हर वर्ष जब मई का पहला दिन आता है, तो दुनिया भर के औद्योगिक और राजनीतिक गलियारों में 'मजदूर दिवस' की रस्में निभाई जाती हैं। इस दिन का इतिहास 138 वर्ष पीछे, 1886 में अमेरिका के शिकागो शहर तक जाता है। वहां के 'हेमार्केट स्क्वायर' पर कपड़ा मिलों और अन्य कारखानों के मजदूरों ने काम के घंटे 14-16 से घटाकर 8 घंटे करने, कार्यस्थल पर मानवीय स्थितियां बहाल करने और उचित वेतन की मांग को लेकर एक ऐतिहासिक और शांतिपूर्ण हड़ताल की थी। इस आंदोलन में महिलाओं और पुरुषों दोनों की समान भागीदारी थी। लेकिन सत्ता और कारखाना मालिकों के गठजोड़ ने इस शांतिपूर्ण आंदोलन को बर्बरता से कुचल दिया।
सुरक्षा बलों की अंधाधुंध फायरिंग में कई मजदूर मारे गए और बाद में इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे चार मजदूर नेताओं को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि उस दिन शिकागो के मजदूरों के हाथों में जो झंडा था, वह मूल रूप से सफेद रंग का था। लेकिन जब गोलियों से मजदूर छलनी हुए, तो वह सफेद झंडा उनके खून से लथपथ होकर लाल हो गया। उसी रक्तरंजित इतिहास के बाद से 'लाल झंडा' पूरी दुनिया में मजदूर संघर्षों और श्रमिक अधिकारों का प्रतीक बन गया है। लेकिन आज, एक सदी से अधिक समय बीत जाने के बाद भी भारत के परिदृश्य में यह सवाल एक खुले घाव की तरह मौजूद है कि क्या वास्तव में मजदूरों का संघर्ष खत्म हो गया है? हाल ही में दिल्ली-NCR और विशेषकर नोएडा के औद्योगिक क्षेत्रों में हुए मजदूर आंदोलनों और उनमें पनपी अप्रत्याशित हिंसा ने इस प्रश्न को और अधिक प्रासंगिक तथा जटिल बना दिया है।

आज भारत के चमकते औद्योगिक क्षेत्रों, विशेषकर नोएडा, ग्रेटर नोएडा, मानेसर और दिल्ली-NCR के अन्य हिस्सों में यदि आप कारखानों के सायरन के पीछे की सच्चाई सुनें, तो वह बेहद दुखदायी और अमानवीय है। इन क्षेत्रों में काम करने वाले अधिकांश मजदूर ठेका प्रथा और असंगठित क्षेत्र के मकड़जाल में फंसे हुए हैं। उत्तर प्रदेश के दूरदराज के गांवों, बिहार, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों से गरीबी और बेरोजगारी की मार सहकर ये मजदूर महानगरों की ओर पलायन करते हैं। उनका सपना होता है कि वे अपने परिवार का पेट भर सकें, बच्चों को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा दिला सकें और बीमारी के समय बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं प्राप्त कर सकें।
लेकिन महानगरों का यथार्थ उनके इन सपनों को बेरहमी से कुचल देता है। आज भी इन मजदूरों का वेतन 10,000 से 12,000 रुपये प्रति माह के बीच सिमटकर रह गया है। युद्धजनित वैश्विक हालातों, आपूर्ति श्रृंखलाओं में आई बाधाओं और आसमान छूती महंगाई के बीच इतने कम वेतन में महानगरों की झुग्गियों में जीवनयापन करना किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। परिवार से सैकड़ों किलोमीटर दूर रहकर 12-16 घंटे हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद भी जब एक पिता अपने बच्चों की स्कूल फीस नहीं भर पाता या एक बेटा अपने बीमार माता-पिता का इलाज नहीं करवा पाता, तो उसके भीतर गहरा विक्षोभ और हताशा जन्म लेती है। यह केवल आर्थिक विपन्नता नहीं है, बल्कि यह एक संस्थागत और व्यवस्थागत शोषण है, जो इक्कीसवीं सदी के उभरते भारत पर एक बदनुमा दाग है।
विडंबना यह है कि इस नग्न शोषण को रोकने के लिए सरकार ने नीतियां नहीं बनाई हों, ऐसा नहीं है। केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 29 जटिल और औपनिवेशिक काल के केंद्रीय श्रम कानूनों को समाप्त कर उन्हें चार नए 'लेबर कोड' (श्रम संहिताओं) में समाहित किया है। इन कानूनों का उद्देश्य न केवल व्यापार को आसान बनाना था, बल्कि मजदूरों को मजबूत सामाजिक सुरक्षा का कवच प्रदान करना भी था। इन नए कानूनों में राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम वेतन में सम्मानजनक वृद्धि, काम के घंटों को लेकर 'फाइव डे वीक' (5 कार्य दिवस) का विकल्प, ओवरटाइम के लिए सामान्य वेतन से दोगुने भुगतान का स्पष्ट प्रावधान और स्वास्थ्य व भविष्य निधि से जुड़ी कई सुविधाएं सुनिश्चित की गई हैं।
श्रम अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि कारखानों और कंपनियों द्वारा इन कानूनों को ईमानदारी से लागू किया जाए, तो एक सामान्य कुशल या अर्ध-कुशल मजदूर का न्यूनतम वेतन भत्तों सहित 18,000 से 22,000 रुपये तक आसानी से पहुंच सकता है। खास तौर पर, यदि ओवरटाइम का सही भुगतान किया जाए, तो मजदूरों को अच्छा-खासा वेतन मिल सकता है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कॉर्पोरेट जगत, मिल मालिक और ठेकेदार इन कानूनों को लागू करने से कतरा रहे हैं। बढ़ा हुआ वेतन और ओवरटाइम का पैसा मजदूरों की जेब तक नहीं पहुंच रहा है। सरकारी तंत्र और फैक्ट्री प्रबंधन की मिलीभगत से कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यही वह बिंदु है, जहां से समस्या राजनीतिक और आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर खतरनाक रूप ले लेती है। जब कानून लागू नहीं होते और लोकतांत्रिक संस्थाएं मजदूरों की नहीं सुनतीं, तो उस हताशा और शून्यता के वैक्यूम में राष्ट्र-विरोधी तत्व प्रवेश करते हैं, जो इसी अवसर की तलाश में बैठे होते हैं।

नोएडा में मजदूरों का हालिया आंदोलन मूल रूप से इन्हीं नए श्रम कानूनों को लागू करवाने और अपने वेतन वृद्धि की जायज मांग को लेकर शुरू हुआ था। एक लोकतांत्रिक देश में अपने हकों के लिए संविधान के दायरे में रहकर आंदोलन करना और अपनी बात रखना हर नागरिक का अधिकार है; यह किसी भी तरह से असंवैधानिक नहीं है। लेकिन एक शांतिपूर्ण वेतन-वृद्धि की मांग के बीच अचानक बड़े पैमाने पर तोड़फोड़, आगजनी और हिंसा कैसे भड़क उठी? इसके पीछे का विज्ञान क्या है? इसका सटीक उत्तर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) द्वारा वर्ष 2004 में जारी किए गए और आज भी उनके लिए मार्गदर्शक माने जाने वाले दस्तावेज 'अर्बन पर्सपेक्टिव: आवर वर्क इन अर्बन एरियाज' में छिपा है।
इस दस्तावेज के अनुसार, माओवादियों की रणनीति अब केवल बस्तर या दंतेवाड़ा के जंगलों तक सीमित नहीं है। उनकी स्पष्ट योजना जंगलों से निकलकर शहरी औद्योगिक क्षेत्रों में अपनी पैठ बनाने की है। माओवादी सिद्धांत के अनुसार, उनका उद्देश्य 'सर्वहारा', यानी औद्योगिक मजदूरों, असंतुष्ट छात्रों और व्यवस्था-विरोधी बुद्धिजीवियों की भर्ती करना है, ताकि भारतीय राज्य के खिलाफ एक सशस्त्र क्रांति का निर्माण किया जा सके। दिल्ली-एनसीआर, नोएडा, गाजियाबाद और फरीदाबाद जैसे औद्योगिक बेल्ट इन अति-वामपंथी माओवादियों, जिन्हें आम बोलचाल में 'अर्बन नक्सल' कहा जाता है, के लिए उपजाऊ जमीन बन चुके हैं। सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट्स के अनुसार, भाकपा (माओवादी) का 'नॉर्दर्न रीजनल ब्यूरो' या 'उत्तर भारत तालमेल कमेटी (NCC)' आज भी भारत में उनका सबसे सक्रिय संगठन बना हुआ है।
ये सीधे लाल झंडा लेकर या माओवादी के नाम से काम नहीं करते, बल्कि विकेंद्रीकृत रूप में काम करते हैं। इन्होंने मजदूरों के अधिकारों, छात्रों के हितों और मानवाधिकारों के नाम पर दर्जनों छोटे-छोटे फ्रंट संगठन या NGO बना रखे हैं, जो दशकों से औद्योगिक इलाकों और मलिन बस्तियों में सक्रिय हैं। इनका वास्तविक एजेंडा मजदूरों को उनका हक दिलाना नहीं है, बल्कि मजदूरों की जायज हताशा और गुस्से को राष्ट्र के विरुद्ध संगठित बारूद में बदलना है। ये मजदूरों को समझाते हैं कि सरकार, अदालतें या संविधान उन्हें न्याय नहीं दे सकते। ये उन्हें हिंसक कार्रवाई के लिए उकसाते हैं और धीरे-धीरे सरकार के खिलाफ एक हथियारबंद आंदोलन की जमीन तैयार कर रहे हैं। उनका मानना है कि क्रांति का केंद्रीय कर्तव्य सशस्त्र संघर्ष के लिए राजनीतिक सत्ता पर कब्जा करना है, जिससे वे नवजनवादी समाज बना सकें। नोएडा की सड़कों पर हुई तोड़फोड़ और आगजनी किसी मजदूर का स्वाभाविक गुस्सा कम और 'अर्बन नक्सल' की रणनीति का एक प्रायोगिक अभ्यास ज्यादा नजर आता है। वे मजदूरों को बलि का बकरा बनाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं।

आज भारतीय मजदूर वर्ग को यह समझ लेना चाहिए कि यह समय पूंजीवादी होड़ का वह दौर नहीं है, जब उनकी मनमर्जी चलती थी। 1947 की आजादी और भारतीय संविधान लागू होने के बाद कारखाना मालिकों की यह बाध्यता है कि वे कानूनन मजदूरों से सप्ताह में 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं करवा सकते और यदि ओवरटाइम करवाना है, तो उसके लिए कानूनन दोगुना वेतन देना होगा। वर्तमान भारत में मजदूरों के हित लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था के दायरे में ही सबसे अधिक सुरक्षित हैं। मजदूरों को ऐसे किसी भी शहरी माओवादी उकसावे में नहीं आना चाहिए, जो उनके कंधों पर बंदूक रखकर राष्ट्र की जड़ों पर प्रहार करना चाहते हैं। उनका आंदोलन पूर्णतः शांतिपूर्ण, सुसंगठित और लोकतांत्रिक होना चाहिए, क्योंकि हिंसा केवल उनके जायज आंदोलन को भटकाती है और उन्हें व्यवस्था के दमन का शिकार बनाती है।
वहीं दूसरी ओर, देश के उद्योगपतियों, कॉर्पोरेट घरानों और सरकार को भी गंभीर आत्ममंथन करने की सख्त जरूरत है। कारखानों और कंपनियों के मालिकों को यह समझना होगा कि वे संसद द्वारा पारित 29 केंद्रीय श्रम कानूनों की संहिताओं को दरकिनार कर आग से खेल रहे हैं। उन्हें तुरंत प्रभाव से बढ़े हुए वेतन और सुविधाएं लागू करनी चाहिए। पूंजीपतियों को यह गांठ बांध लेनी चाहिए कि यदि वे मजदूरों को उनके जायज हक से वंचित रखेंगे, तो वे स्वयं उस असंतोष और आक्रोश की जमीन तैयार करेंगे, जिस पर वामपंथी उग्रवाद की विषैली फसल उगती है।
यदि देश में अराजकता, औद्योगिक हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता फैलती है, तो इसके लिए केवल मजदूरों को भड़काने वाले शहरी नक्सलवादी ही जिम्मेदार नहीं होंगे, बल्कि कानूनों का पालन न कर मजदूरों का निर्दयी शोषण करने वाले कारखानों और कंपनियों के मालिक भी देश के प्रति उतने ही बड़े गुनहगार माने जाएंगे। मई दिवस का सच्चा सम्मान केवल भाषणों या लाल झंडे फहराने में नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था को जमीन पर उतारने में है, जहां एक मजदूर के पसीने की बूंद जमीन पर गिरने से पहले ही उसे उसका न्यायपूर्ण मूल्य मिल जाए। लोकतंत्र में आर्थिक न्याय ही सबसे बड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा है।
लेख
संजय सिंह ठाकुर
नक्सल विषय के अध्येता, नागपुर