
कॉकरोच, खटमल, पिस्सू, जोंक जिस मर्जी नाम से पार्टी बनाई जा सकती है। जैसी प्रवृत्ति वैसी पार्टी। जीव विज्ञान में कीट पतंगों को भली भांति जानने के लिए इनका डायसेक्शन किया जाता है, चीर-काट के देखा जाता है कि भीतर क्या है, जन्तू काम कैसे करता है।
कैमेस्ट्री में एक लिटमस पेपर टेस्ट होता है, यह किसी पदार्थ की अम्लीय या क्षारीय प्रकृति को जानने के लिए किया जाता है। मैंने भी कु-विख्यात पर्यावरणविद ग्रेटा थनबर्ग का ‘गलती से लीक’ टूलकिट पेपर निकाला और सोचा जरा कॉकरोच को छुवा कर देखें, मसला क्या है? क्या यह डिजिटल अभिव्यक्ति है? क्या यह व्यंग्यात्मक प्रतिरोध का स्वर है या मामला कुछ और है, बड़ा और गंभीर हैं?

थनबर्ग के टूलकिट में कुछ आधारबिंदु थे, जैसे सोशल मीडिया पर समन्वित अभियान चलाने के सुझाव एकत्रित करना, निर्धारित समय पर हैशटैग आधारित “ट्विटर स्टॉर्म” आयोजित करने की योजना, प्रदर्शन आयोजित करने की अपील, ऑनलाइन याचिकाओं (पिटीशन) पर हस्ताक्षर करने हेतु लिंक साझा करना, अंतरराष्ट्रीय सामाजिक कार्यकर्ताओं व प्रभावशाली व्यक्तियों और संगठनों का समर्थन जुटाने के तरीके, मीडिया संस्थानों तक विषय पहुँचाने तथा वैश्विक एकजुटता प्रदर्शित करने की रणनीतियाँ आदि।
यह टूलकिट ऐसा है कि शहरी माओवादियों की कार्यशैली जानने के लिए मैंने किसान को माओवादी शब्द से बदला और वही रणनीतियाँ सामने आ गयीं जिनपर वे काम करते रहे हैं, आप भी कॉकरोच को यहाँ जोड़ कर देखें तो नीर-क्षीर अलग अलग हो जाता है।
टूलकिट के तौर तरीके क्या हैं, क्या करने का प्रयास होता है? पहले एक ऐसा तीखा और चुभता हुआ प्रतीक अथवा नाम गढ़ा जाता है जो क्षण भर में जनमानस का ध्यान आकर्षित कर ले; आखिर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम इसका सिद्ध उदाहरण है। कॉकरोच घिनौना प्राणी है लेकिन विवाद विस्तार के लिए इसी घिन को ताकत बनाया गया है।
आभासी दुनिया में व्यंग्य, कटाक्ष और मीमों की बाढ़ आ गई है, सबकुछ स-प्रयास है। असंतोष को पैदा करने का उपक्रम और असंतोष को हवा देने का औजार। स्वाभाविक है कि नया प्रयोग, नया तरीका युवा पीढ़ी में से बहुतायत को अपनी ओर खींचता है; वे मजे के लिए, एक दूसरे की देखा देखी या बस जानने भर के लिए ऐसे प्रयासों से जुड़ जाते है।

अब फॉलोवर्स की बढ़ती संख्या को जनसमर्थन और वैधता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसके प्रतिपक्ष में आ रही राजनीतिक दलों और नेताओं की प्रतिक्रिया को और अधिक प्रचार एवं विस्तार का माध्यम बनाया जाता है। यह धीमी सुलगने वाली आंच पर चढ़ी हुई खिचड़ी है जिसे पक जाने की अपेक्षा में बीरबलों द्वारा सुलगाया जाता है।
नेपाल में और बांग्लादेश में यही प्रयोग था जो वहाँ के विविध आंतरिक कारणों से सफल भी हुआ। भारत में युवाओं को ऐसे ही सुलगाने और उनके माध्यम से अराजकता फैलाने का प्रयास निरंतर जारी है; सौभाग्य से टूल्किट में औजार जंग लगे हैं। कॉकरोच तो आड़ है, कई अदृश्य हाथ हैं, जिनमें तेज तीखी कटार है, जिसका निशाना लोकतंत्र है; हम हैं, आप हो।
लेख
राजीव रंजन प्रसाद
लेखक, साहित्यकार
फरीदाबाद, एनसीआर