
देश के लाल गलियारे में लंबे समय तक हिंसा चरम पर रही। इसके साक्षी सभी हैं, जो इस हिंसा से पीड़ित रहे वे भी और जिन्होंने इस हिंसा को अपनी आंखों से देखा, वो भी। पूरा बस्तर माओवादी हिंसा से पीड़ित रहा है। इस बीच बस्तर से लेकर झारखंड के जंगलों और रायपुर से लेकर दिल्ली के शहरी दीवारों तक सालों से एक नैरेटिव गूंजता रहा है। नैरेटिव ये कि नक्सली जनजातियों के अधिकारों और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं।
वामपंथ के पैरोकार इस नैरेटिव को लगातार बड़े-बड़े मंचों पर जोर-जोर से चिल्लाकर कहते रहे हैं। वामपंथी विचारक और माओवदी संगठन इन नक्सलियों को क्रांतिकारी की संज्ञा देते रहे हैं। अब सवाल ये उठता है कि क्या ये नक्सली या माओवादी वाकई में क्रांतिकारी थे?

इन तथाकथित क्रांतिकारियों में क्या वाकई में जनजातियों के प्रति प्रेम था या सत्ता परिवर्तन की सोची-समझी रणनीतिक साजिश थी, जिसके चलते वामपंथ के पैराकारों ने लगातार उनकी हिंसा को क्रांति और उनकी वारदातों को क्रांतिकारी कदम करार दिया?
चीनी कम्युनिस्ट तानाशाह और माओवाद के जनक माने जाने वाले माओ त्सेतुंग के सिद्धांतों के अनुसार सत्ता परिवर्तन का रास्ता "गांवों से शहरों की ओर" जाता है। इस हिंसक माओवादी युद्ध नीति, जिसे पीपुल्स वार कहा जाता है, को जिंदा रखने के लिए हिंसा को "सशस्त्र संघर्ष" का नाम देना जरूरी था।

इस हिंसा को केवल इसीलिए सशस्त्र संघर्ष कहा गया, क्योंकि यदि वे इसे सिर्फ हिंसक गिरोह के रूप में पेश करते तो उन्हें जनजातियों का समर्थन कभी नहीं मिलता। यही कारण है कि माओवादियों ने पहले खुद को स्थानीय ग्रामीणों का हितैषी बताकर उनकी जल-जंगल-जमीन के रक्षक के रूप में खुद को प्रस्तुत किया। इसके बाद जनजातियों को हथियार थमाकर उन्हें भी इस खूनी संघर्ष में शामिल भी कर लिया।
जनजाति समाज अपनी जमीन, जंगलों और संस्कृति को लेकर शुरू से ही बेहद संवेदनशील रहे हैं। वामपंथी विचारकों ने इसी संवेदनशीलता को अपना हथियार बनाया। जनजातियों में एक भ्रम कि "नक्सली सरकार और कॉरपोरेट से आपकी जमीन बचा रहे हैं", यह नैरेटिव गढ़ा।

इसी नैरेटिव के बूते नक्सलियों ने जनजातियों की सहानुभूति भी हासिल कर ली। इसके बाद उन्हें संगठन में भर्ती किया। सरकार, प्रशासन और कॉरपोरेट के प्रति उनके मन में जहर भरा गया, वो भी पूरी तरह सुनियोजित तरीके से। संगठन में जनजातियों को भर्ती करने के बाद उन्हें सुरक्षा बलों के खिलाफ एक 'ह्यूमन शील्ड' की तरह उपयोग किया। जहां भी मुठभेड़ होती, बड़े नक्सली लीडर पीछे रहते और इन जनजातियों को आगे कर देते। जहां जवान नक्सलियों पर भारी पड़ते दिखते तो नक्सली लीडर जनजाति कैडर्स को मौके पर ही छोड़कर भाग खड़े होते थे।
इस नैरेटिव का एक बड़ा हिस्सा देश की चुनी हुई लोकतांत्रिक संस्थाओं, न्यायपालिका और सुरक्षा बलों को "पूंजीपतियों का एजेंट" साबित करने पर टिका है। जब नक्सलियों को रक्षक और विकास परियोजनाओं को "विनाशकारी" बताया जाता है, तो आम जनता के मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा होता है। यही अविश्वास नक्सली नेटवर्क के लिए खाद-पानी का काम करता था।
जनजाति ग्रामीणों का माइंड वॉश तो नक्सली काफी पहले कर चुके थे। अब उन्हें जवानों के आगे खड़ा करने के लिए एक और नैरेटिव बनाया कि जवान जनजाति ग्रामीणों से उनकी जल-जंगल-जमीन छीनने आए हैं, नक्सलियों के द्वारा ग्रामीणों को कहे गए ये शब्द ही आग में घी का काम करने लगे और स्थानीय ग्रामीण भी जवानों से सामना करने के लिए हथियार उठा लेते।

इधर जंगलों में होने वाली हिंसक वारदातों को शहरों, विश्वविद्यालयों और मीडिया के एक वर्ग के माध्यम से "जनजातियों की हताशा की अभिव्यक्ति" के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा। इसका फायदा यह होता था कि जब भी किसी नक्सली की गिरफ्तारी या सुरक्षा बलों की कार्रवाई होती है, तो इसे "मानवाधिकारों का हनन" बताकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शोर मचाया जाता है, जिससे उन्हें कानूनी और नैतिक ढाल मिल जाती है।
जिस "जल, जंगल, जमीन" की रक्षा का दावा किया जाता है, धरातल पर माओवादियों ने उसी क्षेत्र को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई। बस्तर के ग्रामीणों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं, जिनमें सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार को माओवादी सरकारी षड्यंत्र बताकर इनका विरोध करने उकसाते रहे।

इन्हीं माओवादियों के कारण बस्तर का बड़ा हिस्सा इन बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहा है। माओवादी इन्हें सरकारी षड्यंत्र इसीलिए बताते, क्योंकि जंगलों में उनकी आमदरफ्त काफी आसान थी और इन सुविधाओं के विकसित होने पर उनके पनाहगाह तक फोर्स की मूवमेंट होती, जिससे माओवादियों के पास कोई सुरक्षित रास्ता नहीं बचता।
किसी गांव में यदि स्कूल, अस्पताल, सड़क और मोबाइल टॉवर स्थापित करने का प्रयास सरकार करती, तो माओवादी ठेकेदार, शिक्षक, डॉक्टरों और मोबाइल टॉवर को निशाना बनाकर उन्हें नुकसान पहुंचाते थे। इसके पीछे की मंशा साफ है थी कि यदि विकास पहुंचेगा, तो स्थानीय ग्रामीणों की निर्भरता नक्सलियों पर खत्म हो जाएगी।

जनअदालतों के नाम पर निर्दोष जनजातीय ग्रामीणों को "पुलिस का मुखबिर" बताकर मार देना और गांवों से जबरन राशन व रंगदारी (लेवी) वसूलना यह बताता है कि उनका जल-जंगल-जमीन के रक्षक होने का दावा सिर्फ एक मुखौटा है। जंगलों में बारूद बिछाना और IED ब्लास्ट करना जनजातियों के पारंपरिक जीवन और प्रकृति दोनों के खिलाफ है।
नक्सलियों को "क्रांतिकारी" बताना ग्रामीणों की जायज चिंताओं (जैसे जमीन के अधिकार और विस्थापन) का राजनीतिक और सैन्य लाभ उठाने की एक रणनीतिक चाल रही है, ताकि अपनी हिंसक महत्वाकांक्षा को एक "पवित्र सामाजिक आंदोलन" के रूप में दुनिया के सामने पेश किया जा सके।

आज जब बस्तर माओवाद से मुक्त हो चुका है तब भी कई ऐसे वामपंथी विचारक हैं, जो सोशल मीडिया सहित अन्य माध्यमों से अब पर्यावरण के हितैषी बनकर विकास के विरुद्ध खड़े होने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन एक बात तो साफ हो चुकी है कि माओवादियों का जल-जंगल-जमीन का रक्षक होने का मुखौटा अब टूट चुका है और जनजातियों का विश्वास सरकार और लोकतंत्र के प्रति बढ़ा है। यही बस्तर की अब सच्चाई है।
लेख
ऋषि भटनागर
बस्तर की माटी में ही जन्म हुआ। मूल रूप से पत्रकार… कई प्रमुख समाचार पत्रों और संस्थानों से जुड़े रहे। वर्तमान में कॉन्टिनेंटल छत्तीसगढ़ सुपर स्पेशियेलिटी हॉस्पिटल में बतौर जनसंपर्क अधिकारी (PRO) और स्वतंत्र पत्रकार कार्यरत। विश्व संवाद केंद्र से स्तंभकार के रूप में जुड़कर काम करते रहे। सक्रिय पत्रकारिता में करीब 20 वर्ष तक काम किया। हरिभूमि से शुरूआत, फिर नवभारत और दैनिक भास्कर जैसे संस्थानों में काम किया। इसके अलावा कुछ न्यूज चैनल्स पर भी अपनी सेवाएं दीं।