घाटी से निर्वासन: कैसे कश्मीर से उजड़ गया कश्मीरी पंडित समुदाय?

19 Jan 2026 00:58:48
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कश्मीर की धरती ने सदियों से संस्कृति, ज्ञान और सह-अस्तित्व की मिसाल दी। इसी भूमि पर कश्मीरी पंडितों ने अपनी आस्था, परंपरा और बौद्धिक विरासत को सहेजा। लेकिन 1990 का दशक इस समुदाय के लिए अभिशाप बनकर आया। उस दौर में कश्मीरी पंडितों का पलायन किसी एक दिन की घटना नहीं था। यह वर्षों से बढ़ती हिंसा, भय और सुनियोजित अत्याचारों का परिणाम बना। इस त्रासदी ने भारत के इतिहास पर एक गहरी और दर्दनाक लकीर खींच दी।
 
कश्मीरी पंडित कश्मीर की सामाजिक संरचना का अभिन्न हिस्सा रहे। उन्होंने शिक्षा, प्रशासन, साहित्य और संस्कृति में अहम भूमिका निभाई। लेकिन 1980 के दशक के अंत में घाटी का माहौल तेजी से बदला। अलगाववादी विचारधारा ने जोर पकड़ा। कुछ राजनीतिक समूहों ने लोकतांत्रिक रास्ता छोड़कर हथियारों का सहारा लिया। पाकिस्तान से प्रशिक्षित और समर्थित आतंकी संगठनों ने इस असंतोष को हिंसा में बदल दिया। 1987 के विधानसभा चुनावों को लेकर फैले विवाद ने आग में घी का काम किया। इसके बाद आतंकियों ने खुलेआम धमकियां देनी शुरू कर दीं।
 
जनवरी 1990 में हालात पूरी तरह बिगड़ गए। 19 जनवरी की रात ने कश्मीरी पंडितों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से खुलेआम नारे गूंजे। आतंकियों ने साफ संदेश दिया कि धर्म बदलो, घाटी छोड़ो या मौत के लिए तैयार रहो। इस डरावने आदेश ने पूरे समुदाय को दहशत में डाल दिया। इसके बाद हत्याएं, अपहरण और महिलाओं के साथ घिनौनी घटनाएं सामने आईं। आतंकियों ने चुन-चुनकर पंडितों को निशाना बनाया और भय का माहौल बनाया।
 
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दिसंबर 1989 में वकील प्रेमनाथ भट्ट की हत्या ने खतरे की घंटी बजा दी। इसके बाद 25 जनवरी 1990 को स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना और उनके साथियों की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया। आतंकियों ने शिक्षिका गिरिजा टिक्कू के साथ जो किया, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया। इन घटनाओं ने साफ दिखा दिया कि हिंसा किसी आवेग का नतीजा नहीं थी। आतंकियों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत पूरे समुदाय को खत्म करने की कोशिश की।
 
इस हिंसा के पहले चरण में सैकड़ों कश्मीरी पंडितों की जान गई। कई संगठनों और शोधकर्ताओं ने मृतकों की संख्या कहीं अधिक बताई। भय और असुरक्षा ने पंडित परिवारों को घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया। साल 1990 के अंत तक करीब तीन लाख पचास हजार पंडित घाटी से पलायन कर चुके थे। उन्होंने जम्मू, दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में शरण ली। यह पलायन केवल भौगोलिक बदलाव नहीं था। इसने उनकी पहचान, संस्कृति और आत्मसम्मान को गहरा आघात पहुंचाया।
 
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शरणार्थी शिविरों में पंडितों ने अमानवीय हालात झेले। तंग टेंट, भीषण गर्मी और सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने जीवन बिताया। कई लोगों ने बीमारी और मानसिक तनाव के कारण जान गंवाई। फिर भी इस समुदाय ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी भाषा, रीति-रिवाज और संस्कारों को जीवित रखा। लेकिन घाटी में उनकी अनुपस्थिति ने कश्मीर की सामाजिक तस्वीर बदल दी। मंदिर टूटे, घर जला दिए गए और संपत्तियों पर अवैध कब्जे हुए। एक समृद्ध और जीवंत समुदाय लगभग खत्म हो गया।
 
सबसे पीड़ादायक तथ्य यह रहा कि किसी ने इन अपराधों के दोषियों को सजा नहीं दी। सैकड़ों हत्याएं और अन्य अपराध अदालतों तक नहीं पहुंचे। पीड़ित परिवार आज भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे। उस समय केंद्र में वी.पी. सिंह और जम्मू-कश्मीर में फारूक अब्दुल्ला की सरकार थी। आलोचकों ने दोनों सरकारों पर सुरक्षा में नाकामी का आरोप लगाया। समय रहते कड़े कदम न उठाने से हालात हाथ से निकल गए।
 
 
राज्य सरकार ने लगातार मिल रही चेतावनियों के बावजूद पंडितों की सुरक्षा के लिए ठोस व्यवस्था नहीं की। दोषियों की गिरफ्तारी में ढिलाई ने आतंकियों के हौसले बढ़ाए। इस लापरवाही ने पंडितों के मन में गहरे विश्वासघात की भावना पैदा की। वर्षों बाद सरकारी आंकड़ों में मृतकों की संख्या कम बताई गई, जबकि अन्य स्रोत कहीं अधिक संख्या की ओर इशारा करते हैं। यह अंतर भी पीड़ा को और बढ़ाता है।
 
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समय-समय पर कश्मीरी पंडितों की पीड़ा पर चर्चा हुई। हाल के वर्षों में फिल्मों और सार्वजनिक बहसों ने इस मुद्दे को फिर से सामने रखा। इन चर्चाओं ने समाज को झकझोरा, लेकिन साथ ही मतभेद भी उजागर किए। वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद कुछ पंडितों में वापसी की उम्मीद जगी। फिर भी अधिकतर लोग अब भी असुरक्षा महसूस करते हैं। केवल कानूनी बदलाव से भरोसा नहीं बनता।
 
 
कश्मीरी पंडितों का पलायन हमें चेतावनी देता है कि राजनीति और हिंसा समाज को कितनी बड़ी कीमत चुकाने पर मजबूर कर सकती है। यह त्रासदी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और न्याय की आवश्यकता को रेखांकित करती है। यह कहानी केवल अतीत का अध्याय नहीं है। यह मानवाधिकार, न्याय और संवेदना की कसौटी है। यदि समाज इस पीड़ा से सबक ले और ईमानदार प्रयास करे, तभी इतिहास खुद को दोहराने से रुकेगा।
 
लेख
शोमेन चंद्र
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