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भारत की राजनीति में “राष्ट्रीय सुरक्षा” अक्सर चुनावी भाषणों का विषय बनती है, लेकिन इतिहास को ध्यान से देखा जाए तो कई ऐसे क्षण दिखाई देते हैं, जब नेहरू-गांधी परिवार के सामरिक निर्णयों ने भारत की सामरिक स्थिति को दशकों तक प्रभावित किया। आज जब हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र वैश्विक शक्ति संघर्ष का केंद्र बन चुके हैं, तब भारत के समुद्री भूगोल और सामरिक द्वीपों का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। लेकिन इसी समय एक बड़ा प्रश्न फिर सामने खड़ा होता है कि क्या भारत के तत्कालीन नेतृत्व ने अपने सामरिक हितों को लेकर हमेशा पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई? या फिर अवसरवादी राजनीति, वैचारिक भ्रम और रणनीतिक दूरदर्शिता की कमी ने भारत को बार-बार कमजोर किया?
आज वही नेहरू-गांधी परिवार ग्रेट निकोबार परियोजना का विरोध कर रहा है। नेहरू-गांधी परिवार द्वारा पर्यावरण, जनजातीय अधिकार और पारिस्थितिकी के नाम पर एक ऐसा नैरेटिव खड़ा किया जा रहा है, मानो यह परियोजना केवल विनाश का प्रतीक हो। लेकिन यदि इतिहास की परतें खोली जाएं, तो यह विरोध भारत की सामरिक परियोजनाओं के खिलाफ लंबे राजनीतिक पैटर्न का हिस्सा दिखाई देता है। कोको द्वीप से लेकर कच्चातीवू तक और अब ग्रेट निकोबार तक, एक सवाल लगातार भारत का पीछा करता दिखाई देता है कि क्या भारत की रणनीतिक शक्ति हमेशा नेहरू-गांधी परिवार की "रणनीतियों" की शिकार रही है?

भारत से कुछ ही दूरी पर स्थित कोको द्वीप आज चीन की सामरिक गतिविधियों की वजह से चर्चा में रहते हैं। अंडमान-निकोबार के बेहद निकट स्थित ये द्वीप भारत की समुद्री सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि चीन ने म्यांमार के साथ मिलकर इन द्वीपों पर निगरानी और खुफिया ढांचे को मजबूत किया है। इससे हिंद महासागर में भारत की गतिविधियों पर नजर रखने की क्षमता चीन को मिलती है।
लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि नेहरू-गांधी परिवार ने अपने नेतृत्व के दौरान शुरुआती वर्षों से ही इस क्षेत्र को लेकर रणनीतिक दृढ़ता क्यों नहीं दिखाई? ब्रिटिश शासन के दौरान बर्मा लंबे समय तक ब्रिटिश भारत का हिस्सा था। बाद में उसे अलग प्रशासनिक इकाई बनाया गया और स्वतंत्रता के बाद कोको द्वीप बर्मा के हिस्से में चले गए। तकनीकी और कानूनी बहसें अपनी जगह हैं, लेकिन सच यह है कि नेहरू युग की विदेश नीति में सामरिक सोच को अधिक प्राथमिकता नहीं दी गई।

यही वह दौर था, जब नेहरू-गांधी नेतृत्व वाला भारत अपनी समुद्री शक्ति को आक्रामक रूप से विकसित करने के बजाय “गुटनिरपेक्ष नेतृत्व” की छवि में अधिक व्यस्त दिखाई देता है। परिणाम यह हुआ कि भारत के आसपास के कई सामरिक क्षेत्र धीरे-धीरे दूसरे देशों और बाद में चीन के प्रभाव क्षेत्र में जाते गए। आज जब चीन हिंद महासागर में “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति के तहत बंदरगाहों और निगरानी नेटवर्क का विस्तार कर चुका है, तब कोको द्वीप केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि नेहरू-गांधी परिवार की ऐतिहासिक रणनीतिक कमजोरी का प्रतीक लगते हैं।
इसके बाद आता है कच्चातीवू का प्रश्न। 1974 में इंदिरा गांधी सरकार ने भारत-श्रीलंका समुद्री समझौते के तहत इस द्वीप पर श्रीलंका के नियंत्रण को स्वीकार कर लिया। उस समय इसे कूटनीतिक समाधान बताया गया, लेकिन दशकों बाद भी तमिल मछुआरे इसकी कीमत चुका रहे हैं। आज भी श्रीलंकाई नौसेना द्वारा भारतीय मछुआरों की गिरफ्तारी और समुद्री विवाद लगातार राजनीतिक मुद्दा बने हुए हैं।

यह केवल एक छोटा द्वीप नहीं था, बल्कि समुद्री अधिकारों और रणनीतिक उपस्थिति का प्रश्न था। लेकिन नेहरू-गांधी परिवार की राजनीति ने इसे उस गंभीरता से नहीं देखा। यही कारण है कि आज कच्चातीवू भारतीय राजनीतिक विमर्श में “रणनीतिक रियायत” के प्रतीक के रूप में सामने आता है।
और अब जब भारत हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए ग्रेट निकोबार परियोजना जैसी विशाल सामरिक परियोजनाओं पर काम कर रहा है, तब वही नेहरू-गांधी परिवार का राजनीतिक और वैचारिक इकोसिस्टम एक बार फिर विरोध में दिखाई देता है। ग्रेट निकोबार परियोजना केवल एक बंदरगाह या इंफ्रास्ट्रक्चर योजना नहीं है। यह भारत की समुद्री और भू-राजनीतिक रणनीति का केंद्र मानी जा रही है।

यह परियोजना मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद निकट स्थित है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। चीन का ऊर्जा और व्यापार मार्ग भी इसी क्षेत्र से गुजरता है। ऐसे में ग्रेट निकोबार में ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरबेस, सड़क नेटवर्क और सामरिक बुनियादी ढांचे का निर्माण भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में अभूतपूर्व बढ़त दे सकता है।
यही कारण है कि रणनीतिक विशेषज्ञ इसे भारत का “इंडो-पैसिफिक गेम चेंजर” बताते हैं। लेकिन दूसरी ओर नेहरू-गांधी परिवार द्वारा परियोजना के खिलाफ व्यापक अभियान भी चलाया जा रहा है। पर्यावरणीय चिंताओं को लेकर अदालतों में याचिकाएं दायर की गईं, अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण नेटवर्क सक्रिय हुए और विभिन्न राजनीतिक समूहों ने इसे “विनाशकारी परियोजना” बताना शुरू कर दिया।
पर्यावरणीय चिंताएं किसी भी लोकतंत्र में महत्वपूर्ण हैं। लेकिन आलोचक पूछते हैं कि क्या भारत की हर सामरिक परियोजना के खिलाफ एक विशेष प्रकार का वैचारिक नेटवर्क हमेशा सक्रिय हो जाता है? क्या यही पैटर्न परमाणु परियोजनाओं, सीमा सड़कों, रक्षा गलियारों और अब समुद्री बुनियादी ढांचे में भी दिखाई नहीं देता?

यहीं पर कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार परिवार की राजनीति पर प्रश्न खड़े होने लगते हैं। राहुल गांधी और कांग्रेस ईकोसिस्टम ने पिछले वर्षों में कई बार बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और रणनीतिक परियोजनाओं पर सवाल उठाए हैं। उनके समर्थक समूहों और वैचारिक नेटवर्क द्वारा ग्रेट निकोबार परियोजना को भी “पर्यावरण बनाम विकास” की बहस में खींचा गया। लेकिन विश्लेषक इसे केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि भारत की सामरिक क्षमता को धीमा करने वाली राजनीति मानते हैं।
यही कारण है कि अब एक बड़ा नैरेटिव बन रहा है कि नेहरू युग में सामरिक क्षेत्रों पर आक्रामक नीति की कमी, इंदिरा युग में समुद्री रियायतें, और आज के दौर में भारत की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री परियोजनाओं पर नेहरू-गांधी परिवार का वैचारिक विरोध हो रहा है।
यह केवल संयोग नहीं लगता कि जब चीन हिंद महासागर में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, तब भारत के हर बड़े सामरिक कदम के खिलाफ “मानवाधिकार”, “पर्यावरण”, “स्थानीय समुदाय” और “लोकतांत्रिक प्रतिरोध” के नाम पर एक वैश्विक-वैचारिक गठजोड़ सक्रिय हो जाता है।

ग्रेट निकोबार परियोजना का महत्व केवल आर्थिक नहीं है। यह भारत के भविष्य की समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक उपस्थिति और इंडो-पैसिफिक शक्ति संतुलन से जुड़ा हुआ है। यदि भारत को 21वीं सदी में वैश्विक शक्ति बनना है, तो उसे केवल जमीन पर नहीं, समुद्रों पर भी अपनी निर्णायक उपस्थिति स्थापित करनी होगी।
लेकिन समस्या यही है कि भारत की राजनीति का एक हिस्सा अभी भी सामरिक सोच को “राष्ट्रवाद” और सामरिक बुनियादी ढांचे को “सत्ता का प्रदर्शन” मानकर देखता है। यही सोच दशकों पहले भारत को समुद्री भू-राजनीति में कमजोर कर चुकी है।

आज कोको द्वीप चीन की निगरानी क्षमता का प्रतीक बन चुके हैं। कच्चातीवू भारतीय समुद्री रियायतों की याद दिलाता है। और ग्रेट निकोबार भारत की संभावित सामरिक शक्ति का प्रतीक बनकर उभर रहा है।
यही कारण है कि यह बहस केवल एक परियोजना की नहीं है। यह उस नेहरू-गांधी परिवार की उस राजनीतिक सोच की बहस है, जिसने दशकों तक भारत की सामरिक शक्ति को प्राथमिकता नहीं दी। और अब जब भारत हिंद महासागर में अपनी निर्णायक उपस्थिति स्थापित करना चाहता है, तब वही वैचारिक ईकोसिस्टम एक बार फिर “विरोध” की राजनीति के साथ सामने खड़ा दिखाई देता है।