रमज़ान के दौरान शांति और संयम की बात की जाती है, लेकिन इस्लामिक जिहादी आतंकियों ने बार-बार साबित किया है कि उन्हें न इंसानियत की परवाह है और न अपने मजहब के पवित्र महीने की। ये आतंकी संगठन रमज़ान को भी खून से रंगने से नहीं हिचकते। वे अपने ही मुसलमान भाइयों को निशाना बनाते हैं और मस्जिदों तक को बख्शते नहीं। यह सिलसिला अलग-अलग देशों में कई बार सामने आ चुका है।
सबसे पहले
26 जून 2015 को कुवैत सिटी में हुआ हमला दुनिया को झकझोर गया। रमज़ान के दूसरे शुक्रवार को अल-इमाम अस-सादिक मस्जिद में दो हजार से अधिक लोग नमाज पढ़ रहे थे। उसी दौरान इस्लामिक स्टेट के आत्मघाती हमलावर ने खुद को उड़ा लिया। 27 लोगों की मौत हुई और 227 घायल हुए। हमले की जिम्मेदारी ISIS से जुड़े गुट ने ली। उसने खुले तौर पर शिया मुसलमानों को निशाना बनाने की बात कही। इस घटना ने साफ कर दिया कि जिहादी आतंकियों के लिए मुसलमान भी सुरक्षित नहीं हैं।
इसके बाद
12 जून 2016 को अमेरिका के ऑरलैंडो शहर में पल्स नाइटक्लब पर हमला हुआ। हमलावर उमर मतीन ने 49 लोगों की हत्या की और 53 को घायल किया। उसने हमले के दौरान ISIS के प्रति निष्ठा जताई। यह हमला भी रमज़ान के दौरान हुआ। ISIS नेतृत्व ने अपने समर्थकों को इसी महीने में हमले करने के लिए उकसाया था। इस घटना ने दिखाया कि यह विचारधारा किसी सीमा को नहीं मानती। यह जहां मौका मिलता है, वहां खून बहाती है।
इसी तरह
4 मई 2020 को इराक के सलादीन और दियाला प्रांत में ISIS ने फिर से सिर उठाया। रमज़ान के दूसरे सप्ताह में आतंकियों ने पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्स के मुख्यालय पर हमला किया। कम से कम दस लड़ाकों की जान गई। सुरक्षा विशेषज्ञों ने बताया कि संगठन ने जानबूझकर इस महीने को चुना ताकि वह अपनी मौजूदगी दिखा सके। इससे पहले भी उत्तरी इराक में उसके स्लीपर सेल लगातार छोटे बड़े हमले कर रहे थे।
29 अप्रैल 2022 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में खलीफा साहिब मस्जिद पर भयानक विस्फोट हुआ। यह हमला रमज़ान के आखिरी शुक्रवार को हुआ। सैकड़ों लोग जिक्र की नमाज के लिए जुटे थे। धमाका इतना तेज था कि आसपास की इमारतों के शीशे टूट गए और मस्जिद की छत का हिस्सा गिर गया। इस्लामिक स्टेट खुरासान ने इस हमले के जरिए सूफी समुदाय को निशाना बनाया। इससे पहले भी शिया और सूफी समुदाय पर लगातार हमले हुए। यह साफ संकेत था कि जिहादी संगठन अपने ही समाज में नफरत की आग भड़का रहे हैं।
सोमालिया में भी यह क्रूरता रुकी नहीं।
11 मार्च 2025 को रमज़ान की शुरुआत के साथ ही अल शबाब के आतंकियों ने काहिरा होटल पर हमला किया। पहले कार बम से धमाका किया गया, फिर बंदूकधारियों ने घुसकर गोलीबारी की। इस हमले में सात लोगों की जान गई। कई नागरिक और अधिकारी घायल हुए। अल शबाब लंबे समय से सोमालिया में अस्थिरता फैलाता रहा है, लेकिन रमज़ान के दौरान इस तरह का हमला उसके अमानवीय चेहरे को उजागर करता है।
21 मार्च 2025 को पश्चिमी नाइजर के कोकोरू गांव की फाम्बिता मस्जिद में इस्लामिक स्टेट इन द ग्रेटर सहारा के आतंकियों ने 44 नमाजियों की हत्या कर दी। 20 लोग घायल हुए। हमलावरों ने मस्जिद को घेरकर अंधाधुंध गोली चलाई और बाद में बाजार तथा घरों में आग लगा दी। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त ने इसे चेतावनी बताया। यह हमला बताता है कि ये जिहादी संगठन इंसान को केवल निशाना मानते हैं।
इसी वर्ष पाकिस्तान ने भी एक भयावह दौर देखा। पाक इंस्टीट्यूट फॉर पीस स्टडीज के
अनुसार रमज़ान 2025 के दौरान 84 हमले दर्ज हुए। तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान और ISIS खुरासान ने कई वारदातों को अंजाम दिया। बलूचिस्तान में ट्रेन हाईजैकिंग में 25 लोग मारे गए। दारुल उलूम हक्कानिया में आत्मघाती हमला हुआ, जिसमें छह लोगों की मौत हुई। दर्जनों सुरक्षा कर्मियों ने भी जान गंवाई। यह एक दशक का सबसे खतरनाक रमज़ान साबित हुआ।
इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखें तो एक भयावह तस्वीर सामने आती है। जिहादी आतंकवाद किसी धर्म की रक्षा नहीं करता, बल्कि उसे बदनाम करता है। यह विचारधारा केवल सत्ता और भय का खेल खेलती है। रमज़ान जैसे महीने में भी जब लोग इबादत में लगे रहते हैं, तब ये आतंकी मस्जिदों, बाजारों और सार्वजनिक स्थानों को निशाना बनाते हैं। वे अपने ही मुसलमान समुदाय को मारते हैं और समाज को बांटने की कोशिश करते हैं।
जब तक जिहादी आतंकवाद की जड़ें खत्म नहीं होंगी, तब तक निर्दोषों का खून बहता रहेगा। मानवता की रक्षा के लिए इन आतंकी ताकतों को हर हाल में परास्त करना ही होगा।
लेख
शोमेन चंद्र