
पश्चिम बंगाल में गंगा की दो प्रमुख धाराएँ हुगली और पद्मा समुद्र की ओर बढ़ते हुए जहाँ मिलती हैं, उसी क्षेत्र में सुंदरबन का एक दलदली और निर्जन द्वीप है मरीचझापी। यहीं 1979 में पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वामपंथी सरकार के शासनकाल में हजारों हिंदू शरणार्थियों पर ऐसा दमन किया गया, जिसे स्वतंत्र भारत के सबसे भयावह और अनकहे अध्यायों में गिना जाना चाहिए।

इस त्रासदी की जड़ें भारत विभाजन में हैं। 1947 का विभाजन केवल भूगोल का नहीं, बल्कि असंख्य परिवारों के जीवन और भविष्य का विभाजन था। पश्चिमी हिस्से में कुछ समय बाद हालात अपेक्षाकृत सामान्य हो गए, लेकिन पूर्वी क्षेत्र, तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान, में सांप्रदायिक हिंसा और हिंदुओं का उत्पीड़न लंबे समय तक जारी रहा। इसी कारण वहां से हिंदू आबादी का विस्थापन लगातार होता रहा।
बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) से आने वाले इन हिंदू शरणार्थियों में बड़ी संख्या उन लोगों की थी जिन्होंने 1946 के जनमत संग्रह में विभाजन का विरोध किया था। इसके बावजूद, बाद में भारत आने के कारण उन्हें नागरिकता से वंचित रखा गया।
1971 के युद्ध के दौरान एक करोड़ से अधिक शरणार्थी भारत आए, जिनमें अधिकांश अनुसूचित जाति समुदाय से थे। इन्हें अस्थायी शिविरों में रखा गया, लेकिन नागरिकता का प्रश्न टाल दिया गया।

वामपंथी दल, जो स्वयं को गरीबों, मजदूरों और वंचितों का प्रतिनिधि बताते थे, सत्ता में आने से पहले शरणार्थियों को नागरिकता देने का वादा करते रहे। 1977 में सत्ता संभालने के बाद भी यह आश्वासन दोहराया गया।
इसी भरोसे पर दंडकारण्य, असम और अन्य क्षेत्रों में बसे अनेक बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थी पश्चिम बंगाल लौट आए। जब उन्हें कोई सरकारी सहायता नहीं मिली, तो उन्होंने सुंदरबन के मरीचझापी द्वीप को अपना आश्रय बनाया।
इन शरणार्थियों ने वहां खेती शुरू की, अस्थायी विद्यालय और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था की। लेकिन सरकार ने इसे अवैध बसावट बताते हुए द्वीप को खाली कराने का निर्णय लिया।
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जनवरी 1979 में मरीचझापी में लगभग 40,000 शरणार्थी रह रहे थे। 26 जनवरी को पूरे द्वीप में धारा 144 लागू कर दी गई और सैकड़ों मोटरबोट व जहाजों से उसकी घेराबंदी कर दी गई। दवा, अनाज और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति रोक दी गई। पीने के पानी के एकमात्र स्रोत में भी जहर मिला दिया गया।
31 जनवरी 1979 को पुलिस फायरिंग का आदेश दिया गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शुरुआती कार्रवाई में ही सैकड़ों लोग मारे गए, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में केवल दो मौतें दर्ज की गईं। इसके बाद महीनों तक दमन जारी रहा। घरों और दुकानों को जलाया गया, महिलाओं के साथ बलात्कार हुए और बड़ी संख्या में लोगों की हत्या कर उनके शव नदी और समुद्र में फेंक दिए गए। जो बच गए, उन्हें जबरन ट्रकों में भरकर अन्य स्थानों पर भेज दिया गया।
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लेखक मनोरंजन व्यापारी के अनुसार यह ऐसा नरसंहार था, जिसने सुंदरबन के बाघों को आदमखोर बना दिया। अनुमान है कि इस अभियान में लगभग 10,000 हिंदू शरणार्थियों की जान गई, जिनमें अधिकांश अनुसूचित जाति समुदाय से थे। इस पूरे प्रकरण को दबाने और इतिहास से लगभग मिटा देने में तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था की भी भूमिका रही।
मरीचझापी की घटना का सबसे विस्तृत और प्रमाणिक विवरण दीप हालदार की पुस्तक द ब्लड आइलैंड में मिलता है। पुस्तक के अनुसार जो कुछ मरीचझापी में हुआ, वह स्वतंत्र भारत में मानवाधिकारों के सबसे गंभीर उल्लंघनों में से एक था।
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यह त्रासदी जलियांवाला बाग नरसंहार जितनी ही जघन्य थी, लेकिन इसे कभी राष्ट्रीय विमर्श में वह स्थान नहीं मिला, जिसकी यह हकदार थी। न तो इस पर व्यापक सवाल उठे और न ही जिम्मेदारों से जवाबदेही तय हुई।
मरीचझापी आज भी एक ऐसा घाव है, जो यह याद दिलाता है कि सत्ता, विचारधारा और राजनीतिक स्वार्थ जब मानवता से ऊपर रखे जाते हैं, तो परिणाम कितना विनाशकारी हो सकता है।