2 फरवरी को नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट का
दरवाजा खटखटाकर देश के कई राज्यों में लागू कन्वर्जन विरोधी कानूनों को कमजोर करने की कोशिश की। ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों ने समाज की सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता की वास्तविक भावना को बनाए रखने के लिए ये कानून बनाए। अब इन्हीं कानूनों को चुनौती देकर चर्च संगठन देश की सामाजिक संरचना पर सीधा प्रहार कर रहा है।
नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज खुद को 1.4 करोड़ लोगों का प्रतिनिधि बताती है और 32 चर्चों व कई क्षेत्रीय परिषदों का दावा करती है। इसी दावे के सहारे संगठन ने यह दिखाने का प्रयास किया कि कन्वर्जन विरोधी कानून अल्पसंख्यकों को डराते हैं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा, लेकिन इस प्रक्रिया ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या संगठित मिशनरी गतिविधियों पर रोक लगाना गलत है।
वरिष्ठ अधिवक्ता के माध्यम से परिषद ने यह आरोप लगाया कि इन कानूनों से कथित तौर पर तथाकथित निगरानी समूहों को बढ़ावा मिलता है। लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग दिखती है। राज्यों ने ये कानून किसी समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं बनाए, बल्कि लालच, दबाव और धोखे से हो रहे कन्वर्जन को रोकने के लिए लागू किए। धर्म परिवर्तन की स्वतंत्रता और धर्म परिवर्तन कराने की साजिश के बीच का फर्क जानबूझकर धुंधला किया जा रहा है।
केंद्र सरकार ने इस याचिका का सख्ती से विरोध किया। सॉलिसिटर जनरल ने साफ कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही 1977 के ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कर चुका है कि किसी को जबरन या प्रलोभन देकर धर्म बदलवाने का अधिकार संविधान नहीं देता। संविधान धर्म के प्रचार की अनुमति देता है, लेकिन किसी अन्य व्यक्ति को अपने धर्म में बदलने का अधिकार नहीं देता। इसके बावजूद चर्च संगठन उसी मुद्दे को नए शब्दों में पेश कर रहे हैं।
असल समस्या कन्वर्जन के उस संगठित नेटवर्क की है, जो गरीबों, जनजातियों और
कमजोर वर्गों को निशाना बनाता है। तथाकथित प्रार्थना सभाओं, चमत्कारी इलाज और आर्थिक सहायता के नाम पर लोगों को बहकाया जाता है। कई मामलों में हिंदू देवी देवताओं और परंपराओं का अपमान करके मानसिक दबाव बनाया जाता है। यह केवल धार्मिक मुद्दा नहीं रहता, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक आक्रमण बन जाता है।
आंकड़े इस खतरे को और स्पष्ट करते हैं। साल 2026 की शुरुआत में ही कई राज्यों से अवैध ईसाई कन्वर्जन के दर्जनों मामले सामने आए। पिछले वर्ष सैकड़ों घटनाएं रिपोर्ट हुईं, जिनमें उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश शीर्ष पर रहे। यह संख्या केवल दर्ज मामलों की है। जमीनी स्तर पर इससे कहीं अधिक घटनाएं सामने आती हैं, जो डर या दबाव के कारण रिपोर्ट नहीं हो पातीं।
राजस्थान के श्रीगंगानगर का मामला इस सच्चाई को उजागर करता है। वहां एक घर के अंदर अवैध चर्च चलाकर लोगों को पैसों का लालच देकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया। विदेशी नागरिकों की संदिग्ध गतिविधियों ने सीमावर्ती क्षेत्र की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े किए। ऐसे मामलों ने यह दिखाया कि कन्वर्जन केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा मुद्दा बन चुका है।
पंजाब जैसे राज्यों में भी स्वयंसेवी संगठन लगातार चेतावनी दे रहे हैं। हजारों तथाकथित पादरी चमत्कार और इलाज के नाम पर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। जनगणना के आंकड़ों में ईसाई आबादी में असामान्य वृद्धि ने इन आशंकाओं को और मजबूत किया है। यह बदलाव स्वाभाविक नहीं लगता, बल्कि संगठित प्रयास का परिणाम दिखाई देता है।
कन्वर्जन विरोधी कानूनों का उद्देश्य किसी धर्म को दबाना नहीं है। इनका उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना है। जब कोई संगठन लालच, भय या धोखे से किसी की आस्था बदलवाता है, तब वह संविधान की भावना को कुचलता है। ऐसे में इन कानूनों को कमजोर करना सीधे तौर पर अवैध गतिविधियों को बढ़ावा देना होगा।
भारत हजारों वर्षों से अपनी सभ्यता और परंपराओं के साथ खड़ा रहा है। बाहरी आक्रमणों और दमन के बावजूद इस देश ने अपनी पहचान बचाए रखी। आज मिशनरी नेटवर्क और उनके समर्थक धर्म की स्वतंत्रता की आड़ में उसी पहचान को चोट पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका इसी रणनीति का हिस्सा दिखती है।
समाज और सरकार को सतर्क रहना होगा। अवैध कन्वर्जन के खिलाफ बने कानूनों को कमजोर करने की किसी भी कोशिश का मजबूती से विरोध करना होगा। यही देश की सांस्कृतिक जड़ों, सामाजिक संतुलन और राष्ट्रीय सुरक्षा की सच्ची रक्षा है।
लेख
शोमेन चंद्र