उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन का जन्मदिन 8 जनवरी को आता है। दुनिया के कई देशों में जन्मदिन उत्सव, शुभकामनाओं और आत्ममंथन का अवसर बनता है। लेकिन उत्तर कोरिया में यह तारीख सत्ता के प्रदर्शन, सरकारी आयोजनों और अनिवार्य वफादारी का प्रतीक बनती है। इस दिन पूरा देश एक ऐसे शासक के नाम पर झुकता है, जिसकी सत्ता ने राष्ट्र को बाहरी दुनिया से काट दिया और अपने ही नागरिकों को भय की स्थायी छाया में जीने को मजबूर किया।
किम जोंग उन ने सत्ता संभालते ही खुद को एक सर्वशक्तिमान नेता के रूप में स्थापित किया। उन्होंने सेना, पार्टी और प्रशासन को पूरी तरह अपने नियंत्रण में रखा। उन्होंने असहमति की हर आवाज को कुचला और भय को शासन का सबसे प्रभावी औजार बनाया। उत्तर कोरिया में सरकार हर नागरिक की गतिविधियों पर नजर रखती है। राज्य का निगरानी तंत्र हर गली, हर घर और हर बातचीत तक पहुंच बनाता है। लोग खुलकर बोलने की कल्पना भी नहीं करते। माता पिता अपने बच्चों को चुप रहना सिखाते हैं। दोस्त दोस्त पर भरोसा नहीं करते। परिवारों के बीच भी संदेह जन्म लेता है।
सरकार नागरिकों को बचपन से ही नेता की पूजा करना सिखाती है। स्कूलों में बच्चे किम परिवार के गुणगान के पाठ पढ़ते हैं। वे सवाल पूछने की आदत नहीं सीखते। वे आज्ञाकारिता को ही जीवन का मूल मंत्र मानते हैं। कोई भी व्यक्ति यदि निजी बातचीत में भी शासन पर सवाल उठाता है, तो वह खुद को और अपने पूरे परिवार को खतरे में डाल देता है। उत्तर कोरिया में सामूहिक दंड की नीति चलती है। एक व्यक्ति की कथित गलती पूरे खानदान को जेल तक पहुंचा देती है।
इस दमनकारी व्यवस्था का सबसे भयावह चेहरा क्वालिसो नामक श्रम शिविरों में दिखता है। ये शिविर नक्शों पर नहीं दिखते, लेकिन हजारों परिवारों की जिंदगी इन्हीं दीवारों के भीतर खत्म होती है। सरकार मामूली आरोपों पर लोगों को इन शिविरों में भेज देती है। विदेशी रेडियो सुनने, पर्याप्त श्रद्धा न दिखाने या भागने की कोशिश जैसे आरोप यहां मौत का फरमान बन जाते हैं। इन शिविरों में कैदियों से अमानवीय श्रम कराया जाता है। पहरेदार उन्हें पीटते हैं। भूख उन्हें तोड़ देती है। बीमारियां उन्हें निगल जाती हैं। मौत यहां एक आम घटना बन चुकी है।
खाद्य संकट उत्तर कोरिया की दूसरी बड़ी सच्चाई है। सत्ता के केंद्र प्योंगयांग में विशेष वर्ग सुविधाओं का आनंद लेता है। वहीं गांवों और सीमावर्ती इलाकों में लोग भूख से लड़ते हैं। 1990 के दशक में आए भीषण अकाल ने लाखों जानें लीं। सरकार ने उस त्रासदी से कोई ठोस सबक नहीं लिया। आज भी राज्य राशन प्रणाली आम नागरिकों की जरूरतें पूरी नहीं कर पाती। लोग अवैध बाजारों पर निर्भर रहते हैं। वे जोखिम उठाकर खाना खरीदते हैं। पकड़े जाने पर वे कठोर सजा झेलते हैं।
माता पिता खुद भूखे रहकर बच्चों को खिलाने की कोशिश करते हैं। इसके बावजूद कुपोषण बच्चों के शरीर पर साफ दिखता है। कमजोर शरीर, सूजे पेट और थकी आंखें उत्तर कोरिया की सड़कों की सच्चाई बयान करती हैं। सरकार इन तस्वीरों को दुनिया से छिपाने की हर संभव कोशिश करती है, लेकिन सच दीवारों के भीतर सांस लेता रहता है।
मानवाधिकारों की स्थिति उत्तर कोरिया में बेहद दयनीय है। सरकार अभिव्यक्ति की आजादी को अपराध मानती है। वह आवाजाही पर रोक लगाती है। वह धर्म को सत्ता के लिए खतरा मानती है। राज्य मीडिया हर समय प्रचार फैलाता है। वह किम परिवार को देवतुल्य दिखाता है और बाहरी दुनिया को शत्रु बताता है। नागरिक धीरे धीरे इस झूठ को पहचानते हैं, लेकिन वे सच बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
धार्मिक आस्था यहां सबसे बड़ा अपराध बन जाती है। ईसाई समुदाय विशेष रूप से उत्पीड़न झेलता है। सरकार किसी भी धार्मिक गतिविधि को राज्य विरोधी करार देती है। फिर भी कुछ लोग गुप्त रूप से प्रार्थना करते हैं। वे हर दिन गिरफ्तारी और मौत के डर के साथ जीते हैं। पकड़े जाने पर उन्हें यातना शिविरों में भेजा जाता है या सीधे मौत की सजा दी जाती है।
इन हालात में पलायन कई लोगों के लिए अंतिम उम्मीद बनता है। सीमा पर कड़ी निगरानी रहती है। सैनिक गोली चलाने में देर नहीं करते। इसके बावजूद कुछ लोग जान जोखिम में डालकर चीन की ओर भागते हैं। वहां भी उनकी परेशानी खत्म नहीं होती। चीनी प्रशासन उन्हें अवैध प्रवासी मानता है और वापस भेज देता है। लौटते ही वे कठोर दंड झेलते हैं। कई महिलाएं मानव तस्करी का शिकार बनती हैं। उन्हें जबरन शादियों और शोषण का सामना करना पड़ता है।
किम जोंग उन का जन्मदिन सत्ता के उत्सव के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इसी दिन देश की जनता खामोशी से अपना दर्द ढोती है। चमकदार परेड और सरकारी नारों के पीछे लाखों अनसुनी चीखें दब जाती हैं। यह जन्मदिन दुनिया को याद दिलाता है कि उत्तर कोरिया केवल परमाणु कार्यक्रम या सैन्य शक्ति की कहानी नहीं है। यह कहानी उन लोगों की भी है, जो भय, भूख और बेबसी में जीते हैं।
उत्तर कोरिया के नागरिक भी सम्मान, स्वतंत्रता और शांति के हकदार हैं। किम जोंग उन के जन्मदिन पर यही सबसे बड़ा सवाल उठता है कि क्या कभी यह राष्ट्र अपने ही लोगों को डर से मुक्त जीवन देगा।
लेख
शोमेन चंद्र