"हम दो, हमारे दो दर्जन" की राजनीति: जनसंख्या शक्ति का दावा या सामाजिक असंतुलन का खतरा?

24 बच्चों की वकालत कर शौकत अली ने विकास के बजाय संख्या की दौड़ को बढ़ावा दिया।

    11-Feb-2026
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उत्तर प्रदेश में एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने मुरादाबाद में 9 फरवरी 2026 को "हम दो, हमारे दो दर्जन" का नारा देकर तीखी बहस छेड़ दी। उन्होंने प्रति दंपति 24 बच्चों की बात कही और जनसंख्या वृद्धि को "कौमी ताकत" से जोड़ने की कोशिश की। इस बयान ने समाज और देशहित दोनों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
 
मंच से बड़े परिवार को धार्मिक जिम्मेदारी जैसा रूप दिया गया। अपने परिवार का उदाहरण पेश कर अधिक बच्चों को सामान्य बताने की कोशिश हुई। लेकिन देश संतुलित जनसंख्या की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में 24 बच्चों का आह्वान सामाजिक और आर्थिक यथार्थ से कटा हुआ नजर आता है। एक साधारण परिवार दो बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य के लिए ही संघर्ष करता है। ऐसे में दो दर्जन बच्चों की परवरिश की कल्पना भी कठिन लगती है।
 
भाषण में जनसंख्या को शक्ति का प्रतीक बताया गया और चीन का उदाहरण दिया गया। लेकिन चीन ने वर्षों तक कठोर जनसंख्या नियंत्रण नीति लागू की। आज वही देश घटती युवा आबादी और बढ़ती बुजुर्ग संख्या की चुनौती झेल रहा है। किसी राष्ट्र की ताकत केवल संख्या से तय नहीं होती। शिक्षा, कौशल, उद्योग और तकनीक विकास की असली आधारशिला बनाते हैं। यदि आबादी तेजी से बढ़े और संसाधन सीमित रहें, तो बेरोजगारी और गरीबी बढ़ती है। इससे सामाजिक असंतोष भी जन्म लेता है।

 
इसके अलावा, बयान में बहुसंख्यक समाज पर तंज कसकर जन्म दर को प्रतिस्पर्धा की तरह पेश किया गया। ऐसी भाषा समाज में अविश्वास पैदा करती है। भारत विविधताओं से भरा देश है। यहां सभी धर्म और समुदाय साथ रहते हैं। इसलिए नेतृत्व को जिम्मेदारी के साथ बोलना चाहिए। संख्या की दौड़ का संदेश सामाजिक संतुलन को कमजोर करता है।
 
दंगों और असुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए यह दावा किया गया कि एक समुदाय ने अधिकतर दंगों में पीड़ित की भूमिका निभाई। लेकिन पूरी तस्वीर केवल एक पक्ष से नहीं बनती। देश के इतिहास में कई घटनाओं में कट्टर तत्वों की भूमिका भी सामने आई। यदि कोई नेता केवल चयनित तथ्यों को पेश करता है, तो वह सच्चाई को अधूरा दिखाता है। इस तरह का विमर्श समाज को और अधिक विभाजित करता है।
 
 
सबसे बड़ा विरोधाभास तब दिखता है जब असुरक्षा की बात करते हुए जनसंख्या संतुलन बदलने का खुला आह्वान किया जाता है। यदि कोई स्वयं को असुरक्षित मानता है, तो उसे संवाद और विश्वास की राह अपनानी चाहिए। जनसंख्या बढ़ाने का नारा सुरक्षा का समाधान नहीं बन सकता। सुरक्षा कानून व्यवस्था और सामाजिक एकता से आती है।
 
भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है। परिवार नियोजन और जनजागरूकता के जरिए देश ने लंबे समय तक संतुलित समाज का लक्ष्य रखा है। महिलाओं की शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता मिली है। बार-बार गर्भधारण से मातृ स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। इसलिए जिम्मेदार नेतृत्व वही कहलाता है जो महिलाओं के सम्मान और बच्चों के बेहतर भविष्य की चिंता करे।
 
 
स्पष्ट है कि "हम दो, हमारे दो दर्जन" जैसा नारा राष्ट्र निर्माण की दिशा में मदद नहीं करता। यह समाज को संख्या की प्रतिस्पर्धा में उलझाता है। देश को गुणवत्ता आधारित विकास चाहिए। शिक्षित युवा, सशक्त महिलाएं और संतुलित परिवार ही मजबूत भारत की नींव रखेंगे। उकसावे की राजनीति तात्कालिक चर्चा तो पैदा करती है, लेकिन दीर्घकाल में वह समाज को अस्थिर ही करती है।
 
लेख
शोमेन चंद्र