चीन में भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के पुराने मामलों के बीच कम्युनिस्ट पार्टी ने अब चुप रहने वाले अफसरों पर कार्रवाई का संकेत दिया है, जिससे जिनपिंग की जवाबदेही नीति पर सवाल उठ रहे हैं।
आवाज उठाने वालों के साथ क्या हुआ?
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का नया संदेश है कि भ्रष्टाचार देखकर चुप रहना भी स्वीकार्य नहीं होगा। लेकिन इसी शासन के दौरान अधिकारियों की संपत्ति सार्वजनिक करने की माँग उठाने वाले नागरिकों को जेल भेजा गया था।
कानूनी कार्यकर्ता शू झियोंग इसका उदाहरण हैं। उनका न्यू सिटिजन्स मूवमेंट अधिकारियों की संपत्ति के खुलासे और नागरिक अधिकारों की माँग करता था। जनवरी 2014 में उन्हें सार्वजनिक व्यवस्था बाधित करने के लिए भीड़ जुटाने के आरोप में 4 साल की सजा मिली। ह्यूमन राइट्स वॉच ने इस कार्रवाई को भ्रष्टाचार के खिलाफ नागरिक विरोध दबाने का बहाना भी बताया था।
हालांकि अदालत ने उन्हें भ्रष्टाचार का विरोध करने के नाम पर सजा नहीं सुनाई थी। लेकिन मानवाधिकार संगठनों ने उनके अभियान और कार्रवाई के बीच सम्बन्ध पर सवाल भी उठाए थे। अप्रैल 2013 में भी अधिकारियों की संपत्ति सार्वजनिक करने की माँग कर रहे 4 कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर ह्यूमन राइट्स वॉच ने आपत्ति जताई थी।
अब चुप रहने वाले अधिकारी निशाने पर
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अब ऐसे अधिकारियों के खिलाफ सख्ती का संदेश दे रही है, जो गलत काम देखकर भी टकराव से बचते हैं। इनके लिए चीनी शब्द ‘लाओ हाओ रेन’ इस्तेमाल होता है। यहाँ इसका मतलब भला इंसान नहीं, बल्कि अपना पद और संबंध बचाने के लिए अनियमितता अनदेखा करने वाला अधिकारी है।
बीजिंग में 26 से 29 अक्टूबर तक हुई केंद्रीय समिति की बैठक में अपनाए गए प्रस्ताव ने इस रवैये का विरोध किया। अधिकारियों से गलतियों को सामने लाने और उन्हें सुधारने का साहस दिखाने को कहा गया है। संदेश है कि खुद भ्रष्टाचार न करना पर्याप्त नहीं, उसे रोकने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी।
जिम्मेदारी जरूरी, लेकिन कसौटी क्या है?
भ्रष्टाचार को जानबूझकर नजरअंदाज करने वाला अधिकारी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। उसकी चुप्पी से गलत काम करने वालों को संरक्षण मिलता है और नागरिकों का नुकसान होता है। इस आधार पर जवाबदेही तय करना प्रशासन की जरूरत है।
लेकिन सीसीपी के सामने सवाल अधिक गहरा है। यदि स्वतंत्र नागरिक भ्रष्टाचार पर अभियान चलाएँ तो उन पर कार्रवाई हो सकती है, जबकि पार्टी के भीतर अधिकारियों को बोलने का निर्देश मिलता है। इससे यह सवाल उठता है कि शासन भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज चाहता है या केवल अपने तय दायरे में उठने वाली आवाज़?
आलोचना भी नेतृत्व के नियंत्रण में?
शी जिनपिंग ने 2013 में इस व्यवस्था को फिर सक्रिय किया था। इसका इस्तेमाल अधिकारियों की आपसी निगरानी और वैचारिक अनुशासन बढ़ाने के लिए होता है।
ऐसी बैठकों की उपयोगिता इस बात से तय होगी कि उनमें कितना सच बोला जा सकता है। अपने अधीन काम करने वाले की गलती बताना और प्रभावशाली वरिष्ठ के फैसले पर सवाल उठाना अलग बातें हैं। अगर अधिकारियों को बोलने से पहले यह सोचना पड़े कि नेतृत्व क्या चाहता है, तो आत्म-आलोचना जिम्मेदारी निभाने का जरिया नहीं, बल्कि सिर्फ वफादारी दिखाने का एक तरीका बनकर रह जाती है।
नियंत्रण बढ़ाने से भ्रष्टाचार मिटेगा?
सरकारी विवरण के मुताबिक, हाल ही की बैठक ने भ्रष्टाचार विरोधी काम पर केंद्रीय नेतृत्व का केंद्रीकृत नियंत्रण मजबूत करने पर जोर दिया। पार्टी सत्ता के इस्तेमाल पर निगरानी बढ़ाने की बात भी कर रही है।
यही जिनपिंग के मॉडल की बुनियादी कमजोरी पर सवाल उठाता है। सत्ता के दुरुपयोग का समाधान फिर सत्ता का नियंत्रण बढ़ाना बताया जा रहा है। पार्टी की आंतरिक जाँच जरूरी हो सकती है, लेकिन नागरिक को ऐसी शिकायत व्यवस्था चाहिए जहाँ न्याय अधिकारी की राजनीतिक पहुँच पर निर्भर न हो।
इतने वर्षों की सख्ती के बाद भी संकट
चीनी सरकार के अनुसार, 2012 से अनुशासन और निगरानी संस्थाओं ने करीब 81 लाख मामले दर्ज किए और लगभग 79 लाख लोगों को दंडित किया। इसके बावजूद सरकारी अधिकारी भ्रष्टाचार की चुनौती को गंभीर और जटिल बताते हैं।
इतनी बड़ी कार्रवाई के बाद भी समस्या बनी रहना जिनपिंग से जवाब माँगता है। केवल दंड की संख्या गिनाना पर्याप्त नहीं। असली उपलब्धि तब होगी, जब रिश्वत की गुंजाइश घटे, शिकायतकर्ता सुरक्षित रहे और प्रभावशाली अधिकारियों की जाँच भी निष्पक्ष हो।
भ्रष्टाचार पर चुप्पी की जवाबदेही तय होनी चाहिए। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ स्वतंत्र आवाजों पर हुई कार्रवाई को भुलाकर सीसीपी की नई घोषणा स्वीकार नहीं की जा सकती। जिनपिंग को बताना होगा कि सच बोलने की सुरक्षा किसे मिलेगी? जवाबदेही तभी भरोसेमंद होगी, जब सवाल पूछने का अधिकार पार्टी की अनुमति और राजनीतिक सुविधा से आगे जाएगा।