चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) द्वारा 1955 से 1957 तक चलाया गया “सूफान आंदोलन” (Campaign to Suppress Counter‑Revolutionaries) चीन के इतिहास में सबसे निर्दयी राजनीतिक उत्पीड़न अभियानों में से एक था। इस आंदोलन में अधिकारों का दुरुपयोग और मास की मार की गई जिसका मुख्य उद्देश्य था पार्टी और राज्य के भीतर से कथित विरोधियों को ख़त्म करना।
1 जुलाई 1955 को CCP की केंद्रीय समिति ने एक निर्देश जारी किया कि पार्टी, सरकारी और सैन्य संस्थाओं में छुपे हुए '反革命分子' यानी 'विप्लवी तत्वों' को पूरी तरह साफ किया जाए। यह अभियान सोवियत समर्थक अधिकारियों, बुद्धिजीवियों, पूर्व के KMT (क्वोमिंटन) समर्थकों और अन्य आलोचकों को निशाना बनाकर चलाया गया।
इस आंदोलन में पार्टी के शीर्ष नेता, सरकारी कर्मचारी, विद्वान, विचारक और कार्यकर्ता शामिल थे। हो फेंग नामक मारक्सवादी आलोचक और उनकी लेखक मंडली को सबसे पहले निशाना बनाया गया। इन्हें ‘反革命’ घोषित कर न केवल काम से हटाया गया बल्कि लाखों बुद्धिजीवियों को संदेश देने के लिए दंडित भी किया गया।
अधिकारिक आँकड़ों के अनुसार हालांकि 2.14 लाख लोग गिरफ्तार किए गए, लेकिन अनेक विशेषज्ञों की रिपोर्ट में लगभग 53,000 लोगों की मौत हुई। कुल मिलाकर करीब डेढ़ मिलियन से अधिक बुद्धिजीवियों और सरकारी कर्मियों को प्रताड़ित किया गया और उनके नागरिक अधिकार छीने गए।
माओ ने यह तय किया कि देश की केवल 5 प्रतिशत आबादी को "反革命" घोषित कर क्रूर दमन कार्रवाई की जाएगी। जिसने संगठन के भीतर भय और नियंत्रण का माहौल बना दिया। औपचारिक अदालत प्रक्रिया के बजाय प्रशासनिक आदेशों के आधार पर गिरफ्तारी की गई और लोगों को स्वतंत्र रूप से अपनी बात कहने से रोका गया।
क्यों यह घटना खतरनाक है?
- यह अभियान व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार का घोर उल्लंघन था
- बुद्धिजीवियों और संस्कृति पर समूहिक दबाव और डर पैदा किया गया
- खुले मन और विचारों पर वार करके समाज की उन्नति रोकने की कोशिश की गई
इस आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोधियों को मर्मस्थ कर देना नहीं, बल्कि लोकतंत्र की छाया में अपने विरोधियों को पहले से ही निष्क्रिय कर देना था। CCP ने आत्म‑समीक्षा, सार्वजनिक अपमान, मास जांच और हत्था डालने की आतंक नीति अपनाई ताकि कोई भी मुखर मानसिकता बच न पाए।
सूफान आंदोलन ने दुनिया को यह संदेश दिया कि चीनी सत्ता मात्र सत्ता के लिए मानवता का खात्मा कर सकती है। बुद्धिजीवियों को रोका गया, विचारों को घुटने टेकने पर मजबूर किया गया, और अंततः हजारों परिवारों का जीवन उजड़ गया।
आज के समय में यह घटना हमें धर्मनिरपेक्षता, स्वतंत्र अभिव्यक्ति और मानव अधिकारों के प्रति जागरूक रहने की सीख देती है।चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की यह दमनकारी नीति दुनिया भर के लोकतांत्रिक समाजों को सतर्क करती है।
‘सूफान आंदोलन’ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता की भूख की बानगी है, जिसमें निर्दोष लोग दर्दनाक रूप से समाप्त कर दिए गए। यह इतिहास का बताया न जाने वाला एक काला अध्याय है। हमें इसका स्मरण करना होगा ताकि हम कभी भी ऐसी निरंकुश नीतियों का समर्थन न करें, कभी भी मानव अधिकारों की कीमत पर सत्ता को मजबूत न बनने दें।
लेख
शोमेन चंद्र
तिल्दा, छत्तीसगढ़