भारत में त्यौहारों एवं अलग-अलग दिवसों को मनाने की परंपरा बहुत पुरानी है। यहाँ क्षेत्र, भाषा, बोली एवं स्थानीय परंपराओं के अनुसार कई प्रकार के त्यौहार एवं दिवस मनाए जाते हैं। इन महत्त्वपूर्ण दिवसों में से कुछ सरकार द्वारा घोषित किए गए हैं, तो वहीं कुछ तिथियाँ ऐसी होती हैं जो लोक आस्थाओं एवं स्थानीय गणनाओं द्वारा निर्धारित की जाती हैं।
इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे दिवस हैं जो अंतरराष्ट्रीय संगठनों एवं संस्थाओं द्वारा घोषित किए गए हैं, जिन्हें भी अब मनाया जाने लगा है, जैसे मज़दूर दिवस या पर्यावरण दिवस।
वहीं कुछ दिवस ऐसे भी हैं जो भारतीय परिप्रेक्ष्य में केवल और केवल व्यावसायिक या बाज़ार की व्यवस्था के लिए बनाए गए हैं, जैसे-फ्रेंडशिप डे, मदर्स डे, फादर्स डे या अन्य।
लेकिन इन सब के बीच एक दिवस ऐसा भी है जिसे भारत में बड़े जोर-शोर से मनाया जाने लगा है, खासकर जनजाति समाज इस दिवस को उत्साह से मानता है, वह है विश्व मूलनिवासी दिवस। प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को यह दिवस मनाया जाता है।
बीते कुछ वर्षों में भारत में जनजाति समाज इसे विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मना रहा है। इस दिवस को लेकर जनजाति समाज में और खासकर युवाओं में काफ़ी उत्साह भी देखा गया है।
हालांकि एक वास्तविकता यह भी है कि इस दिवस का भारत के आदिवासी/जनजाति समाज से कोई लेना देना नहीं हैज़ लेकिन चूंकि जनजाति समाज के पास अपना कोई एक ऐसा दिवस नहीं था, जिसके नाम पर राष्ट्रीय स्तर पर कोई दिवस मनाया जाए तो जनजाति समाज के लिए इस 'विश्व मूलनिवासी दिवस' में ही अपनी पहचान को स्थापित करने की मजबूरी हुई।
लेकिन आज भारत के जनजाति युवाओं को यह जानना भी ज़रूरी है कि आख़िर विश्व मूलनिवासी दिवस किनके लिए है? हमें यह भी जानना चाहिए कि इस मूलनिवासी दिवस से हमारे समाज के किस स्वरूप की पहचान हो रही है?
तो देखिए ऐसा है कि जब संविधान निर्माण हो रहा था तब संविधान सभा में बैठे सदस्यों कर बीच यह आम सहमति थी कि जनजाति समाज को कुछ 'खास' देने की आवश्यकता है, ताकि यह समाज भी आधुनिक भारत के विकास के साथ-साथ अपने विकास के लिए कार्य कर सके।
बाबा साहब अंबेडकर जी ने भी इसके लिए संविधान सभा में आवाज़ उठाई थी। हालांकि संविधान निर्माण के सात दशकों बाद भी जनजाति समाज के सर्वांगीण विकास का वह सपना साकार रूप नहीं ले पाया। समाज की विकास संरचना में बेहद ही मामूली परिवर्तन देखने को मिले।
स्वतंत्रता के पश्चात हमारे समाज की पीढ़ियों ने समाज के परिवर्तन की जो आशा रखी थी, वह उस गति से नहीं हो पाई, जैसे होनी थी।
इस बीच विभिन्न सरकारों ने आदिवासी/जनजाति समाज को उम्मीदें तो दीं, लेकिन उस पर कभी काम नहीं किया।
सरकार एवं शासन-प्रशासन की उलझी व्यवस्थाओं एवं नीतियों का फायदा विभिन्न समूहों ने उठाने का प्रयास किया।
किसी ने आदिवासी/जनजाति समाज का आर्थिक लाभ उठाया, तो किसी ने सामाजिक। लेकिन इन सब के बीच कुछ शक्तियाँ ऐसी भी आ गईं जो समाज को उनकी संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज, रूढ़ि और पुरखों की विरासत से काटने की कोशिश करने लगी।
इन समूहों ने कभी कहा कि आदिवासी सनातनी नहीं, तो कभी कहा कि केवल हम मूलनिवासी हैं, बाकि सब बाहरी हैं।
लेकिन हमारे पुरखों ने क्या कहा था, वह जानना भी ज़रूरी है।
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने क्या कहा था यह जानना ज़रूरी है। जब संविधान में इसी मूलनिवासी का प्रश्न उठा, तब बाबासाहब ने हमारे समाज (जनजाति समाज) के लिए आदिवासी या मूलनिवासी नहीं, बल्कि जनजाति शब्द पर सहमति जताई, उन्होंने समाज को बांटने वाले सभी विचारों को दरकिनार कर दिया।
ऐसा नहीं है कि हम आदिवासी नहीं हैं, हम क्या भारत के सभी नागरिक आदिवासी हैं, मूलनिवासी हैं। आदिवासी ही तो सनातन संस्कृति और भारत की सभ्यता का आधार है।
लेकिन जो चूक पिछली पीढ़ियों से हुई हैं, आज की हमारी पीढ़ी उससे सीख लेती नहीं दिखाई दे रही।
जनजाति समाज को लेकर जितने भी विचार-विमर्श और चिंतन धाराएँ जन्म ले रहीं हैं, या चर्चा में बनी हुई हैं, वह विकासपरक ना होकर केवल शाब्दिक जाल में उलझ चुकी हैं और इन उलझनों को हम बारीकी से देखें तो यह हमें गुलामी के दौर की तरफ़ ही खिंचती है।
एक बात विचार कीजिए कि आख़िर आदिवासी/जनजाति समाज अपना कोई विशेष दिवस 9 अगस्त को क्यों मनाए? मतलब मैं यह जानना चाहता हूँ कि यह दिन पर जनजाति समाज के लिए किस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है? क्या आप में से कोई बता सकता है?क्या यह दिन आदिवासी/जनजाति समाज के लिए कोई गौरव का क्षण लेकर आया था? क्या किसी जनजातीय योद्धा या वीरांगना की इस दिन जयंती या पुण्यतिथि होती है?
इसका उत्तर है, नहीं! ऐसा कुछ भी नहीं है इस दिवस पर।
फिर क्या है इस 9 अगस्त की सच्चाई? वास्तव में यह इस 9 अगस्त का भारत के जनजातियों और पूरे विश्व के मूलनिवासियों से कोई लेना-देना नहीं है।
दरअसल अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा बनाए गए एक संगठन (वर्किंग ग्रुप फ़ॉर इंडिजिनस पीपल-WGIP) की पहली बैठक 9 अगस्त, 1982 को बुलाई गई थी, केवल इसलिए इस दिन को विश्व मूलनिवासी दिवस के रूप में घोषित किया गया है।
इसका मतलब यही है कि इस दिन का दुनिया के किसी भी मूलनिवासी की संस्कृति, इतिहास, परंपरा या सभ्यता से सम्बंध नहीं है।
अब बात आती है कि इसे मनाया कब से जा रहा है, तो इसका उत्तर है कि इसकी घोषणा तो 1994 में हो चुकी थी, लेकिन भारत में इसका विस्तार पिछले एक दशक से हुआ है।
इसका एक बड़ा कारण यह भी रहा है कि आदिवासी/जनजाति समाज के पास अपना कोई एक ऐसा दिवस नहीं था, जिसे वह सामूहिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर मना सकते थे।
हालांकि इसमें समाज के साथ-साथ सरकारों का भी उतना ही दोष है, जिन्होंने कभी इस नजरिए से जनजाति समाज के लिए विचार ही नहीं किया। हालांकि समाज की मांगों के बाद तीन वर्ष पहले वर्ष 2021 में राष्ट्रीय स्तर पर 'जनजातीय गौरव दिवस' मनाने की घोषणा की।
जनजातीय गौरव दिवस अब हर साल 15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर मनाया जा रहा है, जो इस वर्ष भी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाएगा।
अब ऐसे में हमें एक समाज के रूप में यह भी सोचना चाहिए कि जिन कार्यक्रमों में हमारे आदिवासियों/जनजातियों की कोई वास्तविक पहचान नहीं है, क्या उसे बढ़ावा देना चाहिए?
क्या एक ऐसे दिवस का उत्सव हमें मनाना चाहिए जिसे विदेशियों ने अपनी सहूलियत के लिए घोषित किया, जिसका भारत के आदिवासियों/जनजातियों से कोई लेना-देना नहीं है?
विश्व मूलनिवासी दिवस भारतीय जनजातियों के लिए उत्सव का नहीं, बल्कि एक संवेदना का दिवस मात्र होना चाहिए, जिसके तहत हम विश्व के सभी मूलनिवासियों पर आक्रमणकारियों द्वारा किए गए अत्याचारों के प्रति विरोध एवं मूलनिवासियों के प्रति संवेदना प्रकट करते हैं।
इस दिवस का हमारे समाज में कोई औचित्य नहीं है। हमारे लिए भगवान बूढ़ादेव, बड़ादेव महत्त्वपूर्ण है, हमारे लिए बिरसा मुंडा, वीर नारायण सिंह, गुण्डाधुर, गेंद सिंह, टंट्या मामा और रानी दुर्गावती महत्त्वपूर्ण हैं।
हमें अपने जनजातीय/आदिवासी वीरों को, वीरांगनाओं को याद करना है, उनकी स्मृति में दिवसों की घोषणा करवानी है, उनके जयंती पर उत्सव मनाना है।
हमें यही संकल्प करना है कि हमारे पुरखों ने विदेशी आक्रमणकारियों की गुलामी की जिन जंजीरों को तोड़ा था, हम दोबारा उसमें ना फंस जाएँ।
एक तरफ़ जहाँ जनजाति समाज जनजातीय गौरव दिवस को लेकर उत्साहित, आल्हादित एवं प्रसन्न है, वहीं अब पूरे भारतीय समाज को जनजातीय वीरों की गाथाएँ सुनाने का यह सुअवसर भी है।
यही कारण है कि जनजाति समाज को अब आदिवासी, मूलनिवासी जैसे इन बेमतलब की बहसों से निकल कर तत्काल विकास के पथ पर बढ़ना है और समाज को गतिमान बनाए रखना है।
इस बात में कोई शक नहीं है कि मानव सभ्यता की सर्वाधिक रचनात्मक दृष्टि और संस्कृति, दोनों जनजाति समाज के पास ही मौजूद है, पर अब इसके नाम पर होने वाले शाब्दिक और परिणामविहीन बहस को अब विराम देने का समय आ चुका है।