राष्ट्रपति का अपमान: लोकतंत्र पर आघात

राष्ट्रपति के स्वागत में शिष्टाचार की कमी ने यह बहस तेज की कि क्या ममता बनर्जी का राजनीतिक अहंकार संवैधानिक परंपराओं से ऊपर रखा जा रहा है।

The Narrative World    10-Mar-2026
Total Views |
Representative Image
 
भारत का लोकतंत्र केवल चुनावी राजनीति या सरकारों के गठन और परिवर्तन तक सीमित नहीं है। इसकी वास्तविक शक्ति उन संवैधानिक संस्थाओं, परंपराओं और मर्यादाओं में निहित है जो इस व्यवस्था को संतुलित, अनुशासित और गरिमामय बनाती हैं। जब इन मर्यादाओं का पालन होता है तो लोकतंत्र मजबूत होता है, और जब इन्हें नजरअंदाज किया जाता है तो लोकतांत्रिक संस्कृति कमजोर पड़ने लगती है। पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति के हालिया दौरे के दौरान जो घटनाक्रम सामने आया, उसने इसी चिंता को फिर से उजागर कर दिया है।
 
राष्ट्रपति भारत के संविधान के अंतर्गत देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन होते हैं। वे किसी राजनीतिक दल या क्षेत्र के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की एकता, अखंडता और संवैधानिक गरिमा के प्रतीक होते हैं। इसलिए जब राष्ट्रपति किसी राज्य के दौरे पर जाते हैं तो वह केवल एक कार्यक्रम नहीं होता, बल्कि उस राज्य के लिए एक सम्मानजनक अवसर होता है। राज्य सरकार और प्रशासन की यह जिम्मेदारी होती है कि वे पूरी गरिमा और शिष्टाचार के साथ राष्ट्रपति के स्वागत और कार्यक्रमों की व्यवस्था करें।
 
दुर्भाग्य से पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति के कार्यक्रम से जुड़ी घटनाएँ इस आदर्श के बिल्कुल विपरीत दिखाई दीं। कार्यक्रम स्थल में बार बार परिवर्तन, व्यवस्थाओं की कमी, आमंत्रित लोगों को निमंत्रण पत्र न मिलना और कार्यक्रम स्थल पर प्रवेश से रोके जाने जैसी घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि प्रशासनिक स्तर पर गंभीर लापरवाही हुई। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि इन घटनाओं ने यह आभास कराया कि कहीं न कहीं राजनीतिक उदासीनता या असहजता भी इस पूरे घटनाक्रम के पीछे रही।
 
Representative Image
 
इस पूरे मामले में सबसे अधिक चर्चा जिस बात की हो रही है, वह है राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का व्यवहार। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मुख्यमंत्री राज्य का सर्वोच्च निर्वाचित पद होता है और उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे संवैधानिक परंपराओं का पालन करते हुए एक उदाहरण प्रस्तुत करें। परंतु जिस प्रकार से राष्ट्रपति के दौरे के दौरान शिष्टाचार और प्रोटोकॉल को लेकर सवाल उठे, उससे यह धारणा बनी कि राजनीतिक अहंकार ने संवैधानिक मर्यादा को पीछे छोड़ दिया।
 
यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि भारत का संविधान किसी भी व्यक्ति या पद को असीमित अधिकार नहीं देता। मुख्यमंत्री हों, प्रधानमंत्री हों या कोई अन्य जनप्रतिनिधि, सभी संविधान के अधीन हैं। कोई भी व्यक्ति संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यही है कि सत्ता जनता की होती है और संविधान उस सत्ता को नियंत्रित करने का सर्वोच्च साधन है।
 
यदि किसी राज्य की मुख्यमंत्री यह मानने लगें कि उनका राजनीतिक कद इतना बड़ा है कि वे संवैधानिक शिष्टाचार की अनदेखी कर सकती हैं, तो यह न केवल एक गलत संदेश देता है बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी चिंताजनक संकेत है। यह याद रखना चाहिए कि पश्चिम बंगाल किसी भी व्यक्ति या दल की निजी संपत्ति नहीं है। वह भारत संघ का एक महत्वपूर्ण राज्य है और वहां की सरकार संविधान के अंतर्गत कार्य करती है, न कि किसी व्यक्तिगत इच्छा के आधार पर।
 
राजनीति में मतभेद होना स्वाभाविक है। विभिन्न दलों की विचारधाराएँ अलग अलग होती हैं और कई बार केंद्र और राज्य सरकारों के बीच नीतिगत मतभेद भी होते हैं। परंतु इन मतभेदों का प्रभाव कभी भी संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान पर नहीं पड़ना चाहिए। राष्ट्रपति का पद किसी दलगत राजनीति से ऊपर होता है और उनके कार्यक्रमों को राजनीतिक चश्मे से देखना लोकतांत्रिक शिष्टाचार के विपरीत है।
 
Representative Image
 
इस पूरे प्रकरण में यह भी देखा गया कि राज्य सरकार की ओर से आत्ममंथन करने के बजाय आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया। यह प्रवृत्ति आज की राजनीति में लगातार बढ़ती जा रही है, जहाँ किसी भी आलोचना को स्वीकार करने के बजाय उसे राजनीतिक साजिश बताने की कोशिश की जाती है। परंतु परिपक्व लोकतंत्र में यह अपेक्षा की जाती है कि नेतृत्व अपनी गलतियों को स्वीकार करे और उनसे सीख ले।
 
भारत की राजनीतिक परंपरा में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जब विभिन्न दलों के नेताओं ने संवैधानिक पदों के प्रति अत्यंत सम्मानजनक व्यवहार किया। कई बार ऐसा हुआ कि मुख्यमंत्री किसी कारणवश स्वयं उपस्थित नहीं हो पाए, तब उन्होंने अपने वरिष्ठ मंत्री को प्रतिनिधि के रूप में भेजा। यह केवल औपचारिकता नहीं बल्कि संवैधानिक शिष्टाचार का हिस्सा है। इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या राज्य सरकार के लिए ऐसा करना असंभव था।
 
 
राजनीतिक नेतृत्व का वास्तविक मूल्यांकन उसके व्यवहार और दृष्टिकोण से होता है। जो नेता लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करते हैं, वे समझते हैं कि सत्ता स्थायी नहीं होती, परंतु संस्थाएँ स्थायी होती हैं। यदि राजनीतिक नेतृत्व अपने अहंकार में इन संस्थाओं की गरिमा को कम करेगा, तो अंततः इसका नुकसान पूरे लोकतंत्र को होगा।
 
आज भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में यह और भी आवश्यक हो जाता है कि राजनीतिक नेतृत्व संयम, शिष्टाचार और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करे। जनता अपने नेताओं से केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं बल्कि जिम्मेदार आचरण की भी अपेक्षा करती है। जब जनता यह देखती है कि उसके नेता स्वयं संवैधानिक परंपराओं का सम्मान नहीं कर रहे हैं, तो लोकतंत्र में विश्वास भी प्रभावित होता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि राष्ट्रपति का पद किसी व्यक्ति विशेष का नहीं बल्कि एक संस्था का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए उस पद के प्रति असम्मान केवल एक व्यक्ति के प्रति नहीं बल्कि पूरे संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति असम्मान के रूप में देखा जाता है।
 
 
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक नेतृत्व यह समझे कि लोकतंत्र में शक्ति का अर्थ निरंकुशता नहीं होता। सत्ता का वास्तविक उद्देश्य सेवा और उत्तरदायित्व है, न कि अहंकार का प्रदर्शन। यदि कोई मुख्यमंत्री यह सोचने लगे कि राज्य उसकी निजी जागीर है और वह संवैधानिक मर्यादाओं को अपनी सुविधा के अनुसार बदल सकती है, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक प्रवृत्ति है।
 
पश्चिम बंगाल का इतिहास सांस्कृतिक, बौद्धिक और लोकतांत्रिक परंपराओं से समृद्ध रहा है। वहाँ की जनता ने हमेशा लोकतांत्रिक मूल्यों को महत्व दिया है। इसलिए यह अपेक्षा की जाती है कि राज्य का नेतृत्व भी उसी परंपरा का सम्मान करेगा और अपने आचरण से लोकतांत्रिक गरिमा को मजबूत करेगा।
 
 
अंततः यह कहना आवश्यक है कि भारत का संविधान ही इस देश की सर्वोच्च सत्ता है। कोई भी नेता, चाहे वह कितना ही लोकप्रिय या शक्तिशाली क्यों न हो, संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री का पद भी उसी संवैधानिक ढाँचे का हिस्सा है और उसका दायित्व है कि वह उस ढाँचे की मर्यादा को बनाए रखे।
 
राष्ट्रपति के प्रति सम्मान केवल एक औपचारिकता नहीं बल्कि राष्ट्र के प्रति सम्मान का प्रतीक है। यदि हम इस मूल भावना को समझेंगे और उसका पालन करेंगे, तभी हमारा लोकतंत्र वास्तव में मजबूत और परिपक्व बन सकेगा।
 
लेख
 
Representative Image
 
बिमलेश कुमार सिंह चौहान
कुलसचिव, आर. आर. इंस्टीट्यूट ऑफ मॉडर्न टेक्नोलॉजी, लखनऊ
लेखक शिक्षाविद् एवं समसामयिक विषयों के टिप्पणीकार हैं।