति को सुनने की जगह देती है, लेकिन जांच यह तय करती है कि पाठक को पूरा सच मिले। Newslaundry में प्रकाशित आनंद तेलतुंबड़े पर इंटरव्यू के बाद लिखा गया लेख इस रेखा को पार कर जाता है।
यह कोई छोटी संपादकीय चूक नहीं है। यह उस तरह की चयनात्मक कहानी है, जो वर्षों से माओवादी हिंसा के शहरी समर्थन तंत्र को “बौद्धिक असहमति” के खोल में ढकने की कोशिश करती रही है।
दरअसल आनंद तेलतुंबड़े की गिरफ्तारी अप्रैल 2020 में एल्गार परिषद - भीमा कोरेगांव मामले में हुई। यह तथ्य निर्विवाद है। यह भी सही है कि उन्हें नवंबर 2022 में बॉम्बे हाईकोर्ट से ज़मानत मिली। लेकिन Newslaundry का लेख जमानत को लगभग नैतिक मुक्ति की तरह पेश करता है, जबकि किसी भी अनुभवी कोर्ट रिपोर्टर को पता है कि जमानत न्यायिक प्रक्रिया का एक चरण है, अंतिम निर्णय नहीं। एनआईए के आरोपपत्र अदालतों के सामने लंबित हैं और विशेष अदालतों ने उन्हें सुनवाई योग्य माना है। इस बुनियादी कानूनी सच्चाई को वो लेख लगभग गायब कर देता है।
लेख का केंद्रीय तर्क यह है कि “अर्बन नक्सल” एक गढ़ा हुआ शब्द है,एक ऐसा लेबल जिसे सत्ता ने असहमति को कुचलने के लिए बनाया है। यह दावा सुनने में आकर्षक लग सकता है, लेकिन जमीनी सुरक्षा दस्तावेज़ों और माओवादी संगठन की अपनी रणनीतिक लिखावटों से इसका सीधा टकराव है।
शहरी क्षेत्रों में काम करने वाले ओवरग्राउंड नेटवर्क, जो भर्ती, फंडिंग, कानूनी सहायता और वैचारिक प्रचार का काम करते हैं, उसे लेकर चेतावनी कोई टीवी डिबेट से नहीं, बल्कि दशकों की खुफिया रिपोर्टिंग और अभियानों से आई है। इस तथ्य को नकारना या मज़ाक में उड़ा देना पाठक को अधूरी तस्वीर दिखाना है।
आनंद तेलतुंबड़े के कारावास का वर्णन लेख में भावनात्मक गहराई के साथ किया गया है। एक पत्रकार के तौर पर इसे दर्ज करना गलत नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब यह निजी पीड़ा पूरे मामले का एकमात्र लेंस बना दी जाती है।
जेल की कठिनाइयों का विवरण अभियोजन के आरोपों को स्वतः झूठा नहीं बना देता। लेकिन लेख इस अंतर को बनाए रखने में विफल रहता है।
सबसे गंभीर चूक आनंद तेलतुंबड़े के पारिवारिक संदर्भ को लेकर है। उसका भाई मिलिंद तेलतुंबड़े CPI (माओवादी) का वरिष्ठ कमांडर था। नवंबर 2021 में गढ़चिरौली में एक मुठभेड़ में उसकी मौत हुई। यह कोई अफवाह नहीं, आधिकारिक रिकॉर्ड है। यह कहना जरूरी है कि किसी के भाई का माओवादी होना अपने-आप में अपराध सिद्ध नहीं करता। लेकिन जब पूरा लेख “शहरी नक्सल” की अवधारणा को नकारने पर टिका हो, तब इस तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज करना पत्रकारिता की ईमानदारी पर सवाल खड़े करता है।
इसी तरह, अनुराधा गांधी का ज़िक्र लेख में या तो नहीं है या बहुत हल्के ढंग से है। अनुराधा गांधी CPI (माओवादी) की केंद्रीय समिति की सदस्य थी, यह स्थापित तथ्य है। आनंद तेलतुंबड़े ने उनकी रचनाओं का संपादन किया, उनकी वैचारिक विरासत को आगे बढ़ाने वाले मंचों से जुड़े रहे, यह भी सत्य है। हालांकि यह भी अपराध का प्रमाण नहीं है, लेकिन यह वैचारिक निकटता का संकेत है। एक गंभीर रिपोर्टर इसे संदर्भ के रूप में जरूर रखता।
Newslaundry का लेख स्टैन स्वामी की मृत्यु को “राज्य की क्रूरता” के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है। लेकिन लेख यह नहीं बताता कि उनके ख़िलाफ आरोप क्या थे, अदालतों ने किन आधारों पर जमानत से इनकार किया, और फॉरेंसिक रिपोर्ट किस कानूनी स्थिति में हैं।
वाशिंगटन पोस्ट द्वारा प्रकाशित हैकिंग संबंधी रिपोर्ट महत्वपूर्ण है, लेकिन वह अदालत का फ़ैसला नहीं है। इस अंतर को स्पष्ट न करना पाठक को भ्रमित करता है।
लेख का सबसे बड़ा प्रोपेगेंडा यह है कि वह माओवादी हिंसा के व्यापक संदर्भ को लगभग पूरी तरह छोड़ देता है। CPI (माओवादी) द्वारा की गई हत्याएँ, जनजातीय समाज पर उनका अत्याचार, असहमति रखने वालों की निर्मम हत्या, इन सबका उल्लेख तक नहीं है। जब हिंसा के इस इतिहास को पृष्ठभूमि से हटा दिया जाता है, तो शहरी नेटवर्क से जुड़े किसी भी मामले को केवल “राज्य बनाम बुद्धिजीवी” की कहानी बनाना आसान हो जाता है।
एल्गार परिषद को लेख एक सांस्कृतिक आयोजन की तरह पेश करता है, जबकि जांच एजेंसियों और अदालतों ने उसके आयोजकों, फंडिंग और भाषणों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की एफआईआर को रद्द नहीं किया, यह तथ्य अपने-आप में बताता है कि आरोपों को निराधार नहीं माना गया।
यह लेख यह तय करने की कोशिश नहीं करता कि आनंद तेलतुंबड़े दोषी हैं या नहीं, यह फैसला अदालतें करेंगी। लेकिन पत्रकारिता का काम यह भी है कि वह पाठक को पूरा संदर्भ दे। Newslaundry का लेख ऐसा नहीं करता।
लोकतंत्र में असहमति ज़रूरी है। लेकिन हिंसक विचारधाराओं के शहरी समर्थक तंत्र को केवल “विचारों का मतभेद” बताकर सामान्यीकृत करना भी उतना ही खतरनाक है। अनुभवी पत्रकार जानते हैं कि सबसे खतरनाक कहानियाँ वे होती हैं, जो अधूरे सच को भावनात्मक भाषा में ढक देती हैं।
आनंद तेलतुंबड़े का मामला सिर्फ़ एक व्यक्ति का मामला नहीं है। यह उस पूरे शहरी नेटवर्क का हिस्सा है, जिसे समझे बिना माओवादी हिंसा की असली संरचना समझी ही नहीं जा सकती। और जब मीडिया इस नेटवर्क को देखने से इनकार करता है, तो वह अनजाने में उसी तंत्र की मदद करता है, जिसे वह सत्ता-विरोध के नाम पर निर्दोष बताना चाहता है।