
देश में चुनावी पारदर्शिता, निर्वाचन आयोग की भूमिका और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे विवाद ने स्पष्ट रूप से रिजीम चेंज ऑपरेशन की सच्चाई सामने ला दी है। कांग्रेस, वामपंथी संगठनों और कुछ कम्युनिस्ट समहों से जुड़े विरोध प्रदर्शनों के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण की 'रिजीम चेंज’ की टिप्पणी ने इस षड्यंत्र को उजागर कर दिया है।

15 अक्टूबर के आसपास दिल्ली में हुई प्रेस वार्ता, नेहा बोरा की बांग्लादेश सम्बंधी टिप्पणी के बाद देश के सामने सवाल अब केवल चुनावी प्रक्रिया पर असहमति का नहीं है, बल्कि इस बात का भी है कि भारत में किसी निर्वाचित सरकार की वैधता को चुनौती देने के लिए किस प्रकार की राजनीतिक भाषा, जन लामबंदी और अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव का इस्तेमाल किया जा रहा है?

‘रिजीम चेंज’ सुनने में एक सामान्य राजनीतिक शब्द लग सकता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसका इस्तेमाल किसी देश की सत्ता या राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव के लिए किया जाता है। लेकिन जब यही शब्द किसी निर्वाचित सरकार के विरुद्ध आंदोलनों के संदर्भ में इस्तेमाल होता है, तब इसका अर्थ केवल अगला चुनाव जीतने की इच्छा तक सीमित नहीं रह जाता।
भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में इस अंतर को समझना बेहद जरूरी है। सरकार बदलने का अधिकार जनता के पास है। विपक्ष का काम सरकार की आलोचना करना, उसकी नीतियों का विरोध करना और चुनाव में उसे पराजित करने का प्रयास करना है।

लेकिन लोकतांत्रिक विरोध और किसी सरकार को चुनावी प्रक्रिया से बाहर जाकर हटाने की राजनीतिक रणनीति के बीच की सीमा को केवल नारों के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक गतिविधियों, सार्वजनिक बयानों, वित्तीय संबंधों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए। इस पूरे विवाद में कांग्रेस, वामपंथी संगठनों एवं समूहों और प्रशांत भूषण की टिप्पणी को गम्भीरता से लेना चाहिए।
प्रशांत भूषण ने दिल्ली में एक प्रेस वार्ता के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि आंदोलन अब ‘रिजीम चेंज’ की लड़ाई है। उन्होंने यह भी कहा कि वे रिजीम चेंज चाहते हैं। इस प्रेस वार्ता में सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके, कम्युनिस्ट स्टूडेंट विंग की नेता नेहा बोरा, कपिल सिब्बल और अन्य वामपंथी समूह भी मौजूद थे।

यहां अब एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है। यदि आंदोलन का उद्देश्य केवल मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को उजागर करना है, तो उसके घोषित लक्ष्य में रिजीम चेंज क्यों शामिल होता है? क्या यह सामान्य राजनीति है, या आंदोलन के पीछे एक व्यापक राजनीतिक षड्यंत्र भी है?
देखिए यह समझना आवश्यक है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में किसी निर्वाचित सरकार को बदलने की मांग अपने आप में असंवैधानिक नहीं है। भारत में विपक्ष का लक्ष्य चुनाव जीतकर सरकार बनाना हो सकता है। लेकिन जब कोई आंदोलन स्वयं को चुनावी प्रक्रिया की रक्षा तक सीमित बताता है और उसके प्रमुख चेहरे उसे सीधे ‘रिजीम चेंज’ की लड़ाई कहते हैं, तब यह समझना आवश्यक हो जाता है कि आख़िर यह लड़ाई सरकार से है या लोकतंत्र से?

वहीं कांग्रेस लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी की प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रही है। विपक्ष के रूप में उसका अधिकार है कि वह सरकार की नीतियों, निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
लेकिन कांग्रेस किसी ऐसे आंदोलन के साथ खड़ी होती है जिसके प्रमुख चेहरे ‘रिजीम चेंज’ की बात करते हैं, तो उसे स्पष्ट करना चाहिए कि वह सत्ता परिवर्तन को केवल चुनावी जनादेश के माध्यम से हासिल करने के पक्ष में है या आंदोलन के जरिए सरकार पर किसी आलोकतंत्रिक प्रकार का दबाव बनाने की रणनीति का भी समर्थन करती है?