बस्तर में टूटते "माओवादी जाल" की कहानी

01 Feb 2026 10:03:21


Representative Image
सुकमा जिले में चार इनामी नक्सलियों के हथियारों के साथ आत्मसमर्पण और बस्तर में सक्रिय हथियारबंद नक्सलियों की घटती संख्या केवल एक तात्कालिक घटना नहीं है। यह उस लंबे और जटिल प्रक्रिया का परिणाम है
, जिसमें सुरक्षा दबाव, प्रशासनिक हस्तक्षेप और जमीनी स्तर पर बदलती सामाजिक परिस्थितियों ने नक्सल संगठन की संरचना को भीतर से कमजोर किया है।


स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार बस्तर में इस समय 144 हथियारबंद नक्सली सक्रिय हैं, हालाँकि कुछ सूत्रों के अनुसार कुल संख्या इससे अधिक बताई जा रही है। इन आंकड़ों के पीछे छिपी कहानी यह संकेत देती है कि नक्सल संगठन अब समाप्ति के दौर से गुजर रहा है।


Representative Image

माओवादी-नक्सल संगठन की सैन्य क्षमता हमेशा उसकी भौगोलिक बढ़त पर निर्भर रही है। जंगलों में निर्बाध आवाजाही, सुरक्षित ठिकाने और स्थानीय नेटवर्क के सहारे उसने दशकों तक सुरक्षा बलों को चुनौती दी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह संतुलन तेजी से बदला है।


बस्तर और दक्षिण बस्तर के दूरस्थ इलाकों में सुरक्षा कैंपों, फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस और सड़क नेटवर्क के विस्तार ने उन रास्तों को माओवादियों के लिए असुरक्षित कर दिया है, जिन पर नक्सली निर्भर थे। सुरक्षा बलों की निरंतर मौजूदगी ने न केवल उनकी गतिविधियों को सीमित किया, बल्कि उन्हें छोटे और बिखरे समूहों में काम करने को मजबूर किया।


सुकमा में हालिया आत्मसमर्पण इस दबाव का स्पष्ट उदाहरण है। जिन नक्सलियों ने हथियार डाले, उनके पास आधुनिक और पारंपरिक दोनों तरह के हथियार थे। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि लगातार ऑपरेशन, इलाके में बढ़ी निगरानी और मूवमेंट पर रोक ने इन नक्सलियों के सामने विकल्प सीमित कर दिए थे।


यह भी देखें - 



यह संकेत देता है कि हथियार और रसद की आपूर्ति अब पहले जैसी सहज नहीं रही। जिन चैनलों के जरिए कभी हथियार और गोला बारूद पहुंचता था, वे या तो टूट चुके हैं या लगातार निगरानी में हैं।


नक्सल संगठन की ताकत केवल हथियार नहीं, बल्कि स्थानीय समर्थन भी रहा है। गांवों से मिलने वाला भोजन, आश्रय और सूचनाएं उसकी जीवनरेखा थीं। हाल के वर्षों में यह आधार कमजोर पड़ा है। सड़क, मोबाइल कनेक्टिविटी, स्वास्थ्य सेवाएं और सरकारी योजनाएं उन इलाकों तक पहुंची हैं, जहां पहले राज्य की मौजूदगी नाम मात्र की थी।


“जब ग्रामीणों के सामने विकास और सुरक्षा का ठोस विकल्प आया, तो नक्सलियों के प्रति डर और मजबूरी से उपजा समर्थन धीरे धीरे कम होने लगा। कई गांवों में यह बदलाव खुलकर दिख रहा है, जहां लोग अब सुरक्षा बलों के साथ सहयोग करने लगे हैं।”


नेतृत्व स्तर पर भी माओवादी संगठन को लगातार झटके लगे हैं। कई अनुभवी कमांडर या तो मारे गए हैं, गिरफ्तार हुए हैं या आत्मसमर्पण कर चुके हैं। इससे कमांड और नियंत्रण की व्यवस्था कमजोर हुई है। निचले स्तर के कैडर के लिए यह संदेश साफ है कि संगठन अब उन्हें पहले जैसी सुरक्षा नहीं दे सकता। इसी का असर भर्ती पर पड़ा है। स्थानीय परिवार अब अपने युवाओं को इस रास्ते पर भेजने से हिचक रहे हैं, क्योंकि जोखिम अधिक और भविष्य अनिश्चित हो गया है।


खुफिया तंत्र की भूमिका भी इस बदलाव में महत्वपूर्ण रही है। स्थानीय स्तर पर सूचना तंत्र को मजबूत करने और ग्रामीण इलाकों में भरोसे का माहौल बनाने से सुरक्षा बलों को सटीक जानकारियां मिलने लगीं।


संयुक्त अभियानों में इस खुफिया जानकारी का प्रभावी इस्तेमाल हुआ, जिससे नक्सलियों के ठिकाने और मूवमेंट पैटर्न उजागर हुए। यह वह क्षेत्र था जहां कभी नक्सली बढ़त में थे, लेकिन अब वही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बनता जा रहा है।


यह भी देखें - 



सरकार की पुनर्वास नीति ने भी संगठन के भीतर असंतोष को बढ़ाया है। आत्मसमर्पण करने वालों के लिए घोषित प्रोत्साहन, पुनर्वास पैकेज और सुरक्षा की गारंटी ने कई नक्सलियों को हिंसा छोड़ने का व्यावहारिक रास्ता दिखाया है।


इन बाहरी दबावों के साथ संगठन के भीतर वैचारिक और संरचनात्मक दरारें भी उभर रही हैं। संसाधनों की कमी और लगातार नुकसान ने गुटबाजी को जन्म दिया है। छोटे समूहों के बीच अविश्वास बढ़ा है, जिसका नतीजा कई बार आपसी टकराव या अलगाव के रूप में सामने आता है।


इन सभी कारकों का संयुक्त प्रभाव यह है कि बस्तर में नक्सल खतरे का स्वरूप बदल रहा है। बड़े और संगठित हमलों की जगह अब छोटे और सीमित जोखिम वाले समूह दिखाई दे रहे हैं। हालांकि इसे पूर्ण अंत मानना जल्दबाजी होगी।


यह भी देखें - 

 
 

आने वाले समय में असली चुनौती केवल सुरक्षा अभियानों की नहीं, बल्कि स्थायी शांति की होगी। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को जमीन पर उतारना जरूरी है, ताकि हिंसा की ओर लौटने की कोई गुंजाइश न रहे। मिशन आधारित योजनाएं तभी सफल होंगी जब उनका क्रियान्वयन पारदर्शी और निरंतर होगा।


बस्तर में नक्सल संगठन के कमजोर पड़ने की यह कहानी अभी अधूरी है, लेकिन संकेत साफ हैं कि दशकों पुराना जाल अब सिमट रहा है। यह प्रक्रिया तभी निर्णायक रूप लेगी, जब राज्य की मौजूदगी केवल बंदूक तक सीमित न रहकर भरोसे और विकास में भी दिखाई देगी।

Powered By Sangraha 9.0