माओवाद की आड़ में फल-फूल रहा था कॉरपोरेट वसूली का खेल

मनीष कुंजाम ने बस्तर में नक्सलियों के कथित जन आंदोलन को कॉरपोरेट वसूली के संगठित तंत्र के रूप में पेश किया।

The Narrative World    04-Apr-2026
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बस्तर की धरती पर वर्षों तक नक्सलियों ने जल, जंगल और जमीन के नाम पर अपनी विचारधारा को सही ठहराने की कोशिश की। लेकिन अब उसी विचारधारा से जुड़े एक बड़े चेहरे ने उनके दावों की पोल खोल दी। मनीष कुंजाम, जो खुद एक कम्युनिस्ट नेता रहे हैं, उन्होंने नक्सलियों के असली चेहरे को बेनकाब कर दिया। उनके आरोप न केवल गंभीर हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि माओवाद के नाम पर किस तरह संगठित वसूली का खेल चलता रहा।
 
सबसे पहले कुंजाम ने साफ कहा कि नक्सली कभी भी जल, जंगल और जमीन की लड़ाई नहीं लड़े। उन्होंने बताया कि नक्सलियों ने इस मुद्दे को सिर्फ एक ढाल के रूप में इस्तेमाल किया। असल में उन्होंने कॉरपोरेट कंपनियों से वसूली का एक बड़ा नेटवर्क खड़ा किया। यह बयान इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह किसी विरोधी विचारधारा के नेता का नहीं, बल्कि खुद एक कम्युनिस्ट नेता का है।
 
इसके अलावा कुंजाम ने बस्तर के कई इलाकों का उदाहरण देकर नक्सलियों की सच्चाई सामने रखी। उन्होंने रावघाट, दुर्गूकोंदल, आमदेई और सूरजगढ़ जैसे क्षेत्रों का जिक्र किया, जहां नक्सलियों का मजबूत प्रभाव रहा। इसके बावजूद वहां खनन परियोजनाएं शुरू हो गईं। अगर नक्सली सच में जनजातियों के हित में लड़ रहे होते, तो इन क्षेत्रों में खदानें शुरू ही नहीं होतीं। इससे साफ होता है कि नक्सलियों ने विरोध के नाम पर सिर्फ सौदेबाजी की।
 
कुंजाम ने यह भी आरोप लगाया कि नक्सली पहले जनजातियों को आगे करके विरोध प्रदर्शन करवाते थे। इससे कंपनियों पर दबाव बनता था और सौदे की कीमत बढ़ जाती थी। जैसे ही उन्हें मोटी रकम मिलती, वे खदानों को हरी झंडी दे देते। इस तरह उन्होंने जनजातियों के नाम पर अपने हित साधे और उनकी भावनाओं का इस्तेमाल किया।
 
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इतना ही नहीं, उन्होंने दक्षिण बस्तर में मित्तल ग्रुप की पाइपलाइन का उदाहरण दिया। नक्सलियों ने कई बार पाइपलाइन को नुकसान पहुंचाया और बाद में पैसे मिलने पर उसे फिर से चालू कर दिया। इससे साफ पता चलता है कि उनका मकसद सिर्फ विकास रोकना नहीं, बल्कि उससे कमाई करना भी था।
 
कुंजाम ने नक्सलियों के आर्थिक नेटवर्क पर भी बड़ा खुलासा किया। उन्होंने दावा किया कि नक्सलियों के पास जितना धन और सोना बरामद हुआ है, वह असली रकम का छोटा हिस्सा है। बड़ी मात्रा में पैसा और सोना आज भी बस्तर के जंगलों में गड़ा हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि यह सोना विदेशों, यहां तक कि स्विट्जरलैंड से आया। इससे नक्सलियों के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी सवाल खड़े होते हैं।
 
 
हाल ही में बीजापुर और जगदलपुर में हुए सरेंडर के दौरान भी भारी मात्रा में सोना बरामद हुआ। यह तथ्य खुद इस बात की पुष्टि करता है कि नक्सली संगठन आर्थिक रूप से कितना मजबूत रहा है। लेकिन यह ताकत जनजातियों के विकास में नहीं, बल्कि हिंसा और अवैध गतिविधियों में खर्च हुई।
 
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कुंजाम ने कन्वर्जन के मुद्दे को भी उठाया। उन्होंने दक्षिण बस्तर में तेजी से बन रहे चर्चों पर सवाल खड़े किए और कहा कि इनके लिए विदेश से फंडिंग आ रही है। उन्होंने सरकार से इस फंडिंग की जांच की मांग की। उनका मानना है कि अगर फंडिंग पर रोक लगेगी, तो कन्वर्जन की गतिविधियां भी कम होंगी।
 
नक्सलियों की हिंसा पर भी कुंजाम ने सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि सरेंडर कर चुके नक्सली कैडर को उन हजारों निर्दोष जनजातियों की हत्या का जवाब देना होगा, जिन्हें मुखबिरी के आरोप में मार दिया गया। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि जब ये लोग गांव लौटेंगे, तो वहां टकराव की स्थिति बन सकती है।
 
 
अंत में कुंजाम ने साफ कहा कि नक्सलियों का अब कोई राजनीतिक भविष्य नहीं बचा है। ग्रामीणों के बीच उनकी स्वीकार्यता खत्म हो चुकी है और लोगों में उनके खिलाफ भारी आक्रोश है। उन्होंने यह भी कहा कि तेलंगाना के नक्सलियों के लिए भी अब बस्तर में कोई जगह नहीं है।
 
स्पष्ट है कि माओवाद का असली चेहरा अब छिपा नहीं रह गया है। जब उसी विचारधारा से जुड़े नेता उसकी सच्चाई उजागर कर रहे हैं, तो यह संकेत है कि तथाकथित नक्सल आंदोलन अब अपनी विश्वसनीयता खो चुका है।
 
लेख
शोमेन चंद्र