28 जुलाई 2014 को चीन की ओर से उइघुर मुसलमानों पर किया गया हमला इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक बन गया है। इस घटना में चीन की सुरक्षा ताकतों ने निर्दोष प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की, जिससे सैकड़ों तक लोग मारे गए। इस नरसंहार ने दुनिया को बता दिया कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी इंसानों की जान से खेलती है और उइघुरों पर अत्याचार करती है।
उइघुर समुदाय ने धर्म और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण विरोध किया। स्थानीय लोगों की कहानी अनुसार, एक उइघुर परिवार की पुलिस द्वारा बेरहमी से हत्या हुई थी, जिसके बाद लोग पुलिस चौकी और सरकारी कार्यालयों के सामने प्रदर्शन करने जुटे। उन्हें चुप कराने की बजाय चीनी फोर्सेज ने भारी हथियारों से हमला कर दिया, जिससे गोलीबारी फैल गई। सर्वाधिक संख्या में बलात्कार या विरोध नहीं, बल्कि नियंत्रण और डर का माहौल बनाया गया था।
चीनी सरकार ने कहा कि इस घटना में कुल 96 लोग मारे गए, 37 नागरिक और 59 'आतंकवादी', लेकिन उइघुर समुदाय और मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि हकीकत इससे कहीं अधिक भयावह थी। विश्व उइघुर कांग्रेस और अन्य स्वतंत्र स्रोतों का कहना है कि कम से कम 2,000 से 5,000 उइघुर लोग मारे गए और कई घायल हुए।
इंटरनेट सेवा तत्काल बंद कर दी गई, मोबाइल नेटवर्क रोका गया और क्षेत्र से जानकारी बाहर नहीं निकलने दी गई। पत्रकारों का प्रवेश बंद कर दिया गया और स्थानीय लोगों को अपनी बात कहने से डराया गया। इस तरह चीनी सरकार ने घटनास्थल की तस्वीरों और गवाहियों को दबा दिया।
यह एक राज्य द्वारा समर्थित अत्यधिक हिंसा थी जिसमें निर्दोष लोग निशाना बने।
यह दर्शाता है कि चीनी शासन में उइघुरों को 'द्वेषपूर्ण तत्व' घोषित कर धराशायी किया जाता है।
यह घटना 2009 की उरुमची हिंसा से भी ज्यादा रक्तरंजित थी, लेकिन आज तक कोई न्याय नहीं हो पाया।
विश्व उइघुर कांग्रेस और यूएस आधारित जनजाति समूहों ने प्रत्येक वर्ष इस नरसंहार की वर्षगांठ मनाई है। उन्होंने चीनी सरकार से मांग की है कि मारे गए उइघुरों की संख्या, स्थान और स्थिति की जानकारी पारदर्शी रूप से दी जाए, और न्याय सुनिश्चित किया जाए।
चीनी सरकार ने आतंकवाद का हवाला देकर इस अत्याचार को छुपाने की कोशिश की, लेकिन इसका उद्देश्य बस उइघुरों की आवाज़ दबाना और उनकी संस्कृति मिटाना था। यह हिंसा सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि ऊँची सांस्कृतिक दबाव और तनाव से जुड़ा राज्यवादी प्रबंधन है।
यारकंद नरसंहार चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की मानवता विरोधी साजिशों का साक्ष्य है। इन मासूम उइघुरों की हत्या एक स्पष्ट संदेश है कि वे अपने धर्म, भाषा और जातीय पहचान के लिए लड़ते रहे, जबकि एक अत्याचारी सरकार ने उन्हें मारने में कुछ भी गुरेज नहीं किया।
हमें इस घटना को भुलाना नहीं चाहिए। दुनिया को चीनी सरकार की इस अमानवीय नीति के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ बुलंद करनी चाहिए, ताकि मानवाधिकार का सम्मान हो और उन परिवारों को न्याय मिल सके जिनकी ज़िंदगियाँ उजड़ गईं।
लेख
शोमेन चंद्र
तिल्दा, छत्तीसगढ़